बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

भोजन व शिक्षा के मोहताज बच्चे

तरक्की के तमाम दावों और दुनिया की उम्मीदों का केंद्र बनने के बावजूद भारत में नवजात शिशुओं और बच्चों की कुपोषण से मौत के आकड़े उसका सिर शर्म से नीचा कर रहे है।


अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसी 'सेव द चिल्ड्रन' के सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में हर साल पैदा होने वाले बच्चों में से आधे शिशुओं की पैदा होते ही मृत्यु हो जाती है। इस सर्वेक्षण पर भरोसा करें तो आठ से दस प्रतिशत सालाना स्थिर आर्थिक वृद्धि का सपना देख रहे भारत में 20 लाख बच्चे तो हर साल अपना पाचवा जन्मदिन मनाने से पहले ही भूख से होने वाले कुपोषण और उसके कारण लगने वाली बीमारियों से दम तोड़ देते हैं।

दुनिया में कुपोषण का शिकार हर तीसरा बच्चा भारत में रहता है और हर पंद्रहवें सेकेंड में एक बच्चा मौत की नींद सो जाता है।

शिक्षा के लिहाज से तो इन नन्हे बच्चों की और दुर्गति है। गावों में पढ़ने को स्कूल नहीं हैं और जहा स्कूल हैं, वहा कहीं इमारत नदारद है तो कहीं शिक्षकों का अता-पता नहीं है। गनीमत है कि इस मामले में भारत न तो अकेला है और न ही अग्रणी देशों में है। दुनिया के जिन 75 लाख बच्चों को प्राथमिक शिक्षा मयस्सर नहीं है, उनमें उस अमेरिका के बच्चे भी
शामिल हैं, जिसे तीसरी दुनिया के देश, विकास की मिसाल मानते हैं और उसके नक्श-ए-कदम पर चलने को आतुर रहते हैं।

अमेरिका में ढाई लाख बच्चे प्राथमिक शिक्षा के बाद पढ़ाई पूरी नहीं करते। यह खुलासा भी 'सेव द चिल्ड्रन' की माताओं की भूमिका पर जारी एक और रिपोर्ट में हुआ है। इसके अनुसार, दुनिया में ऐसे बेहिसाब बच्चे हैं, जो या तो समय से पहले स्कूल छोड़ देते हैं या उन्हें पढ़ने का मौका ही नहीं मिल पाता।

संगठन का मानना है कि बच्चों के ये बुनियादी वर्ष किसी भी देश में खुशहाली लाने का जरिया बन सकते हैं और यह तभी हो सकता है, जब बच्चों को मुकम्मल परवरिश, स्वस्थ पारिवारिक जीवन और सेहतमंद मा मिले।

दरअसल, बच्चे का छुटपन विशेषरूप से पहले पाच साल सबसे अहम होते हैं। यही वह समय है, जिसमें उसमें जीवन में विकास के बीज पड़ते हैं। वह इस दौरान जो सीखता-समझता है, उसी पर उसके जीवन की बुनियाद टिकी होती है। लिहाजा, यदि इस दौरान बच्चों को अच्छा जीवन न मिले, उनकी सही देखभाल न हो और पढ़ाई का मौका न मिले तो वह ताजिंदगी इसका खामियाजा उठाता रहता है।

'सेव द चिल्ड्रन' बच्चों को उम्र के पाचवे साल तक भरपूर पोषण, सुरक्षित जीवन और पढ़ाई इत्यदि के मौके दिलाने की दिशा में प्रयासरत है। इस संगठन ने दुनिया के 100 विकासशील देशों और अमेरिका के पाच राज्यों में बच्चों की स्थिति पर एक मार्गदर्शिका तैयार की है।

इसमें यह बताया गया है कि संबद्ध देश और राच्य अपने नौनिहालों को स्कूल में सफलता के लिए कैसे तैयार करते हैं। इसके विश्लेषण के लिए इन देशों के आर्थिक आकड़ों की भी जाच की गई है।

बच्चों के विकास के लिए चल रहे प्रयास और आर्थिक आकड़ों के विश्लेषण के बाद निकले नतीजों से यह पहचाना जा सकता है कि जिन देशों ने बच्चों के लिए निवेश किए, उन्हें मौके दिए, उन देशों में बच्चों की विकास की प्रवृत्ति दिखने लगी है।

