गुरुवार, 14 जनवरी 2010

क्यों मनाते है मकर संक्रांति?

कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान करने पर सभी कष्टों का निवारण हो जाता है। इसीलिए इस दिन दान, तप, जप का विशेष महत्व है। ऐसा मान्यता है कि इस दिन को दिया गया दान विशेष फल देने वाला होता है।



मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान करना व गंगा तट पर दान देना बहुत हीं शुभ होता है। धार्मिक दृष्टि से देखे तो इस दिन सूर्य मकर व कर्क राशियों में प्रवेश करते हैं जो की बहुत हीं अच्छा होता है। इस दिन से दिन बड़ी व रातें छोटी होने लगती है क्योंकि मकर संक्रांति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है यही कारण है कि यहां रात बड़ी व दिन छोटी होती है और जाड़े का मौसम शुरू हो जाता है। मकर संक्रांति के बाद सूर्य उतरी गोलार्ध में आने लगता है जिससे गर्मी का मौसम शुरू हो ताजा है।

बताया जाता है कि तिथियां चंद्रमा के गति को आधार मानकर तय कि जाती है लेकिन संक्रांति से इसे सूर्य की गति को आधार मान कर तय किया जाता है। इसीलिए इसे प्रतिवर्ष 14 जनवरी को मनाया जाता है।

मकर संक्रांति को विभिन्न जगहों पर अलग-अलग तरीके से मानाया जाता है। हरियाणा व पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। उतर प्रदेश व बिहार में इसे खिचड़ी कहा जाता है। उप्र में इसे दान का पर्व भी कहा जाता है। वहीं तमिलनाडु में इसे पोंगल के रूप में मनाया जाता है तथा यह पर्व चार दिन तक वहां चलता है। असम में मकर संक्रांति को माघ- बिहू के नाम से जाना जाता है।

माना जाता है कि इस दिन सूर्य भगवान अपने पुत्र शनि से खुद मिलने जाते है। चुकी शनि भगवान मकर राशी के स्वामी है अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है।