शनिवार, 16 जनवरी 2010

दूसरी की किताबें नहीं पढ़ पाते 5वीं के छात्र

एक ओर सरकार क्वॉलिटी एजुकेशन का जुमला रटते हुए इसे ग्लोबल स्तर का बनाने की बात कह रही है, वहीं एक नई रिपोर्ट जमीन
ी हकीकत को सामने ला रही है। देश में एजुकेशन की क्वॉलिटी इतनी खराब हो चुकी है कि ग्रामीण इलाकों में पांचवीं क्लास के करीब आधे बच्चे दूसरी क्लास की किताबें भी नहीं पढ़ पाते। अधिकतर बच्चे साधारण गुणा-भाग करने में भी सक्षम नहीं हैं। 'प्रथम' संस्था द्वारा तैयार शिक्षा रिपोर्ट की सालाना स्थिति (एएसईआर-2009) में आंखें खोलने वाली यह तस्वीर सामने लाई गई है।

- रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण इलाकों में पांचवीं कक्षा के वैसे बच्चे जो दूसरी कक्षा की किताबें पढ़ने के काबिल हैं, उनका लेवल 2008 के 56.2 पर्सेंट से घटकर 2009 में 52.8 पर्सेंट हो गया। इसका मतलब है कि रूरल एरिया के आधे से ज्यादा बच्चे जिस दजेर् में हैं, उससे तीन दर्जा नीचे की जानकारी भी नहीं रखते।


यह रिपोर्ट देश के 583 में से 575 ग्रामीण जिलों में की गई स्टडी के आधार पर तैयार की गई है। स्टडी में 16 हजार 291 गांवों, 3 लाख 38 हजार 27 घरों और 6 लाख 91 हजार 734 बच्चों को शामिल किया गया गया है। प्रथम संस्था पिछले पांच वर्षों से लगातार यह रिपोर्ट तैयार करती रही है।

- तमिलनाडु, कर्नाटक और पंजाब ऐसे राज्य हैं, जहां ग्रामीण बच्चों की पढ़ने-लिखने की काबिलियत में बढ़ोतरी हुई है। पहली क्लास के लेवल पर ऐसे बच्चों का पर्सेंटेज, जो वर्णों की पहचान या इससे ज्यादा जानकारी रखते हैं, घटकर 69 से 65 पर्सेंट हो गया है। पहली क्लास के करीब 30 फीसदी बच्चे नंबरों की पहचान की काबिलियत नहीं रखते।

- गणित के मामले में स्थिति चिंताजनक है। पांचवीं कक्षा के केवल 36 पर्सेंट बच्चों को ही गुणा-भाग करना आता है। हालांकि हिमाचल प्रदेश, पंजाब, असम, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में पांचवीं के छात्रों की गुणा-भाग करने की क्षमता में इजाफा हुआ है।

- जहां तक अंग्रेजी पढ़ने और समझने का सवाल है तो पांचवीं के करीब 25 फीसदी ग्रामीण छात्र ही आसान वाक्यों को पढ़ सकते हैं। जो 25 फीसदी छात्र ऐसे वाक्य पढ़ सकते हैं, उनमें से करीब 80 फीसदी इसका अर्थ समझने में सक्षम हैं। इसी तरह आठवीं क्लास के करीब 60 फीसदी ग्रामीण छात्र अंग्रेजी के सिंपल वाक्यों को पढ़ सकते हैं।

- अंग्रेजी के मामले में गुजरात में हालत काफी खराब है। पहली क्लास में पढ़ने वाले 25.3 पर्सेंट बच्चे अंग्रेजी के लैटर्स को नहीं पढ़ पाते।

- एजुकेशन के मामले में केरल को काफी ऊपर माना जाता है। अंग्रेजी के मामले में भी केरल की स्थिति काफी बेहतर है। 85 पर्सेंट बच्चे अंग्रेजी लैटर्स पढ़ने में सक्षम है।

