गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

अग्नि-5 की चिंता से दुबला हुआ चीन

अग्नि-5 की चिंता से दुबला हुआ चीन

अरुणाचल प्रदेश से लेकर दलाईलामा तक के मामले में भारत के लिए सिरदर्द बन रहा ड्रैगन यानी चीन अब इस चिंता में दुबला हो रहा है कि हम उसके हर कोने तक में मार करने वाली मिसाइलें विकसित कर रहे हैं। देश की मारक क्षमता में कई गुना इजाफा करने वाली बहुप्रतीक्षित अग्नि-5 मिसाइल का परीक्षण 2011 के शुरुआती महीनों में किया जाएगा लेकिन चीन अभी से इस भारतीय ब्राह्रास्त्र से भयाक्रांत है। अग्नि पांच की आंच से पैदा हुई चिंता की लकीरें उसके ललाट पर स्पष्ट देखी जा सकती है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र 'पीपुल्स डेली' ने इस आशय की खबर प्रकाशित की है।

बुधवार को पीपुल्स डेली में 'भारत की नई मिसाइल चीन के हरबिन तक हमले में सक्षम' शीर्षक से प्रकाशित खबर में चीन की चिंता साफ झलक रही है। अखबार के अनुसार आसानी से सड़क माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में सक्षम इस मिसाइल को भारत के उत्तरीपूर्वी इलाके से छोड़ने पर चीन के सबसे उत्तरी छोर हरबिन को भी तबाह किया जा सकता है। अखबार ने भारतीय गांडीव में शामिल होने जा रहे इस अचूक ब्रह्रमास्त्र के बारे में लिखा है कि यह चीन के राष्ट्रीय दिवस पर परेड में शामिल की गई मिसाइल डोंगफेंग-31ए के टक्कर की मिसाइल है।

एडवांस्ड सिस्टम्स लेबोरेटरी हैदराबाद द्वारा विकसित की जा रही लंबी दूरी की अग्नि-5 मिसाइल अपनी कई खूबियों के चलते अनोखी है। इस मिसाइल को आसानी से सड़क के रास्ते ले जाकर देश के किसी भी इलाके में तैनात किया जा सकता है। इस खूबी के चलते पूर्व निर्धारित पांच हजार किमी की इसकी मारक क्षमता बढ़कर सात हजार तक पहुंच जाती है। इसको आसानी से इस तरह समझा जा सकता है। स्वीडन की राजधानी स्टाकहोम को बंगलोर से निशाना नहीं बनाया जा सकता क्योंकि बंगलोर से वहां की दूरी सात हजार किमी है लेकिन जब अग्नि-5 मिसाइल को अमृतसर से दागा जाएगा तो स्वीडन की राजधानी को भी निशाना बनाया जा सकेगा। देश के विभिन्न भागों में इसको तैनात करके कमोबेश पूरी दुनिया अग्नि पांच की जद में हो जाएगी। केवल उत्तरी और दक्षिण अमेरिका को छोड़ दें तो अब वह दिन दूर नहीं जब दुनिया का हर कोना हमारी अग्नि-5 के निशाने पर होगा।


अग्नि-5 मिसाइल: एक नजर


श्रेणी-अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम)


इंजन: तीन चरणों वाला ठोस ईंधन


मारक क्षमता- 5000 किमी


प्रक्षेपण- 2011 के शुरुआत में


खूबी:


-दुनिया का कोना-कोना निशाने पर (उ.और द.अमेरिका छोड़कर)


-आसानी से सड़क द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर तैनाती


-देश की पहली कैनिस्टर्ड मिसाइल


-3 से 10 परमाणु अस्त्रों को ले जाने की क्षमता


- प्रत्येक अस्त्र से अलग-अलग निशाने तय किए जा सकने की खूबी


-एंटी बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम भेदने की क्षमता

बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

भोजन व शिक्षा के मोहताज बच्चे

तरक्की के तमाम दावों और दुनिया की उम्मीदों का केंद्र बनने के बावजूद भारत में नवजात शिशुओं और बच्चों की कुपोषण से मौत के आकड़े उसका सिर शर्म से नीचा कर रहे है।


अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसी 'सेव द चिल्ड्रन' के सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में हर साल पैदा होने वाले बच्चों में से आधे शिशुओं की पैदा होते ही मृत्यु हो जाती है। इस सर्वेक्षण पर भरोसा करें तो आठ से दस प्रतिशत सालाना स्थिर आर्थिक वृद्धि का सपना देख रहे भारत में 20 लाख बच्चे तो हर साल अपना पाचवा जन्मदिन मनाने से पहले ही भूख से होने वाले कुपोषण और उसके कारण लगने वाली बीमारियों से दम तोड़ देते हैं।

