बुधवार, 30 दिसंबर 2009

बथुआ खाओ, पथरी और कब्ज भगाओ

http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_6063400.html

नई दिल्ली [जागरण न्यूज नेटवर्क]। बथुआ कई औषधीय गुणों से भरपूर होता है। डाक्टरों के मुताबिक बथुआ को खाने में किसी न किसी रूप में शामिल जरूर करना चाहिए। यह स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होता है। इसमें आयरन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसके साग को नियमित रूप से खाने से कई रोगों को जड़ से समाप्त किया जा सकता है। इससे गुर्दे में पथरी होने का खतरा काफी कम हो जाता है। गैस, पेट में दर्द और कब्ज की समस्या भी दूर हो जाती है। आज हम आपको बता रहे हैं बथुआ के औषधीय गुणों के बारे में :




-कच्चे बथुआ के एक कप रस में थोड़ा सा नमक मिलाकर प्रतिदिन लेने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।



-गुर्दा, मूत्राशय और पेशाब के रोगों में बथुआ का रस पीने से काफी लाभ मिलता है।



-बथुआ को उबाल कर इसके रस में नींबू, नमक और जीरा मिलाकर पीने से पेशाब में जलन और दर्द नहीं होता।



-सिर में अगर जुएं हों तो बथुआ को उबालकर इसके पानी से सिर धोएं। जुएं मर जाएंगे और सिर भी साफ हो जाएगा।




-सफेद दाग, दाद, खुजली फोड़े और चर्म रोगों में बथुआ को प्रतिदिन उबालकर इसका रस पीना चाहिए।



-बथुआ का रस मलेरिया, बुखार और कालाजार संक्रामक रोगों में भी फायदेमंद होता है।



-कब्ज के रोगियों को तो इसका नियमित रूप से सेवन करना चाहिए। कुछ हफ्तों तक नियमित रूप से खाने से कब्ज की समस्या समाप्त हो जाती है।



-बथुआ को साग के तौर पर खाना पसंद न हो तो इसका रायता बनाकर खाएं।



-पथरी होने पर एक गिलास कच्चे बथुआ के रस में शक्कर को मिलाकर रोज पिएं। पत्थरी टूटकर बाहर निकल आएगी।

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

शनि के टाइटन पर कोहरा



शनि ग्रह के सबसे बड़े चंद्रमा टाइटन पर पानी की तलाश करने के बाद वैज्ञानिकों ने उसके दक्षिणी ध्रुव पर कोहरे का जमाव खोज निकाला है।
कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी के वैज्ञानिकों के अनुसार टाइटन के दक्षिणी ध्रुव पर कमोबेश मीथेन का संघनन मिला है जिससे यहां वहां कोहरे की परत जमा हुई है।

मुख्य शोधकर्ता माइक ब्राउन ने कहा कि सौर परिवार में पृथ्वी को छोड़कर टाइटन ही ऐसा स्थान है जहां भारी मात्रा में द्रव [व्यापक तौर पर द्रवित मीथेन और एथेन] जमा है।

उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि टाइटन की विशेषताओं के एक बात और जुड़ गई है वह है उसकी सतह पर जमा द्रव जो कोहरा है। सान फ्रांसिस्को में अमेरिकी भूभौतिकी संघ 2009 में ब्राउन ने कहा कि कोहरे की उपस्थिति इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सतह और वायुमंडल के बीच आदान प्रदान के कारण इसका निर्माण हुआ है और ऐसा लगता है कि वहां एक जलचक्र सक्रिय था।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

एक पेड़ पर निर्भर हैं चालीस लोग



कोपनहेगन में क्लाइमेट चेंज पर चल रहे समिट का आज तीसरा दिन है। इसमें सौ से ज्यादा देशों के 15000 प्रतिनिधियों के सैकड़ों टन भाषण बहाये जा चुके है। दो हफ्ते तक चलने वाले इस समिट का परिणाम भले ही कुछ निकले, पर इसमें शामिल जो भी लोग हैं, क्या वे कभी आस-पास झांकने की कोशिश करते हैं? समिट में भारतीय प्रतिनिधि भी शामिल हुए हैं। परंतु, शायद आपको पता नहीं कि एक आदमी को ऑक्सीजन के लिए 16 पेड़ की जरूरत होती है, जबकि भारत में 40 लोग महज एक पेड़ पर निर्भर हैं। फर्ज कीजिए, अगर वह एक पेड़ भी न रहे, तो क्या होगा? किसी ने सोचा है इस पर, कोई नहीं। शायद आप भी नहीं और जब तक आप नहीं सोचेंगे, कुछ भी होने को नहीं है। सो, प्लीज..पेड़ काटिए नहीं, लगाइए। जब तक पेड़ नहीं बचेगा, आप भी नहीं बचिएगा।