- रिपोर्ट कहती है कि बच्चों को प्राइवेट ट्यूशन के लिए भेजने का ट्रेंड भी बढ़ रहा है। जहां पहली कक्षा के 17 फीसदी बच्चे प्राइवेट ट्यूशन लेते हैं, आठवीं के करीब 31 फीसदी बच्चे ट्यूशन पढ़ने जाते हैं।

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5451820.cms

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

अब भूजल से चलेगा एसी


कड़ाके की ठंड हो या फिर झुलसा देने वाली गर्मी, लेकिन ट्यूबवेल का पानी दोनों ही मौसम में आपको बहुत सुहाता है क्योंकि यह पानी गर्मी में ठंडा तो सर्दियों में गर्म होता है। क्या आपने सोचा है कि यह पानी आपके कमरे को सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडा रख सकता है। या यूं कहें कि एयर कंडीशनर के तौर पर भी प्रयोग हो सकता है।



सुनने में यह आइडिया जरा अटपटा लगता है लेकिन इसी से प्रेरणा लेकर हिसार के दो भाइयों ने बना डाला ऐसा ईको फ्रेंडली एयर कंडीशनर जो भूजल के इसी प्रभाव पर आधारित है। ये हैं हिसार की बिश्नोई कालोनी निवासी कर्नल राज विजय रोहलानिया व राजकुमार रोहलानिया।



इसकी कीमत भी सामान्य एसी से आधी है और इससे 60 प्रतिशत तक बिजली की बचत होती है। बाजार में उपलब्ध एसी से हानिकारक कार्बन गैस गैसें निकलती हैं जो ओजोन परत पर दुष्प्रभाव डालती हैं, इसीलिए इसे ग्रीन एसी का नाम दिया है। हालांकि यह अभी बाजार में नहीं मिलेगा, क्योंकि अभी इस तकनीक की पेटेंट प्रक्रिया जारी है।


इस माडल का इन्होंने अपने घर पर ही प्रयोग शुरू कर दिया है, जो सफल रहा है। बाजार में आने के बाद इस एसी का न सिर्फ घर बल्कि कार्यालय, बैंक्वेट हाल, फैक्टरी, फार्म हाउस में भी प्रयोग हो सकेगा। अक्षय ऊर्जा विभाग ने भी रोहलानिया भाइयों के इस प्रोजेक्ट में हर संभव मदद का वादा किया है।


हिसार में विभाग के प्रोजेक्ट अधिकारी हरनाम बिश्नोई ने कहा कि धरती के भीतर ऊर्जा का अथाह भंडार है, पर यहां इस पर अधिक कार्य नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि विभाग उनके प्रोजेक्ट का अध्ययन करेगा और उनकी हर तरह से मदद को तैयार हैं।






क्या है तकनीक


ग्रीन एसी की खोज करने वाले रोहलानिया ब्रदर्स ने बताया कि चाहे सर्दी हो या गर्मी, जमीन से निकलने वाले पानी का तापमान, संबंधित जगह के न्यूनतम और अधिकतम तापमान का औसत होता है। यह हिसार में जहां 23.9 डिग्री सेल्सियस, अमृतसर में 21 डिग्री सेल्सियस और दिल्ली में 25 डिग्री सेल्सियस है।


वैज्ञानिकों की भाषा में कहें तो यह जीओ थर्मल [पृथ्वी की गर्मी] ऊर्जा है, जिसकी न सिर्फ विश्व के हर क्षेत्र में उपलब्धता है बल्कि इसका अपार भंडार भी है।






ऐसे बनाया एसी


इस तकनीक से करीब डेढ़ टन के एसी को बनाने के लिए रोहलानिया ब्रदर्स ने जमीन के पानी को खींचने के लिए 350 वाट की एक मोटर व कमरे में हवा फेंकने के लिए 250 वाट के पंखे का प्रयोग किया। इसके अलावा इसमें दो हीट रेडिएटर लगाए गए हैं, जिसमें से पानी को निकालकर तापमान को नियंत्रित किया जाता है। इन्हीं रेडियटर से पंखा हवा को खींचकर कमरे को मौसम के अनुकूल गर्म या ठंडा करता है।


http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_6102871/

क्यों मनाते है मकर संक्रांति?

कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान करने पर सभी कष्टों का निवारण हो जाता है। इसीलिए इस दिन दान, तप, जप का विशेष महत्व है। ऐसा मान्यता है कि इस दिन को दिया गया दान विशेष फल देने वाला होता है।



मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान करना व गंगा तट पर दान देना बहुत हीं शुभ होता है। धार्मिक दृष्टि से देखे तो इस दिन सूर्य मकर व कर्क राशियों में प्रवेश करते हैं जो की बहुत हीं अच्छा होता है। इस दिन से दिन बड़ी व रातें छोटी होने लगती है क्योंकि मकर संक्रांति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है यही कारण है कि यहां रात बड़ी व दिन छोटी होती है और जाड़े का मौसम शुरू हो जाता है। मकर संक्रांति के बाद सूर्य उतरी गोलार्ध में आने लगता है जिससे गर्मी का मौसम शुरू हो ताजा है।

बताया जाता है कि तिथियां चंद्रमा के गति को आधार मानकर तय कि जाती है लेकिन संक्रांति से इसे सूर्य की गति को आधार मान कर तय किया जाता है। इसीलिए इसे प्रतिवर्ष 14 जनवरी को मनाया जाता है।

मकर संक्रांति को विभिन्न जगहों पर अलग-अलग तरीके से मानाया जाता है। हरियाणा व पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। उतर प्रदेश व बिहार में इसे खिचड़ी कहा जाता है। उप्र में इसे दान का पर्व भी कहा जाता है। वहीं तमिलनाडु में इसे पोंगल के रूप में मनाया जाता है तथा यह पर्व चार दिन तक वहां चलता है। असम में मकर संक्रांति को माघ- बिहू के नाम से जाना जाता है।

माना जाता है कि इस दिन सूर्य भगवान अपने पुत्र शनि से खुद मिलने जाते है। चुकी शनि भगवान मकर राशी के स्वामी है अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है।

बुधवार, 13 जनवरी 2010

भारत का पहला मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान 2013 में


रूसी अंतरिक्ष यान के जरिए भारत 2013 में अपने पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान को अंजाम देगा। इस अभियान में दो भारतीय अंतरिक्ष यात्री शामिल होंगे।

इस अभियान के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन [इसरो] रूसी अंतरिक्ष यान सोयूज की सेवाएं लेगा और एक रूसी कमांडर भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को प्रशिक्षित करेगा। 'वायस आफ रशिया' रेडियो के मुताबिक इस स्वतंत्र उड़ान में रूसी अंतरिक्ष कमांडर ही दो सदस्यीय भारतीय दल का नेतृत्व करेगा। यह अभियान कई दिन चलेगा। वायस आफ रशिया ने रूसी अंतरिक्ष एजेंसी [रोसकोसमोस] के उप प्रमुख विताली देवीदोव के हवाले से कहा है कि इस अभियान के दौरान भारतीय अंतरिक्ष यात्री अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन [आईएसएस] से नहीं जुड़ेंगे।
http://in.jagran.yahoo.com/news/international/general/3_5_6097873.html