दुनिया में कुपोषण का शिकार हर तीसरा बच्चा भारत में रहता है और हर पंद्रहवें सेकेंड में एक बच्चा मौत की नींद सो जाता है।

शिक्षा के लिहाज से तो इन नन्हे बच्चों की और दुर्गति है। गावों में पढ़ने को स्कूल नहीं हैं और जहा स्कूल हैं, वहा कहीं इमारत नदारद है तो कहीं शिक्षकों का अता-पता नहीं है। गनीमत है कि इस मामले में भारत न तो अकेला है और न ही अग्रणी देशों में है। दुनिया के जिन 75 लाख बच्चों को प्राथमिक शिक्षा मयस्सर नहीं है, उनमें उस अमेरिका के बच्चे भी
शामिल हैं, जिसे तीसरी दुनिया के देश, विकास की मिसाल मानते हैं और उसके नक्श-ए-कदम पर चलने को आतुर रहते हैं।

अमेरिका में ढाई लाख बच्चे प्राथमिक शिक्षा के बाद पढ़ाई पूरी नहीं करते। यह खुलासा भी 'सेव द चिल्ड्रन' की माताओं की भूमिका पर जारी एक और रिपोर्ट में हुआ है। इसके अनुसार, दुनिया में ऐसे बेहिसाब बच्चे हैं, जो या तो समय से पहले स्कूल छोड़ देते हैं या उन्हें पढ़ने का मौका ही नहीं मिल पाता।

संगठन का मानना है कि बच्चों के ये बुनियादी वर्ष किसी भी देश में खुशहाली लाने का जरिया बन सकते हैं और यह तभी हो सकता है, जब बच्चों को मुकम्मल परवरिश, स्वस्थ पारिवारिक जीवन और सेहतमंद मा मिले।

दरअसल, बच्चे का छुटपन विशेषरूप से पहले पाच साल सबसे अहम होते हैं। यही वह समय है, जिसमें उसमें जीवन में विकास के बीज पड़ते हैं। वह इस दौरान जो सीखता-समझता है, उसी पर उसके जीवन की बुनियाद टिकी होती है। लिहाजा, यदि इस दौरान बच्चों को अच्छा जीवन न मिले, उनकी सही देखभाल न हो और पढ़ाई का मौका न मिले तो वह ताजिंदगी इसका खामियाजा उठाता रहता है।

'सेव द चिल्ड्रन' बच्चों को उम्र के पाचवे साल तक भरपूर पोषण, सुरक्षित जीवन और पढ़ाई इत्यदि के मौके दिलाने की दिशा में प्रयासरत है। इस संगठन ने दुनिया के 100 विकासशील देशों और अमेरिका के पाच राज्यों में बच्चों की स्थिति पर एक मार्गदर्शिका तैयार की है।

इसमें यह बताया गया है कि संबद्ध देश और राच्य अपने नौनिहालों को स्कूल में सफलता के लिए कैसे तैयार करते हैं। इसके विश्लेषण के लिए इन देशों के आर्थिक आकड़ों की भी जाच की गई है।

बच्चों के विकास के लिए चल रहे प्रयास और आर्थिक आकड़ों के विश्लेषण के बाद निकले नतीजों से यह पहचाना जा सकता है कि जिन देशों ने बच्चों के लिए निवेश किए, उन्हें मौके दिए, उन देशों में बच्चों की विकास की प्रवृत्ति दिखने लगी है।

रिपोर्ट में उन सभी उपकरणों और संसाधनों का भी जिक्र है, जो किसी बच्चे को स्वस्थ, सुरक्षित और शिक्षा के लिए जरूरी माहौल सुनिश्चित करते हैं। इसके साथ यह भी बताया गया है कि जिन लोगों को इनकी सबसे ज्यादा जरूरत है, उन तक वह पहुंच नहीं पाते।

किसी भी देश में बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा और स्कूल में उनकी सफलता में देश का कल्याण निहित है। दुनिया की आर्थिक खुशहाली का राज भी इन नौनिहालों की खुशी में छुपा है। यह एक मनोवैज्ञानिक सच्चाई तो है ही, लेकिन पूरी दुनिया में इस पर जो शोध हुए हैं, उससे भी यह साबित हो गया है कि कोई भी बच्चा स्कूल में तभी सफल होता है, जब उसे सीखने के लिए बढि़या माहौल मिले।

दुनिया में समाज की आमदनी बढ़ाने और लागत घटाने का भी यह सबसे अहम नुस्खा है। माना कि अमेरिका एक अमीर कद्दावर देश है, फिर भी वहा के बच्चे स्कूलों में बहुत अच्छा नहीं कर रहे हैं। इसकी वजह यही बताई जा रही है कि इन बच्चों को जरूरी पारिवारिक सुरक्षा नहीं मिल रही है।