रिपोर्ट में उन सभी उपकरणों और संसाधनों का भी जिक्र है, जो किसी बच्चे को स्वस्थ, सुरक्षित और शिक्षा के लिए जरूरी माहौल सुनिश्चित करते हैं। इसके साथ यह भी बताया गया है कि जिन लोगों को इनकी सबसे ज्यादा जरूरत है, उन तक वह पहुंच नहीं पाते।

किसी भी देश में बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा और स्कूल में उनकी सफलता में देश का कल्याण निहित है। दुनिया की आर्थिक खुशहाली का राज भी इन नौनिहालों की खुशी में छुपा है। यह एक मनोवैज्ञानिक सच्चाई तो है ही, लेकिन पूरी दुनिया में इस पर जो शोध हुए हैं, उससे भी यह साबित हो गया है कि कोई भी बच्चा स्कूल में तभी सफल होता है, जब उसे सीखने के लिए बढि़या माहौल मिले।

दुनिया में समाज की आमदनी बढ़ाने और लागत घटाने का भी यह सबसे अहम नुस्खा है। माना कि अमेरिका एक अमीर कद्दावर देश है, फिर भी वहा के बच्चे स्कूलों में बहुत अच्छा नहीं कर रहे हैं। इसकी वजह यही बताई जा रही है कि इन बच्चों को जरूरी पारिवारिक सुरक्षा नहीं मिल रही है।

मैक्सिको, नेवादा, मिसीसिपी, एरीजोना और अलबामा यह पाच अमेरिकी राच्य बच्चों की पढ़ाई में कम दिलचस्पी के गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। यहा बच्चों के विकास में अड़चन का सबसे अहम कारण अभिभावकों की भागीदारी का न होना है। उनके घर का माहौल पढ़ाई-लिखाई के माकूल नहीं है।

अमेरिका में पढ़ाई में गिरावट 1999 के आसपास आनी शुरू हुई। 1995 तक यह देश बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में अग्रणी था। वर्ष 2000 में स्थिति बिगड़नी शुरू हुई और यह आठवें पायदान पर पहुंच गया। 2006 में यह घटकर 14वें क्रम में आ गया। वहा कालेज छोड़ने वाले बच्चों की संख्या अचानक बढ़ने लगी है।

फिलहाल दुनिया के 24 औद्योगिक देशों के बीच शिक्षा के मामले में अमेरिका 18वें पायदान पर है। वहा के 53 फीसदी नौजवान बीच में ही कालेज की पढ़ाई छोड़ रहे हैं।


दरअसल, विकासशील देशों में पाच वर्ष तक के 40 फीसदी बच्चे बेहद गरीबी में जी रहे हैं। उनकी सेहत का खयाल रखने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। उन्हें भरपेट पौष्टिक भोजन भी नहीं मिल रहा है। यही वजह है कि उनकी क्षमता पूरी तरह पल्लवित नहीं हो रही है, न ही देश के विकास में उनकी भागीदारी का उपयोग हो रहा है। सेव द चिल्ड्रन के अनुसार, किसी देश के खुशहाल भविष्य की यह अहम शर्त है।

चार्ड, बुरूंडी, अफगानिस्तान, गीनिया, बिसाऊ और माली दुनिया के ऐसे देश हैं, जहा बच्चों को ठीक-ठाक प्राथमिक शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है। बुरूंडी में पाच वर्ष तक की उम्र के 25 फीसदी बच्चे स्कूल नहीं जाते। माली में 37 फीसदी और चार्ड में 40 फीसदी बच्चों को स्कूल का मुंह देखना नसीब नहीं हो पाता और गीनिया बिसाउ में 55 फीसदी बच्चे नहीं जानते कि पढ़ाई क्या होती है। इसकी वजह इन देशों के गरीबी है। यहा ऐसी सार्वजनिक सेवाओं का गंभीर अभाव है, जो इन बच्चों की सेहत का खयाल रख सके। समस्याओं और संघर्ष से जूझ रहे इन देशों के माहौल ने इन बच्चों को अपनी चपेट में ले लिया है और इसका असर इनके जीवन पर तो पड़ ही रहा है, इससे देश का भविष्य भी चौपट होता लग रहा है।

उधर क्यूबा, आर्मीनिया, साइप्रस, चिली और अजरबैजान ये पाच देश अपने बच्चों को बेहतर माहौल देने के लिए जाने जाते हैं। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और पारिवारिक जीवन की बदौलत यहा के बच्चे स्कूलों में बढि़या पढ़ाई कर रहे हैं। 'सेव द चिल्ड्रन' ने अपनी रिपोर्ट में बच्चों के विकास में मा की अहम भूमिका का भी जिक्र किया है।

