मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

बिहार के होनहारों की आसमान छूने की चाहत


from danik jagran
अपने यहां एक कहावत बहुत मशहूर है, 'नौकरी करो सरकारी, नहीं तो बेचो तरकारी'। आपने भी सुना ही होगा। हम तरकारी और मोमोज 'बेचने' वाले दो ऐसे ग्रुप का जिक्र कर रहे हैं, जो गांव-देहात के आम किसान नहीं हैं, बल्कि इंटरनेशनल फेम इंस्टीट्यूट से एमबीए क्वालिफाइड टैलेंटेड होनहार हैं। मोटी तनख्वाह वाली नौकरी को ठेंगा दिखाकर इनलोगों ने वह काम शुरू किया, जिसे अब गांव के लोग भी करना नहीं चाहते। हिम्मत, विश्वास, पेशेंस, प्लानिंग और बिजनेस की हाइटेक टेक्निक के साथ बिहार के इन होनहारों ने सब्जी और चाइनीज फास्टफूड मोमोज का कारोबार शुरू किया। इस सफर में इन्हें कुछ परेशानियों को भी फेस करना पड़ा, पर जब दिल में आसमान छूने की तमन्ना जगी हो, तो इनके बढ़ते कदमों को कोई रोक नहीं सकता।

इस हाइटेक और कांपटीशन के दौर में एक ओर जहां लोग अपना पुश्तैनी काम करने को सोचने से भी कतराते हैं, वहीं कुछ वैसे भी हैं, जो अट्रैक्टिव पैकेज वाली नौकरी को ठुकराकर अपना बिजनेस बड़े शान से चलाते हैं। इसीलिए कहते हैं कि बिहार के टैलेंडेंट की कमी नहीं है। ये किसी भी फील्ड में जाएं, अपना लोहा मनवाने से पीछे नहीं हटते। हम जिन शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं, उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद से एमबीए पूरा करने के बाद अट्रैक्टिव सैलरी को ठुकराकर कुछ डिफरेंट करने की सोची। कौशलेंद्र और ओमप्रकाश ने एमबीए के दौरान ही यह डिसाइड कर लिया था कि इन्हें प्लेसमेंट में पार्टिसिपेट नहीं करना है।


2010 तक 100 करोड़ का टारगेट

कौशलेंद्र व ओमप्रकाश ने बताया कि हमारी तमन्ना सब्जियों को भी ब्रांड बनाने की है। जैसे डेयरी प्रॉडक्ट के रूप में 'सुधा' एक ब्रांड बन कर उभरा है, उसी तरह से वेजिटेबल्स में भी 'समृद्धि' एक ब्रांड बन कर उभरेगा। उन्होंने बताया कि कौशल्या फाउंडेशन के चेन खुलेंगे और केवल बिहार ही नहीं, यूपी और छत्तीसगढ़ में भी इसका विस्तार होगा। 2010 तक कंपनी का टर्नओवर 100 करोड़ पहुंचाने का टारगेट रखा है। उन्होंने बताया कि पिछले फाइनेंशियल इयर में कंपनी का टर्नओवर 89 लाख था तथा इस साल छह महीने में ही कंपनी का टर्नओवर डेढ़ करोड़ तक पहुंच गया है।

प्राइस कंट्रोल का है फंडा

छोटे किसानों की यह शिकायत होती है कि उनके प्रॉडक्ट का प्राइस एकाएक डाऊन हो जाता है। वजह होती है, एक साथ बड़ी मात्रा में प्रोडक्शन और उसके प्रिजर्व करने का इंतजाम न होना। इसके लिए कौशलेंद्र व ओमप्रकाश 'पॉलिहाऊस' प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। इस टेक्निक के जरिए किसी भी वेजिटेबल्स के प्रोडक्शन के टाइम को इस तरह मैनेज किया जाना संभव हो सकेगा कि उस समय में बड़ी मात्रा में इसका उत्पादन न हो। ओमप्रकाश ने इस बारे में बताया कि इस साल के अंत तक पांच पॉली हाऊस शुरू हो जाएंगे। एक पॉली हाऊस से पांच सौ किसानों को लाभ मिलेगा।

..और कारवां बनता गया

चूंकि कौशलेंद्र का फैमिली बैकग्राउंड फार्मिग रहा है। इसके लिए उन्होंने हर लेवल पर तैयारी की थी। जूनागढ़ इंजीनियरिंग कॉलेज से एग्रीकल्चर में बी टेक की पढ़ाई पूरी की और इसके बाद रही-सही कसर आईआईएम, अहमदाबाद से पूरी की। एमबीए की पढ़ाई पूरी होने के क्रम में बिहारी टैलेंट की एक जमात बन गई थी। सो पहले कौशलेंद्र ने बिहार से उपजने वाले वेजिटेबल को एक ब्रांड देने की सोची। इसमें इनका साथ दिया आईआईएम से ही पास ओम प्रकाश सिंह ने। उधर, एनएमआईएमएस, मुंबई से एमबीए कर चुके अनुज, एमएससी कर चुके धीरेंद्र एवं ग्रेजुएट हरेंद्र कुमार पटेल भी कौशल्या फाउंडेशन से जुड़ गए.