मैक्सिको, नेवादा, मिसीसिपी, एरीजोना और अलबामा यह पाच अमेरिकी राच्य बच्चों की पढ़ाई में कम दिलचस्पी के गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। यहा बच्चों के विकास में अड़चन का सबसे अहम कारण अभिभावकों की भागीदारी का न होना है। उनके घर का माहौल पढ़ाई-लिखाई के माकूल नहीं है।

अमेरिका में पढ़ाई में गिरावट 1999 के आसपास आनी शुरू हुई। 1995 तक यह देश बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में अग्रणी था। वर्ष 2000 में स्थिति बिगड़नी शुरू हुई और यह आठवें पायदान पर पहुंच गया। 2006 में यह घटकर 14वें क्रम में आ गया। वहा कालेज छोड़ने वाले बच्चों की संख्या अचानक बढ़ने लगी है।

फिलहाल दुनिया के 24 औद्योगिक देशों के बीच शिक्षा के मामले में अमेरिका 18वें पायदान पर है। वहा के 53 फीसदी नौजवान बीच में ही कालेज की पढ़ाई छोड़ रहे हैं।


दरअसल, विकासशील देशों में पाच वर्ष तक के 40 फीसदी बच्चे बेहद गरीबी में जी रहे हैं। उनकी सेहत का खयाल रखने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। उन्हें भरपेट पौष्टिक भोजन भी नहीं मिल रहा है। यही वजह है कि उनकी क्षमता पूरी तरह पल्लवित नहीं हो रही है, न ही देश के विकास में उनकी भागीदारी का उपयोग हो रहा है। सेव द चिल्ड्रन के अनुसार, किसी देश के खुशहाल भविष्य की यह अहम शर्त है।

चार्ड, बुरूंडी, अफगानिस्तान, गीनिया, बिसाऊ और माली दुनिया के ऐसे देश हैं, जहा बच्चों को ठीक-ठाक प्राथमिक शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है। बुरूंडी में पाच वर्ष तक की उम्र के 25 फीसदी बच्चे स्कूल नहीं जाते। माली में 37 फीसदी और चार्ड में 40 फीसदी बच्चों को स्कूल का मुंह देखना नसीब नहीं हो पाता और गीनिया बिसाउ में 55 फीसदी बच्चे नहीं जानते कि पढ़ाई क्या होती है। इसकी वजह इन देशों के गरीबी है। यहा ऐसी सार्वजनिक सेवाओं का गंभीर अभाव है, जो इन बच्चों की सेहत का खयाल रख सके। समस्याओं और संघर्ष से जूझ रहे इन देशों के माहौल ने इन बच्चों को अपनी चपेट में ले लिया है और इसका असर इनके जीवन पर तो पड़ ही रहा है, इससे देश का भविष्य भी चौपट होता लग रहा है।

उधर क्यूबा, आर्मीनिया, साइप्रस, चिली और अजरबैजान ये पाच देश अपने बच्चों को बेहतर माहौल देने के लिए जाने जाते हैं। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और पारिवारिक जीवन की बदौलत यहा के बच्चे स्कूलों में बढि़या पढ़ाई कर रहे हैं। 'सेव द चिल्ड्रन' ने अपनी रिपोर्ट में बच्चों के विकास में मा की अहम भूमिका का भी जिक्र किया है।

उसका मानना है कि भविष्य में मानवता की रक्षा का सूत्र मा के हाथ में है। मा ही बच्चे की पहली शिक्षक है, जो उसे स्कूल से लेकर समाज और देश तक में अपने अस्तित्व के लिए तैयार करती है। वह उसके पहले पाच साल में उसके व्यक्तित्व में उन सारे गुणों का समावेश करती है, जो दुनिया में उसके जीवन और संघर्ष इत्यदि से जूझने के लिए जरूरी है, लेकिन सफलता का यह सूत्र अकेले ही बच्चों को आगे नहीं बढ़ा सकता। इसके लिए किसी भी देश में राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूरी है।

राजनीतिक इच्छाशक्तिके इस नुस्खे में मा-बच्चे की सेहत सबसे अहम पहलू है। इसकी शुरुआत गर्भ धारण के साथ ही हो जानी चाहिए। गर्भवती स्त्री को जब तक उसके स्वास्थ्य, पोषण और सुरक्षा की गारटी न मिले, वह स्वस्थ संतान को कैसे जन्म दे पाएगी। लिहाजा, उसके लिए सभी तरह के संक्रमण से बचाव का इंतजाम बहुत जरूरी है। गर्भावस्था के दौरान उसकी कठिनाइयों की भरपूर निगरानी हो और बच्चे को जन्म देने के पहले और उसके बाद जच्चा-बच्चा का ख्याल तो जरूरी है ही। बच्चों की सेहत का ख्याल पूरे घर को रखना है। लिहाजा, घर के सदस्यों को बच्चों से जुड़ी छोटी-मोटी बातों का भी पता है, यह सुनिश्चित करना राजनीतिक इच्छाशक्ति का ही हिस्सा है।