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

एक घंटे में पूरा बिहार देखो


अमेजिंग, पर सच्चाई है। शायद आपको यह सुनकर अजीब लगे कि बिहार की परिक्रमा महज एक घंटे में पूरी की जा सकती है। सोचिए, जब बिहार में यहां से वहां तक, इस कोने से उस कोने तक, बक्सर से कटिहार या फिर पश्चिम चंपारण से गया तक मात्र एक घंटे में जा सकते हैं। ये सब तब होगा, जब राज्य सरकार चार से पांच सौ करोड़ रुपए का इंवेस्टमेंट करेगी। इसके बाद पूरा बिहार 'अपना' हो जाएगा, अपने करीब हो जाएगा। इतना ही नहीं, बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ जैसी त्रासदी से भी आसानी से निपटा जा सकेगा। हम आपको सपने नहीं दिखा रहे हैं, ये सब सच हो सकता है। क्योंकि सिर्फ पटना में ही नहीं, पूरे बिहार में एयरबेस का जाल बिछा हुआ है। वह भी ऐसा जाल जिसे वर्षो पहले बनाया गया था। पर, पिछले चालीस से भी अधिक सालों से ध्यान न दिए जाने के कारण ये एयरबेस लगभग गायब से हो गए हैं। अगर गवर्नमेंट थोड़ा ध्यान दे दे, तो पूरा बिहार एक घंटे का हो जाएगा।




कभी देखा है इन्हें

ठीक वैसे ही, जैसे किसी क्विज कांटेस्ट में पूछा जाता है, हम भी आपसे एक सवाल करते हैं? क्या आप बता सकते हैं कि बिहार में कितने स्थानों से उड़ान भरी जा सकती है? आपको यह बताने में थोड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़े, क्योंकि खुद स्टेट गवर्नमेंट ही नहीं, सेंट्रल गवर्नमेंट और हमारे आस-पास रहने वाले किसी का भी ध्यान इस सवाल की ओर गया ही नहीं था। हां, अब पिछले कुछ महीनों में स्टेट गवर्नमेंट ने बिहार में वर्षो से उपेक्षित पड़े एयरबेस की ओर अपना कंसन्ट्रेशन बढ़ाया है।



स्टेट में हैं 29 एयरबेस

क्विज में पूछे गए प्रश्न का जवाब शायद लोगों को न पता हो या हो सकता है कुछ लोगों को इसके बारे में जानकारी हो। बावजूद, हम आपको बताते हैं कि बिहार में 29 एयर बेस हैं। लेकिन लोगों की नासमझी और गवर्नमेंट का इस ओर ध्यान न होने के कारण बिहार के हर डिस्ट्रिक्ट में बनाए गए ये एयरबेस आज कहीं गुम से हो गए हैं। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि इन एयरबेस का निर्माण आज से करीब दशकों पहले अंग्रेजों ने कराया था।



अंग्रेजों ने डेवलप किए थे

हम यहां जिन एयरबेस की चर्चा कर रहे हैं, उनकी नींव अंग्रेजों के शासनकाल में रखी गई थी। यह खुलासा हाल में किए गए एक सर्वे के बाद हुआ है। सर्वे रिपोर्ट बताती है कि एशिया महाद्वीप में जिस वक्त अंग्रेजी साम्राज्य की हुकुमत चलती थी, उस दौरान सेना के अफसरों को इंग्लैंड से बर्मा तक ले जाने के लिए देशभर में अंग्रेजों ने एयर बेस बनवाए थे।



बने हैं खड़ी ईट पर

स्टेट में जितने भी एयरबेस अब तक पहचान में आए हैं, उनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह आज भी उतने ही कारगर हैं जितने कि पचास साल पहले थे। इन एयरबेस की खोज और उनके भविष्य की प्लानिंग पर काम करने के इच्छुक कैप्टन मनोज कुमार सिंह बताते हैं कि अंग्रेजों ने आज से पचास साल पहले जिस टेक्निक का इस्तेमाल किया वह काबिल-ए-तारिफ है। श्री सिंह के अनुसार जितने भी एयरबेस उन्होंने अब तक देखें हैं सबकी खासियत यह है कि एयरपट्टी पर खड़ी ईटों का इस्तेमाल किया गया है। शायद यही एक वजह है कि आज भी ये एयरबेस मामूली सी रकम खर्च करने पर दोबारा काम करने लायक हो सकते हैं और स्टेट गवर्नमेंट ने इस दिशा में काम शुरू भी कर दिया है।