व्यस्त जीवन, काम का प्रेशर और ऊपर से ढेर सारे टेंशन। इतना काम कि सांस लेने तक की फुर्सत नहीं मिलती। पर, अभी तो आपको फुर्सत नहीं मिलती है। हो सकता है आने वाले समय में सांस लेने की फुर्सत मिल भी जाए, पर 'सांस' ही नहीं मिलेगी। जिस तरह से हम 'हाइटेक' बनने की लालसा में धड़ाधड़ पेड़ों की कटाई कर रहे हैं, यह अच्छे संकेत नहीं हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार प्रदूषित शहरों की लिस्ट में दिल्ली दूसरे पर है, जबकि मुंबई पहले स्थान पर पहुंच गया है। वहीं पटना का 14वां स्थान है। यानी एक तरफ हम विश्व के सबसे विकसित शहरों की लिस्ट में शामिल होने की मारामारी कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रदूषण फैलाने में भी कम पीछे नहीं हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे पटना में पेड़ों की संख्या 50 हजार के करीब है, यानी आबादी 20 लाख और पेड़ 50 हजार। पटना में ऑक्सीजन का लेवल धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। ग्रीन बेल्ट की हरियाली धीरे-धीरे सिमटती जा रही है। जगह-जगह उग आए कंक्रीट के पहाड़ ने तो सांस लेना दूभर कर दिया है।

जिस तरह से हमारे यहां पेड़-पौधे कटते जा रहे हैं, यही स्थिति रही तो आने वाले पांच वर्षो में कई शहर सीमेंटेड सिटी की लिस्ट में शामिल हो जाएं, तो आश्चर्य नहीं। सेंटर ऑफ साइंस एंड इन्वायरन्मेंटल डिपार्टमेंट, नई दिल्ली के करेंट आंकड़े के अनुसार वर्ष 1988 में 2500 लोगों पर एक पेड़ था, जो अब 10000 लोगों पर एक हो गया है। भारत में केवल 11.5 प्रतिशत वन रह गये हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत में जब 29 पेड़ कटते हैं, तो एक पेड़ लगाया जाता है। तरुमित्रा के फादर रॉबर्ट कहते हैं कि हमने जब पटना के गायघाट से दानापुर तक सड़क के किनारे लगे पेड़ों की गिनती करवाई, तो पाया कि 20 किमी के अंदर 250 से भी कम पेड़ थे। वहीं, पर्यावरणविद श्वेता आनंद कहती हैं कि जाहिर-सी बात है पेड़ कम होंगे, तो धरती से ऑक्सीजन फ्लोइंग की मात्रा घटेगी। डॉक्टर का मानना है कि ताजी हवा ब्लड प्यूरेशन के लिए बहुत जरूरी है। डॉ. आनंद शंकर कहते हैं कि इसके अभाव में सांस संबंधी बीमारियां तो होती ही हैं, ब्लड क्लॉटिंग, अस्थमा, हार्ट अटैक आदि का भी खतरा बना रहता है।

1 पर 16 के बदले, 40 पर 1

वन विभाग की मानें, तो अभी नई योजनाओं में ग्रीनरी डेवलप करने की स्वीकृत नहीं हुई है। झारखंड के अलग होने से बिहार में मात्र तीन परसेंट फॉरेस्ट ही रह गया है। वन विभाग की ओर से वृक्ष लगाओ अभियान युद्धस्तर पर चल रहा है। कुल चार लाख वृक्ष लगाने के लक्ष्य में अब तक 10 हजार से ऊपर वृक्ष लगाए जा चुके हैं। इसमें सड़कों के किनारे-किनारे पेड़ लगाया जाना है। इस अभियान के तहत अकेले पटना में 10 हजार वृक्ष लगाने की प्लानिंग है, जो लगभग पूरी हो चुकी है. विशेषज्ञ की मानें, तो एक स्वस्थ मनुष्य को ऑक्सीजन के लिए 16 पेड़ की जरूरत होती है, पर भारत में यह आंकड़ा उलटा है। यहां 40 लोग एक पेड़ पर निर्भर हैं। तरुमित्र के फादर रॉबर्ट के अनुसार प्रति वर्ष पेड़ की 10 हजार से अधिक प्रजातियां नष्ट हो रही हैं। [जेएनएन]