विकासशील और औद्योगिक देशों में ऐसे बेहिसाब कार्यक्रम हैं, जो बच्चों के चौतरफा विकास के लिए जरूरी बातों का प्रशिक्षण देते हैं। वे बच्चों की देखभाल के साथ ही उन्हें बच्चों से कुकर्म और उनकी उपेक्षा जैसी बातों का मर्म बताते हैं। इन देशों में एड्स, सुनामी जैसी प्राकृतिक विपदाओं और श्रीलंका, अफगानिस्तान जैसे संघर्ष से जूझ रहे देश के बच्चों के लिए विशेष कार्यक्त्रम हैं। अमेरिका भी 'सबके लिए शिक्षा' नाम से कार्यक्रम चलाता है।

कल्याणकारी कार्यक्रमों से बच्चों की शिक्षा निश्चित तौर पर प्रभावित होती है। दिल्ली में चल रहे एक कार्यक्रम की बदौलत संबद्ध इलाके के बच्चे पढ़ाई की तरफ प्रवृत्त हुए हैं। इन इलाकों में लड़कियों की पढ़ाई में 7.7 और लड़कों की पढ़ाई में 3.2 का इजाफा हुआ है। इसी तरह स्कूल में आगे पढ़ने वाले छात्र भी बढ़े हैं। हमारे पड़ोसी देशों में श्रीलंका को छोड़कर बाकी देशों में प्राथमिक शिक्षा का दृश्य बहुत बढि़या नहीं है। भूटान में 20 फीसदी बच्चे प्राथमिक शिक्षा नहीं लेते हैं। नेपाल में 24 फीसदी और पाकिस्तान में 34 फीसदी बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। श्रीलंका में प्राथमिक शिक्षा लेने वाले बच्चों की तादाद 90 फीसदी है। वहा सिर्फ तीन फीसदी बच्चे स्कूल नहीं जाते और एक फीसदी बच्चों के फेल होने यानी एक ही कक्षा में दोबारा पढ़ने की नौबत आती है। वहा 93 फीसदी बच्चे पाचवीं तक की पढ़ाई पूरी कर लेते हैं।

'सेव द चिल्ड्रन' की पहलकदमी से कुछ देशों ने शिक्षा में परिवार और माहौल की भागीदारी के महत्व को समझ लिया है। संगठन की छत्रछाया में पूरी दुनिया में बच्चों और उससे जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हो रही है और उसी हिसाब से शिक्षा के अवसर देने के लिए प्रयत्न चल रहे हैं। बच्चों के विकास में मा की भूमिका को रेखाकित किया जा रहा है। लिहाजा माताओं की शिक्षा और उनके स्वास्थ्य के लिए भी इंतजाम हो रहे हैं। भारत में नन्हें बच्चों की प्राथमिक शिक्षा और उसके इर्द-गिर्द के प्रयासों पर 'सेव द चिल्ड्रन' कार्यक्रम में कोई खास जिक्र नहीं मिलता, पर बिहार में कोसी के कहर के बाद बेघर हुए बच्चों के लिए उसके शिक्षा के जो प्रयास चल रहे हैं, उनकी भी अनदेखी नहीं हो सकती। बहरहाल, बच्चों के बचाव और विकास की बुनियाद पर देश के सामाजिक, आर्थिक विकास का सपना बुनने वाली यह संस्था अपने प्रयासों में असर दिखाने लगी है।

पर पता नहीं उसे मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के स्कूलों की खबर है या नहीं। इतंजार बस यही है कि दुनिया का हर बच्चा कब भरपेट भोजन और भरपूर पढ़ाई कर पाएगा?

इन पर करो अमल, देखो फिर असर

अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसी 'सेव द चिल्ड्रन' के एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष पांच साल से कम उम्र के लगभग बीस लाख बच्चों की मौत होती है। यह संख्या दुनिया के किसी भी देश के मुकाबले अधिक है। पाच वर्ष से कम आयु में मृत्यु
की दर को 2010 से 2015 के बीच आधा करने के लिए सेव द चिल्ड्रन मिलेनियम डेवलपमेंट गोल-4 लेकर आई है। इसके तहत संस्था ने एक सात-सूत्रीय कार्यक्त्रम पेश किया है और विशेष रूप से भारत का ध्यान इन सात क्षेत्रों की ओर आकर्षित किया है।

भारत से कहा गया है कि वह विश्वसनीय राष्ट्रीय योजना लागू करे। इसके तहत भारत 2011 तक मां, नवजात शिशु और शिशु बचाव संबंधी विशेष योजना पर अमल शुरू कर देगा, जिस पर स्वास्थ्य और परिवार कल्याण, महिला और शिशु उत्थान, जल और शौच, नागरिक विकास मंत्रालय और नरेगा काम करेगा-