सिस्टमेटिक डेवलपमेंट की जरूरत

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर स्टेट गवर्नमेंट इन सभी एयरबेस का सिस्टमेटिक डेवलपमेंट करे, तो फ्लड से और भी बेहतर तरीके से बिहार की तबाही निपटा जा सकता है। जानकार बताते हैं कि बिहार में फ्लड की सिचुएशन में रेसक्यू ऑपरेशन अभी पटना से चलाना होता है। अगर बाढ़ सीतामढ़ी में आई है तो यहां से चॉपर उड़ान भरते हैं। इससे टाइम मैनेजमेंट तो नहीं ही हो पाता है। पैसों की भी बर्बादी होती है। अगर इन एयरबेस को ठीक कंडीशन में ला दिया जाए, तो सीतामढ़ी की बाढ़ से मोतिहारी से ही रेसक्यू ऑपरेशन चलाया जा सकता है। ऐसे ही दूसरे कामों में भी इन एयरबेस की बड़ी भूमिका हो सकती है। जरूरत पड़ने पर अति आवश्यक सामग्री जैसे दवा, गैस सिलेंडर, क्रिटिकल सिचुएशन में भोजन जैसी चीजें भी एक स्थान से दूसरे स्थानों पर पहुंचाई जा सकती हैं।



बढ़ानी होगी लेंथ

पुराने जमाने में बनाए गए एयरबेस की सिर्फ एक खामी है। ये एयरबेस या तो काफी कम लेंथ में हैं या फिर अगर लेंथ है भी तो आज इनका इंक्रोचमेंट किया जा चुका है। जानकारों का मत है कि आज बिहार में जितने भी एयरबेस चिह्नित किए गए हैं, उनमें से अधिकतर की लेंथ 1900 फीट से ज्यादा नहीं है। अगर इन्हें काम करने लायक बनाना है तो इनकी लंबाई को कम से कम छह हजार फीट करना होगा। लेंथ बढ़ाने, टर्मिनल बिठाने के साथ ही दूसरी सुविधाएं इन एयरबेस में डेवलप कर दी जाएं, तो यहां कल से उड़ान भरी जा सकेंगी। सर्वे रिपोर्ट को आधार बनाकर स्टेट गवर्नमेंट ने बिहार के डिफरेंट एयर बेस को जिन्दा करने का काम शुरू कर दिया है। इस कड़ी में भागलपुर, किशगंज, सहरसा, मधुबनी, मुंगेर, छपरा एयरबेस के चारों ओर ऊंची बाउंड्री वॉल का निर्माण शुरू हो चुका है। गवर्नमेंट की प्लानिंग बचे हुए दूसरे एयरबेस को भी इसी प्रकार से डेवलप करने की है।
http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_6084498/

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

बिहार विकास के मामले में दूसरे स्थान पर

अब तक पिछड़े और सबसे गरीब राज्यों की सूची में शुमार बिहार ने जबरदस्त तरक्की की है। बीते 4 साल के दौरान सकल घरेलू उत्पाद के विकास के मामले में बिहार तेज तरक्की करने वाले राज्यों की सूची में दूसरे स्थान पर पहुंच चुका है।


सरकारी संस्था सीएसओ की ओर से किए गए सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि 2004-05 से वर्ष 2008-09 के दौरान बिहार की विकास दर 11.03 प्रतिशत रही, जो आश्चर्यजनक है।

वर्ष 2003-04 के दौरान बिहार की हालत ये थी तरक्की की रफ्तार -5.15 प्रतिशत पर पहुंच गई थी।

लेकिन अब बिहार विकास दर के मुकाबले में गुजरात को टक्कर दे रहा है। साल 2004-05 से 2008-09 के दौरान गुजरात की विकास दर 11.05 प्रतिशत रही, जो बिहार की विकास दर से थोड़ी ही ज्यादा है।

हालांकि इस दौरान सरकार भी बदली। लालू प्रसाद यादव से सत्ता नीतिश कुमार के हाथ में पहुंची। जिन्होंने उद्योगों और कारोबारियों में भरोसा पैदा करने के लिए तमाम उपाय किए।