मंगलवार, 15 सितंबर 2009

जब तक बिहार नहीं सुधरता, प्रकाश झा नहीं रुकेंगें




परदे के पीछे. अमेरिका में ओलिवर स्टोन राजनैतिक फिल्में बनाने के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं और जॉन एफ. कैनेडी पर बनाई उनकी फिल्म अपनी साफगोई और साहस के कारण इस श्रेणी की श्रेष्ठतम फिल्म मानी जाती है।

भारत में राजनैतिक फिल्में प्रकाश झा बनाते हैं और ‘दामुल’ से लेकर ‘अपहरण’ तक उनकी सारी फिल्में सामाजिक दस्तावेज की तरह पढ़ी जानी चाहिए। ‘मृत्युदंड’ ‘गंगाजल’ और ‘अपहरण’ उनकी फिल्म त्रिवेणी है, जिसे सिलसिलेवार देखने पर ग्रामीण और कस्बाई भारत में हिंसा और भ्रष्टाचार की तस्वीर साफ उभरकर आती है।

उनकी ताजा फिल्म ‘राजनीति’, संभवत: उनकी फिल्म त्रिवेणी के उपसंहार की तरह गढ़ी है। अपनी श्रेणी में झा श्रेष्ठतम हैं। ओलिवर स्टोन का रास्ता प्रकाश झा के रास्ते से कम भयावह है,
क्योंकि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के माहौल में फिल्म बना रहे हैं और उन्हें इसकी भी स्वतंत्रता है कि कैनेडी के कातिल को उसके नाम से पुकारें।

इधर, प्रकाश झा को ऐसे वातावरण में फिल्म बनानी पड़ रही है, जहां कूपमंडूक सेंसर बोर्ड से पारित होने के बाद भी मोहल्लाई दादाओं की स्वीकृति लेना पड़ती है। कोई भी व्यावसायिक हुड़दंगी आपको कहीं भी रोक सकता है।
बिहार में कोसी नदी का संयम टूटा और आधा बिहार इसकी चपेट में आ गया। केंद्र सरकार ने तीन हजार करोड़ की सहायता भेजी, लेकिन मुसीबतजदा लोगों के पास कितनी पहुंची! पूरा देश नदी के तांडव को उस समय की सुर्खी मानकर जबानी सहानुभूति जताता रहा और आज सब लोग भूल गए, जबकि नदी के मारे आज भी संकट में जी रहे हैं। नदी का संयम टूटता है, परंतु बिहार का आलस्य नहीं टूटता। क्या इन सवालों के जवाब ‘राजनीति’ फिल्म में है? जब तक बिहार नहीं सुधरता, भारत की प्रगति नहीं हो सकती।