नवजात शिशु पर फोकस:

पचास प्रतिशत नवजात शिशु पहले महीने के अंदर ही मौत के शिकार हो जाते हैं। इसके लिए उनके जीवित रहने के उपायों पर विशेष जोर दिए जाने की सलाह दी गई है। चूंकि भारत में दो तिहाई प्रसव घरों में होते हैं, इसलिए नवजात शिशु की जरूरी देखभाल घर के साथ-साथ अस्पताल और स्वास्थ केंद्रों में उपलब्ध कराई जाए।

नवजात की देख रेख:

इसे प्राथमिकता दी जाए। इसमें मां, नवजात बच्चे के स्वास्थ, पोषण और अन्य संबंधित चीजों के बीच की दूरी को कम किया जाना शामिल है। इसके अलावा अमीर और गरीब विशेषरूप से अधिकारहीन वर्ग के बच्चों की मृत्यु दर के बीच की दूरी को कम करना भी शामिल है। अतिरिक्त संसाधन जुटाना: भारत को चाहिए कि 2015 तक स्वास्थ पर खर्च की जाने वाली जीडीपी की एक प्रतिशत रकम को बढ़ा कर पाच प्रतिशत करे, जो अंतरराष्ट्रीय औसत है। बच्चे के स्वास्थ्य, पोषण, पीने के पानी, स्वास्थ, विद्या, आजीविका और खाद्य सुरक्षा स्कीमों पर ख़र्च की जाने वीली रकम को दोगुना करे।

स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों को प्रशिक्षण-अतिरिक्त दिए गए पैसों में से कुछ हिस्सा हेल्थकेयर कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षण, उन्हें सामान देने और तैनात करने में खर्च किया जाए। भारत में प्रशिक्षित और उपकणों से लैस हेल्थकेयर कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि का लक्ष्य बनाया जाए। विशेष तौर पर सबसे ज्यादा गरीब और अधिकारहीन वर्गो की जरूरतों को पूरा करने के लिए।

कुपोषण पर काबू करें:

पोषण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पुष्टिकर अनुपूरक, विशेष स्तनपान कराने, पूरक खुराक और खाद्य किलाबंदी के साथ-साथ प्रमाणित बचाव के उपायों को अपनाया जाए। इसके अलावा कैश ट्रांसफर और सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों को सहायता प्रदान की जानी चाहिए।

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

बिहार के होनहारों की आसमान छूने की चाहत


from danik jagran
अपने यहां एक कहावत बहुत मशहूर है, 'नौकरी करो सरकारी, नहीं तो बेचो तरकारी'। आपने भी सुना ही होगा। हम तरकारी और मोमोज 'बेचने' वाले दो ऐसे ग्रुप का जिक्र कर रहे हैं, जो गांव-देहात के आम किसान नहीं हैं, बल्कि इंटरनेशनल फेम इंस्टीट्यूट से एमबीए क्वालिफाइड टैलेंटेड होनहार हैं। मोटी तनख्वाह वाली नौकरी को ठेंगा दिखाकर इनलोगों ने वह काम शुरू किया, जिसे अब गांव के लोग भी करना नहीं चाहते। हिम्मत, विश्वास, पेशेंस, प्लानिंग और बिजनेस की हाइटेक टेक्निक के साथ बिहार के इन होनहारों ने सब्जी और चाइनीज फास्टफूड मोमोज का कारोबार शुरू किया। इस सफर में इन्हें कुछ परेशानियों को भी फेस करना पड़ा, पर जब दिल में आसमान छूने की तमन्ना जगी हो, तो इनके बढ़ते कदमों को कोई रोक नहीं सकता।

इस हाइटेक और कांपटीशन के दौर में एक ओर जहां लोग अपना पुश्तैनी काम करने को सोचने से भी कतराते हैं, वहीं कुछ वैसे भी हैं, जो अट्रैक्टिव पैकेज वाली नौकरी को ठुकराकर अपना बिजनेस बड़े शान से चलाते हैं। इसीलिए कहते हैं कि बिहार के टैलेंडेंट की कमी नहीं है। ये किसी भी फील्ड में जाएं, अपना लोहा मनवाने से पीछे नहीं हटते। हम जिन शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं, उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद से एमबीए पूरा करने के बाद अट्रैक्टिव सैलरी को ठुकराकर कुछ डिफरेंट करने की सोची। कौशलेंद्र और ओमप्रकाश ने एमबीए के दौरान ही यह डिसाइड कर लिया था कि इन्हें प्लेसमेंट में पार्टिसिपेट नहीं करना है।