उसका मानना है कि भविष्य में मानवता की रक्षा का सूत्र मा के हाथ में है। मा ही बच्चे की पहली शिक्षक है, जो उसे स्कूल से लेकर समाज और देश तक में अपने अस्तित्व के लिए तैयार करती है। वह उसके पहले पाच साल में उसके व्यक्तित्व में उन सारे गुणों का समावेश करती है, जो दुनिया में उसके जीवन और संघर्ष इत्यदि से जूझने के लिए जरूरी है, लेकिन सफलता का यह सूत्र अकेले ही बच्चों को आगे नहीं बढ़ा सकता। इसके लिए किसी भी देश में राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूरी है।

राजनीतिक इच्छाशक्तिके इस नुस्खे में मा-बच्चे की सेहत सबसे अहम पहलू है। इसकी शुरुआत गर्भ धारण के साथ ही हो जानी चाहिए। गर्भवती स्त्री को जब तक उसके स्वास्थ्य, पोषण और सुरक्षा की गारटी न मिले, वह स्वस्थ संतान को कैसे जन्म दे पाएगी। लिहाजा, उसके लिए सभी तरह के संक्रमण से बचाव का इंतजाम बहुत जरूरी है। गर्भावस्था के दौरान उसकी कठिनाइयों की भरपूर निगरानी हो और बच्चे को जन्म देने के पहले और उसके बाद जच्चा-बच्चा का ख्याल तो जरूरी है ही। बच्चों की सेहत का ख्याल पूरे घर को रखना है। लिहाजा, घर के सदस्यों को बच्चों से जुड़ी छोटी-मोटी बातों का भी पता है, यह सुनिश्चित करना राजनीतिक इच्छाशक्ति का ही हिस्सा है।

विकासशील और औद्योगिक देशों में ऐसे बेहिसाब कार्यक्रम हैं, जो बच्चों के चौतरफा विकास के लिए जरूरी बातों का प्रशिक्षण देते हैं। वे बच्चों की देखभाल के साथ ही उन्हें बच्चों से कुकर्म और उनकी उपेक्षा जैसी बातों का मर्म बताते हैं। इन देशों में एड्स, सुनामी जैसी प्राकृतिक विपदाओं और श्रीलंका, अफगानिस्तान जैसे संघर्ष से जूझ रहे देश के बच्चों के लिए विशेष कार्यक्त्रम हैं। अमेरिका भी 'सबके लिए शिक्षा' नाम से कार्यक्रम चलाता है।

कल्याणकारी कार्यक्रमों से बच्चों की शिक्षा निश्चित तौर पर प्रभावित होती है। दिल्ली में चल रहे एक कार्यक्रम की बदौलत संबद्ध इलाके के बच्चे पढ़ाई की तरफ प्रवृत्त हुए हैं। इन इलाकों में लड़कियों की पढ़ाई में 7.7 और लड़कों की पढ़ाई में 3.2 का इजाफा हुआ है। इसी तरह स्कूल में आगे पढ़ने वाले छात्र भी बढ़े हैं। हमारे पड़ोसी देशों में श्रीलंका को छोड़कर बाकी देशों में प्राथमिक शिक्षा का दृश्य बहुत बढि़या नहीं है। भूटान में 20 फीसदी बच्चे प्राथमिक शिक्षा नहीं लेते हैं। नेपाल में 24 फीसदी और पाकिस्तान में 34 फीसदी बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। श्रीलंका में प्राथमिक शिक्षा लेने वाले बच्चों की तादाद 90 फीसदी है। वहा सिर्फ तीन फीसदी बच्चे स्कूल नहीं जाते और एक फीसदी बच्चों के फेल होने यानी एक ही कक्षा में दोबारा पढ़ने की नौबत आती है। वहा 93 फीसदी बच्चे पाचवीं तक की पढ़ाई पूरी कर लेते हैं।