डेढ़ लाख से शुरू किया कारोबार

अपने स्कॉलरशिप की राशि और कुछ अन्य अवार्ड के तहत मिली राशि को कलेक्ट कर कौशलेंद्र और ओमप्रकाश ने इस कारोबार की नींव रखी। ब्रांड नेम रखा 'समृद्धि' और मदर एजेंसी के रूप में 'कौशल्या फाउंडेशन' को रजिस्टर्ड करवाया। लगभग 50 हजार रुपए की लागत से एक रेफ्रिजरेटेड वान बनवाया, जिसमें रखकर वेजिटेबल्स बाजार तक पहुंचाए जा सकते थे। ओमप्रकाश ने बताया कि पहले दिन का सेल था छह रुपए। हालांकि महीने के अंत तक यह राशि पांच सौ रुपए तक पहुंच गई. इसी महीने यह राशि करीब हजार रुपए तक जा पहुंची है। ओमप्रकाश का कहना है कि आज हर दिन करीब सत्तर हजार रुपए का करोबार हो रहा है। हर महीने स्टाफ्स पर 1.25 लाख रुपए खर्च हो रहे हैं। 25 लोगों को तो नौकरी मिली है और सत्तर लोग सीधे इससे जुड़े हैं। इनके अलावा पांच हजार किसानों को अपने प्रॉडक्ट को सीधे बेचने में सुविधा हो रही है।


आसमान छूने की चाहत

कहते हैं कि लीक से हटकर तीन लोग ही चलते हैं-शायर, शेर या फिर सपूत। कुछ लोग इसे सनक भी कहते हैं, क्योंकि जब जेब में पर मंथ 20-25 हजार रुपए आसानी से आ सकते हैं, वैसी स्थिति में लोग फांकाकशी की राह क्यों चलें? लेकिन इसीलिए तो ये दुनिया अजीब है और ह्यूमन नेचर के कारण कभी-कभी आदमी को रिस्क कवर करने में बड़ा मजा आता है। हां, इस रिस्क में कभी फायदा, तो कभी नुकसान होता है, लेकिन 'नो रिस्क, नो गेन' के फार्मूले पर चलने वालों के लिए लाइफ के मायने कुछ अलग होते हैं। ऐसी ही राहों पर निकल पड़े हैं बिहार के तीन यूथ-अमित सिन्हा, सुमन कुमार और उदय वत्स। तीनों का लक्ष्य एक ही है, बस नाम कमाना और अपने स्टेट के डेपलपमेंट के लिए काम करना।

एमबीए कर शुरू की इंटरप्रेन्योरशिप

अमित, सुमन और उदय तीनों ने केआर मंगलम इंस्टीच्यूट, दिल्ली से मास्टर्स इन बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई कंप्लीट की। कोर्स के दौरान तीनों को ही जॉब के ऑफर्स मिले, लेकिन टीचर्स के मोटिवेशन और कुछ अलग करने की चाह ने इन्हें वापस पटना ला दिया। यहां आकर तीनों ने खुद मार्केट सर्वे किया और चाइनीज फूड आइटम 'मोमोज' को लेकर एक बिजनेस प्लान बनाया। हालांकि इस प्लानिंग को ना फैमिली ने सपोर्ट किया और ना ही इनके कई फ्रेंड्स ने। लेकिन तीनों ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी और आज शहर के छह अच्छी लोकेशंस पर इनकी ट्रॉलियां लगती हैं, जहां पटनाइट्स मोमोज का लुत्फ शौक से उठाते हैं।

ओपनिंग विथ मिक्स वेज मोमोज

अभी तक आपने जहां भी मोमोज खाए होंगे, सिर्फ दो ही वेराइटीज मिली होगी-वेज मोमो और चिकेन मोमो। लेकिन इस हाइटेक ग्रुप ने 'यमी मोमोज' के नाम से जो चेन शुरू किया है, उसमें एक नई वेराइटी को इंट्रोड्यूस किया है। यह नई वेराइटी है 'मिक्स वेज मोमोज'। यह एक कंप्लीट न्यू वेराइटी है और यमी मोमोज के अलावा यह आपको कहीं और नहीं मिलेगी।

25 लोगों को मिला रोजगार

'मोमोज चेन' करने के पीछे मकसद के बारे में उदय बताते हैं कि कुछ ही दिनों पहले तक जॉब मिलना कोई मुश्किल बात नहीं थी, लेकिन एक बार रिसेशन आया और हाइली क्वालिफाइड और एक्सपीरिएंस्ड लोगों को भी अपनी जॉब से हाथ धोना पड़ा। ऐसे में क्यों ना हम कुछ ऐसा करें कि हमारे साथ कुछ और लोगों को इंप्लॉयमेंट मिले। वहीं सुमन ने बताया कि अगर हम कोई जॉब करते, तो अपनी फैमिली के लिए काम करते, लेकिन इस चेन के खुलने से अभी कुल 25 लोगों को रोजगार मिल पाया है। हालांकि अभी यह इनिशियल स्टेज है, आगे बहुत कुछ करना बाकी है।

पॉकेट मनी से की शुरुआत

अमित बताते हैं कि इस चेन को शुरू करने के लिए हमारे पास सबसे बड़ी प्रॉब्लम थी इंवेस्टमेंट की। हमारे पास प्लान था और हमारे प्रोजेक्ट गाइड अश्रि्वन भाटिया का विश्वास। उन्होंने हमें बहुत सपोर्ट किया और हर हाल में इस प्रोजेक्ट को शुरू करने को कहा। उनकी उम्मीद के साथ हमने अपनी पॉकेट मनी के साथ छह महीने पहले इस प्रोजेक्ट की शुरुआत की और मौर्या कांप्लेक्स, बोरिंग रोड, गांधी मैदान, खेतान मार्केट, एनआईटी और एक इंस्टीच्युट की कैंटीन में अपने काउंटर्स खोले।