2010 तक 100 करोड़ का टारगेट

कौशलेंद्र व ओमप्रकाश ने बताया कि हमारी तमन्ना सब्जियों को भी ब्रांड बनाने की है। जैसे डेयरी प्रॉडक्ट के रूप में 'सुधा' एक ब्रांड बन कर उभरा है, उसी तरह से वेजिटेबल्स में भी 'समृद्धि' एक ब्रांड बन कर उभरेगा। उन्होंने बताया कि कौशल्या फाउंडेशन के चेन खुलेंगे और केवल बिहार ही नहीं, यूपी और छत्तीसगढ़ में भी इसका विस्तार होगा। 2010 तक कंपनी का टर्नओवर 100 करोड़ पहुंचाने का टारगेट रखा है। उन्होंने बताया कि पिछले फाइनेंशियल इयर में कंपनी का टर्नओवर 89 लाख था तथा इस साल छह महीने में ही कंपनी का टर्नओवर डेढ़ करोड़ तक पहुंच गया है।

प्राइस कंट्रोल का है फंडा

छोटे किसानों की यह शिकायत होती है कि उनके प्रॉडक्ट का प्राइस एकाएक डाऊन हो जाता है। वजह होती है, एक साथ बड़ी मात्रा में प्रोडक्शन और उसके प्रिजर्व करने का इंतजाम न होना। इसके लिए कौशलेंद्र व ओमप्रकाश 'पॉलिहाऊस' प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। इस टेक्निक के जरिए किसी भी वेजिटेबल्स के प्रोडक्शन के टाइम को इस तरह मैनेज किया जाना संभव हो सकेगा कि उस समय में बड़ी मात्रा में इसका उत्पादन न हो। ओमप्रकाश ने इस बारे में बताया कि इस साल के अंत तक पांच पॉली हाऊस शुरू हो जाएंगे। एक पॉली हाऊस से पांच सौ किसानों को लाभ मिलेगा।

..और कारवां बनता गया

चूंकि कौशलेंद्र का फैमिली बैकग्राउंड फार्मिग रहा है। इसके लिए उन्होंने हर लेवल पर तैयारी की थी। जूनागढ़ इंजीनियरिंग कॉलेज से एग्रीकल्चर में बी टेक की पढ़ाई पूरी की और इसके बाद रही-सही कसर आईआईएम, अहमदाबाद से पूरी की। एमबीए की पढ़ाई पूरी होने के क्रम में बिहारी टैलेंट की एक जमात बन गई थी। सो पहले कौशलेंद्र ने बिहार से उपजने वाले वेजिटेबल को एक ब्रांड देने की सोची। इसमें इनका साथ दिया आईआईएम से ही पास ओम प्रकाश सिंह ने। उधर, एनएमआईएमएस, मुंबई से एमबीए कर चुके अनुज, एमएससी कर चुके धीरेंद्र एवं ग्रेजुएट हरेंद्र कुमार पटेल भी कौशल्या फाउंडेशन से जुड़ गए.

डेढ़ लाख से शुरू किया कारोबार

अपने स्कॉलरशिप की राशि और कुछ अन्य अवार्ड के तहत मिली राशि को कलेक्ट कर कौशलेंद्र और ओमप्रकाश ने इस कारोबार की नींव रखी। ब्रांड नेम रखा 'समृद्धि' और मदर एजेंसी के रूप में 'कौशल्या फाउंडेशन' को रजिस्टर्ड करवाया। लगभग 50 हजार रुपए की लागत से एक रेफ्रिजरेटेड वान बनवाया, जिसमें रखकर वेजिटेबल्स बाजार तक पहुंचाए जा सकते थे। ओमप्रकाश ने बताया कि पहले दिन का सेल था छह रुपए। हालांकि महीने के अंत तक यह राशि पांच सौ रुपए तक पहुंच गई. इसी महीने यह राशि करीब हजार रुपए तक जा पहुंची है। ओमप्रकाश का कहना है कि आज हर दिन करीब सत्तर हजार रुपए का करोबार हो रहा है। हर महीने स्टाफ्स पर 1.25 लाख रुपए खर्च हो रहे हैं। 25 लोगों को तो नौकरी मिली है और सत्तर लोग सीधे इससे जुड़े हैं। इनके अलावा पांच हजार किसानों को अपने प्रॉडक्ट को सीधे बेचने में सुविधा हो रही है।