'सेव द चिल्ड्रन' की पहलकदमी से कुछ देशों ने शिक्षा में परिवार और माहौल की भागीदारी के महत्व को समझ लिया है। संगठन की छत्रछाया में पूरी दुनिया में बच्चों और उससे जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हो रही है और उसी हिसाब से शिक्षा के अवसर देने के लिए प्रयत्न चल रहे हैं। बच्चों के विकास में मा की भूमिका को रेखाकित किया जा रहा है। लिहाजा माताओं की शिक्षा और उनके स्वास्थ्य के लिए भी इंतजाम हो रहे हैं। भारत में नन्हें बच्चों की प्राथमिक शिक्षा और उसके इर्द-गिर्द के प्रयासों पर 'सेव द चिल्ड्रन' कार्यक्रम में कोई खास जिक्र नहीं मिलता, पर बिहार में कोसी के कहर के बाद बेघर हुए बच्चों के लिए उसके शिक्षा के जो प्रयास चल रहे हैं, उनकी भी अनदेखी नहीं हो सकती। बहरहाल, बच्चों के बचाव और विकास की बुनियाद पर देश के सामाजिक, आर्थिक विकास का सपना बुनने वाली यह संस्था अपने प्रयासों में असर दिखाने लगी है।

पर पता नहीं उसे मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के स्कूलों की खबर है या नहीं। इतंजार बस यही है कि दुनिया का हर बच्चा कब भरपेट भोजन और भरपूर पढ़ाई कर पाएगा?

इन पर करो अमल, देखो फिर असर

अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसी 'सेव द चिल्ड्रन' के एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष पांच साल से कम उम्र के लगभग बीस लाख बच्चों की मौत होती है। यह संख्या दुनिया के किसी भी देश के मुकाबले अधिक है। पाच वर्ष से कम आयु में मृत्यु
की दर को 2010 से 2015 के बीच आधा करने के लिए सेव द चिल्ड्रन मिलेनियम डेवलपमेंट गोल-4 लेकर आई है। इसके तहत संस्था ने एक सात-सूत्रीय कार्यक्त्रम पेश किया है और विशेष रूप से भारत का ध्यान इन सात क्षेत्रों की ओर आकर्षित किया है।

भारत से कहा गया है कि वह विश्वसनीय राष्ट्रीय योजना लागू करे। इसके तहत भारत 2011 तक मां, नवजात शिशु और शिशु बचाव संबंधी विशेष योजना पर अमल शुरू कर देगा, जिस पर स्वास्थ्य और परिवार कल्याण, महिला और शिशु उत्थान, जल और शौच, नागरिक विकास मंत्रालय और नरेगा काम करेगा-

नवजात शिशु पर फोकस:

पचास प्रतिशत नवजात शिशु पहले महीने के अंदर ही मौत के शिकार हो जाते हैं। इसके लिए उनके जीवित रहने के उपायों पर विशेष जोर दिए जाने की सलाह दी गई है। चूंकि भारत में दो तिहाई प्रसव घरों में होते हैं, इसलिए नवजात शिशु की जरूरी देखभाल घर के साथ-साथ अस्पताल और स्वास्थ केंद्रों में उपलब्ध कराई जाए।

नवजात की देख रेख:

इसे प्राथमिकता दी जाए। इसमें मां, नवजात बच्चे के स्वास्थ, पोषण और अन्य संबंधित चीजों के बीच की दूरी को कम किया जाना शामिल है। इसके अलावा अमीर और गरीब विशेषरूप से अधिकारहीन वर्ग के बच्चों की मृत्यु दर के बीच की दूरी को कम करना भी शामिल है। अतिरिक्त संसाधन जुटाना: भारत को चाहिए कि 2015 तक स्वास्थ पर खर्च की जाने वाली जीडीपी की एक प्रतिशत रकम को बढ़ा कर पाच प्रतिशत करे, जो अंतरराष्ट्रीय औसत है। बच्चे के स्वास्थ्य, पोषण, पीने के पानी, स्वास्थ, विद्या, आजीविका और खाद्य सुरक्षा स्कीमों पर ख़र्च की जाने वीली रकम को दोगुना करे।

स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों को प्रशिक्षण-अतिरिक्त दिए गए पैसों में से कुछ हिस्सा हेल्थकेयर कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षण, उन्हें सामान देने और तैनात करने में खर्च किया जाए। भारत में प्रशिक्षित और उपकणों से लैस हेल्थकेयर कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि का लक्ष्य बनाया जाए। विशेष तौर पर सबसे ज्यादा गरीब और अधिकारहीन वर्गो की जरूरतों को पूरा करने के लिए।

कुपोषण पर काबू करें:

पोषण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पुष्टिकर अनुपूरक, विशेष स्तनपान कराने, पूरक खुराक और खाद्य किलाबंदी के साथ-साथ प्रमाणित बचाव के उपायों को अपनाया जाए। इसके अलावा कैश ट्रांसफर और सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों को सहायता प्रदान की जानी चाहिए।