मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

गर्म पानी का गाँव

जेठ की तपती दोपहरी हो या भादों की फुहार या फिर पूस की कड़ाके की सर्दी। गया जिले के मोहड़ा प्रखंड के मोहड़ा गांव के लोग वर्षो से ताजा पानी पीनेको संघर्ष कर रहे है। गांव के चापाकल और कुंओं से गर्म पानी ही निकलता है। तुरंत निकले पानी से तो हाथ तक जल जाता है।

तीन तरफ पहाड़ी और एक तरफ जंगल से घिरा है मोहड़ा गांव। गांव में 20 से 30 फीट नीचे पानी मिल जाता है। लेकिन ऐसा कि घंटों रखने के बाद ही पीने लायक हो पाता है। वैसे पानी का गहरा स्रोत ठंडा है, ऐसा इंडिया मार्का हैंडपंप और जेट पंप की बोरिंग कराने वाले कहते हैं। गांव के खेतों में बोरिंग का पानी ठंडा निकलता है।

यह गांव 30 घरों का है जहां तीन सरकारी चापाकल हैं, पर सभी तीस फुट केअ पानी पर लगे हैं। जिससे गर्म पानी ही देते हैं। गांव में 10 कुएं है। सभी घरों में निजी चापाकल भी हैं, पर भारी-भरकम खर्च के चलते लोगों ने गहरी बोरिंग नहीं कराई है। ऐसे में हर घरों में बड़ा-बड़ा घड़ा, नाद और ड्रम में पानी सुबह और शाम में स्टोर कर रखा जाता है। जोरों की प्यास लगती है तो पानी को ठंडा करने को पंखा से हवा देना पड़ता है।

मोहड़ा गांव के शिव शंकर यादव, गोपाल यादव, रामचन्द्र यादव बताते है कि नहाने, कपडे़ धोने और जानवरों को पानी पिलाने को भी ठंडा करने को पानी पहले से जमा करना पड़ता है। समस्या तब होती है जब गांव में किसी की बेटी की शादी होती है। जहां बेटी की शादी करते हैं, डर से नहीं बताते है कि पीने के पानी की समस्या है। ड्रम में पानी पहले से भरकर पूरे गांव के लोग इस समस्या को मिलकर बारात के दिन निपटाते है।

ग्रामीण कहते हैं कि जमीन के नीचे गंधक की चट्टान पर पूरा गांव बसा है। जिस कारण पूरे गांव में गर्म पानी निकलता है। हालांकि भूगर्भ शास्त्रियों की नजर में यह गांव आज तक नहीं आ सका है। मगध विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष व भूगोलवेता प्रो. राणा प्रताप सिंह बताते हैं कि राजगीर, तपोवन और जेठियन का क्षेत्र सल्फर जोन में आता है। कहीं-कहीं यूरेनियम के भी भंडार संभव हैं। ऐसे में जहां अधिक मात्रा सल्फर की है। वहां गर्म पानी निकलता है।