आसमान छूने की चाहत

कहते हैं कि लीक से हटकर तीन लोग ही चलते हैं-शायर, शेर या फिर सपूत। कुछ लोग इसे सनक भी कहते हैं, क्योंकि जब जेब में पर मंथ 20-25 हजार रुपए आसानी से आ सकते हैं, वैसी स्थिति में लोग फांकाकशी की राह क्यों चलें? लेकिन इसीलिए तो ये दुनिया अजीब है और ह्यूमन नेचर के कारण कभी-कभी आदमी को रिस्क कवर करने में बड़ा मजा आता है। हां, इस रिस्क में कभी फायदा, तो कभी नुकसान होता है, लेकिन 'नो रिस्क, नो गेन' के फार्मूले पर चलने वालों के लिए लाइफ के मायने कुछ अलग होते हैं। ऐसी ही राहों पर निकल पड़े हैं बिहार के तीन यूथ-अमित सिन्हा, सुमन कुमार और उदय वत्स। तीनों का लक्ष्य एक ही है, बस नाम कमाना और अपने स्टेट के डेपलपमेंट के लिए काम करना।

एमबीए कर शुरू की इंटरप्रेन्योरशिप

अमित, सुमन और उदय तीनों ने केआर मंगलम इंस्टीच्यूट, दिल्ली से मास्टर्स इन बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई कंप्लीट की। कोर्स के दौरान तीनों को ही जॉब के ऑफर्स मिले, लेकिन टीचर्स के मोटिवेशन और कुछ अलग करने की चाह ने इन्हें वापस पटना ला दिया। यहां आकर तीनों ने खुद मार्केट सर्वे किया और चाइनीज फूड आइटम 'मोमोज' को लेकर एक बिजनेस प्लान बनाया। हालांकि इस प्लानिंग को ना फैमिली ने सपोर्ट किया और ना ही इनके कई फ्रेंड्स ने। लेकिन तीनों ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी और आज शहर के छह अच्छी लोकेशंस पर इनकी ट्रॉलियां लगती हैं, जहां पटनाइट्स मोमोज का लुत्फ शौक से उठाते हैं।

ओपनिंग विथ मिक्स वेज मोमोज

अभी तक आपने जहां भी मोमोज खाए होंगे, सिर्फ दो ही वेराइटीज मिली होगी-वेज मोमो और चिकेन मोमो। लेकिन इस हाइटेक ग्रुप ने 'यमी मोमोज' के नाम से जो चेन शुरू किया है, उसमें एक नई वेराइटी को इंट्रोड्यूस किया है। यह नई वेराइटी है 'मिक्स वेज मोमोज'। यह एक कंप्लीट न्यू वेराइटी है और यमी मोमोज के अलावा यह आपको कहीं और नहीं मिलेगी।

25 लोगों को मिला रोजगार

'मोमोज चेन' करने के पीछे मकसद के बारे में उदय बताते हैं कि कुछ ही दिनों पहले तक जॉब मिलना कोई मुश्किल बात नहीं थी, लेकिन एक बार रिसेशन आया और हाइली क्वालिफाइड और एक्सपीरिएंस्ड लोगों को भी अपनी जॉब से हाथ धोना पड़ा। ऐसे में क्यों ना हम कुछ ऐसा करें कि हमारे साथ कुछ और लोगों को इंप्लॉयमेंट मिले। वहीं सुमन ने बताया कि अगर हम कोई जॉब करते, तो अपनी फैमिली के लिए काम करते, लेकिन इस चेन के खुलने से अभी कुल 25 लोगों को रोजगार मिल पाया है। हालांकि अभी यह इनिशियल स्टेज है, आगे बहुत कुछ करना बाकी है।

पॉकेट मनी से की शुरुआत

अमित बताते हैं कि इस चेन को शुरू करने के लिए हमारे पास सबसे बड़ी प्रॉब्लम थी इंवेस्टमेंट की। हमारे पास प्लान था और हमारे प्रोजेक्ट गाइड अश्रि्वन भाटिया का विश्वास। उन्होंने हमें बहुत सपोर्ट किया और हर हाल में इस प्रोजेक्ट को शुरू करने को कहा। उनकी उम्मीद के साथ हमने अपनी पॉकेट मनी के साथ छह महीने पहले इस प्रोजेक्ट की शुरुआत की और मौर्या कांप्लेक्स, बोरिंग रोड, गांधी मैदान, खेतान मार्केट, एनआईटी और एक इंस्टीच्युट की कैंटीन में अपने काउंटर्स खोले।

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

डेढ़ करोड़ साल पहले गर्म था अंटार्कटिका


अंटार्कटिका यानी दूर-दूर तक फैली बर्फ और हाड़ कंपाती ठंड। दुनिया के सात महाद्वीपों में शुमार अंटार्कटिका हमेशा से ऐसा नहीं था। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि करीब एक करोड़ 57 लाख साल पहले अंटार्कटिका में गर्म हवाएं चला करती थीं। तब वहां वनस्पति व शैवाल [एल्गी] भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते थे।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज जलवायु परिवर्तन को समझने में बेहद मददगार साबित हो सकती है। एलएसयू म्यूजियम आफ नेचुरल साइंस के नेतृत्व में गठित एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने जीवाश्मों के अध्ययन में पाया कि अंटार्कटिका में कुछ हजार साल पहले ही गरम वातावरण खत्म हुआ था। वैज्ञानिकों ने सूक्ष्म जीवाश्मों के लिए 1107 मीटर अवसाद का अध्ययन किया जिसमें उन्हें दो मीटर मोटी परत में काफी मात्रा में जीवाश्म मिले।

वैज्ञानिकों की राय में, 'यह बेहद असाधारण है क्योंकि अंटार्कटिक में जमी बर्फ का निर्माण करीब तीन करोड़ 50 लाख साल पहले हुआ था। अत्यधिक कम तापमान में किसी भी वनस्पति व शैवाल का पैदा होना काफी मुश्किल है। प्रमुख शोधकर्ता सोफी वार्नी ने बताया कि नए नमूनों के अध्ययन से चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। अंटार्कटिका में डाइनोफ्लागेट सिस्ट [समुद्री या ताजे पानी में पाई जाने वाली वनस्पति] की मौजूदगी में 2000 गुना, शैवाल में पांच गुना और परागकणों में 80 गुना वृद्धि देखी गई। यह सब उस समय था जब अंटार्कटिका अपेक्षाकृत गर्म था। इस नए शोध से हमें जलवायु परिवर्तन को समझने में मदद मिलेगी।' परागकण, बीजाणु व डाइनोफ्लागेट्स सिस्ट जैसे अत्यंत छोटे कणों की मौजूदगी इस बात की पुष्टि करते हैं कि डेढ़ करोड़ साल पहले थोड़े समय के लिए ही सही लेकिन अंटार्कटिका में गर्म वातावरण रहा होगा।

वार्नी के मुताबिक 'शोध में मिले माइक्रोफासिल से हमें यह जानने में मदद मिलेगी कि उस समय अंटार्कटिका में वास्तव में कैसा वातावरण था और उस दौरान वहां क्या हुआ।

गर्म पानी का गाँव

जेठ की तपती दोपहरी हो या भादों की फुहार या फिर पूस की कड़ाके की सर्दी। गया जिले के मोहड़ा प्रखंड के मोहड़ा गांव के लोग वर्षो से ताजा पानी पीनेको संघर्ष कर रहे है। गांव के चापाकल और कुंओं से गर्म पानी ही निकलता है। तुरंत निकले पानी से तो हाथ तक जल जाता है।

तीन तरफ पहाड़ी और एक तरफ जंगल से घिरा है मोहड़ा गांव। गांव में 20 से 30 फीट नीचे पानी मिल जाता है। लेकिन ऐसा कि घंटों रखने के बाद ही पीने लायक हो पाता है। वैसे पानी का गहरा स्रोत ठंडा है, ऐसा इंडिया मार्का हैंडपंप और जेट पंप की बोरिंग कराने वाले कहते हैं। गांव के खेतों में बोरिंग का पानी ठंडा निकलता है।

यह गांव 30 घरों का है जहां तीन सरकारी चापाकल हैं, पर सभी तीस फुट केअ पानी पर लगे हैं। जिससे गर्म पानी ही देते हैं। गांव में 10 कुएं है। सभी घरों में निजी चापाकल भी हैं, पर भारी-भरकम खर्च के चलते लोगों ने गहरी बोरिंग नहीं कराई है। ऐसे में हर घरों में बड़ा-बड़ा घड़ा, नाद और ड्रम में पानी सुबह और शाम में स्टोर कर रखा जाता है। जोरों की प्यास लगती है तो पानी को ठंडा करने को पंखा से हवा देना पड़ता है।

मोहड़ा गांव के शिव शंकर यादव, गोपाल यादव, रामचन्द्र यादव बताते है कि नहाने, कपडे़ धोने और जानवरों को पानी पिलाने को भी ठंडा करने को पानी पहले से जमा करना पड़ता है। समस्या तब होती है जब गांव में किसी की बेटी की शादी होती है। जहां बेटी की शादी करते हैं, डर से नहीं बताते है कि पीने के पानी की समस्या है। ड्रम में पानी पहले से भरकर पूरे गांव के लोग इस समस्या को मिलकर बारात के दिन निपटाते है।

ग्रामीण कहते हैं कि जमीन के नीचे गंधक की चट्टान पर पूरा गांव बसा है। जिस कारण पूरे गांव में गर्म पानी निकलता है। हालांकि भूगर्भ शास्त्रियों की नजर में यह गांव आज तक नहीं आ सका है। मगध विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष व भूगोलवेता प्रो. राणा प्रताप सिंह बताते हैं कि राजगीर, तपोवन और जेठियन का क्षेत्र सल्फर जोन में आता है। कहीं-कहीं यूरेनियम के भी भंडार संभव हैं। ऐसे में जहां अधिक मात्रा सल्फर की है। वहां गर्म पानी निकलता है।