शनिवार, 26 सितंबर 2009

अमेरिका ने माना भारत की वैज्ञानिक क्षमता का लोहा


सदी की सबसे बड़ी खोज

सदी की सबसे बड़ी खोज और शून्य के बाद भारत की सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि के बाद इसरो के अध्यक्ष जी माधवन नायर ने जो संदेश दिया है, वह देश के कोने-कोने में फैले, यह इस खोज की सबसे बड़ी कामयाबी होगी। संवाददाताओं के सवालों के बौछार के बीच उन्होंने कहा कि इस खोज के बाद टेलीविजन प्रोग्राम में एक बच्चे ने एस्ट्रोनाट बनने की इच्छा जताई, तो उन्होंने समझ लिया कि इस मिशन का असर दूरगामी होगा। देश में साइंटिफिक टेंपर के विकास में यह खोज मील का पत्थर साबित होगी। वही साइंटिफिक टेंपर जिसका जिक्र बार-बार देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू करते थे और जिसका उल्लेख संविधान में दर्ज मूल कर्तव्यों में भी है।

यह बहुत बड़ी बात है कि देश की इस उपलब्धि को उस अमेरिका ने भी सलाम किया है जो हमें सपेरों और जादूगरों का देश मानता आया है। हमारे महर्षि कणाद, आर्यभंट्ट और चरक को खारिज करते आए एक देश के नजरिए में आया बदलाव
उल्लेखनीय है। गौर से देखा जाए तो यह सब इतना अचानक नहीं हुआ है, जैसा कि ऊपरी तौर पर दिख रहा है। इसमें उन धरती पुत्रों का अमूल्य योगदान है, जो अमेरिका गए। नासा में नौकरी हासिल की। अपनी विलक्षण बुद्धि का लोहा मनवाया। तभी तो नासा को यह यकीन हुआ कि उसके मून मिनरोलाजी मैपर [एम 3] को ले जाने के लिए सबसे अच्छा अंतरिक्ष यान भारत ही बना सकता है। इसरो के अक्ष्यक्ष ने सही कहा है कि चंद्रमा पर पानी की तलाश में नासा ने उपकरण जरूर भेजा था, लेकिन उसे सही जगह पर ले जाने का काम तो उस यान ने किया, जो पूरी तरह स्वदेश निर्मित है। जिन्होंने देश के अंतरिक्ष विज्ञानियों को सत्तार के दशक में थुंबा उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र में साइकिल पर राकेट ले जाते वैज्ञानिकों को देखा होगा, उन्हें यकीन नहीं होगा कि हमारे वैज्ञानिकों ने वह कर दिखाया है, जो विज्ञान कथाओं का हिस्सा था। अब यह कपोल कल्पना नहीं रह गई है कि चांद पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्री प्यास बुझाने के लिए उसकी सतह से पानी हासिल कर सकते हैं और अपने राकेट यान के लिए ईंधन के रूप में हाइड्रोजन प्राप्त कर सकते हैं।


यह खोज सिर्फ इस मायने में महत्वपूर्ण नहीं है कि इसने चंद्रमा पर पानी होने की पुष्टि की है बल्कि इसलिए भी अहम है कि इससे अन्य ग्रहों पर भी पानी की उपस्थिति का पता लगने की उम्मीद बढ़ गई है। इसके बावजूद इस वैज्ञानिक उपलब्धि के खुमार में यह नहीं भूला जा सकता कि इसी देश में एक हिमाचल प्रदेश है जहां महिलाओं को अब भी मासिक धर्म के दौरान गोशाला में रहना पड़ता है। एक अंधविश्वास के कारण। इसी अंधश्रद्धा का नतीजा है कि महिलाओं को डायन बताकर मार डाला जाता है। अंतहीन है यह फेहरिश्त। लेकिन इस अंधेरे में भी उम्मीद कि किरणें चमक रही हैं। अंतरिक्ष से लेकर खेल के मैदान तक हम प्रगति कर रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश के वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि एक दिन इस अवैज्ञानिकता का भी नाश करने में कामयाब होगी।

किंवदंतियों, लोरियों और कहानियों से गुजरता हुआ चंद्रमा हमारे इतने करीब पहुंच गया है कि अब दूर का नहीं लगता। इतना पास कि वहां इंसानी बस्तियां बसाए जाने के मंसूबे बांधे जा रहे हैं। क्या यह मंसूबे पूरे होंगे? विज्ञान की असीम संभावनाओं को देखते हुए यह असंभव नहीं लगता। इसके लिए हमें शुक्रगुजार होना चाहिए उन लेखकों का जिन्होंने कई दशक पहले अपनी कहानियों और उपन्यासों में इसकी कल्पना की।

अंतरिक्ष युग के शुरू होने से पहले ही रूस के लेखक कानस्टेंटिन सियोलकोवस्की [1857-1935] ने चांद पर इंसान के बसने की कल्पना की थी। 1950 के बाद तो कई वैज्ञानिक और इंजीनियर इस अवधारणा और उस पर आधारित डिजाइन को लेकर सामने आते रहे। मशहूर विज्ञान कथा लेखक आर्थर सी क्लार्क ने 1954 में अपनी पुस्तक [रांडवू विथ रामा] में फुले हुए माड्यूल के साथ चंद्रमा पर केंद्र बनाने की कल्पना की थी। क्लार्क के अनुसार एक अंतरिक्ष यान चंद्रमा की ओर जाएगा। उसमें सवार अंतरिक्ष यात्री इग्लू [बर्फीले इलाको में बनाया जाने वाला घर] जैसे माड्यूल में रहेंगे। उसके बाद एक गुंबदनुमा स्टेशन बनाया जाएगा, जिसमें हवा को साफ करने के उपकरण के अलावा एक परमाणु बिजली घर भी होगा। उसमें इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तोपें होंगी, जो अंतरिक्ष में एक ग्रह से दूसरे पर जाने वाले अंतरिक्ष यानों को लांच करेंगी। इसके बाद चंद्रमा को लेकर कई काल्पनिक उपन्यास प्रकाशित हुए। इस बीच धीरे-धीरे यह कल्पना अंतरिक्ष विज्ञानियों की परियोजनाओं में शुमार होने लगी।

अमेरिका में माइनिंग रिसर्च लैबोरेटरी के डायरेक्टर जान एस. रिंचार्ट ने 1959 में अपने शोध पत्र 'बेसिक क्राइटेरिया फार मून बिल्डिंग' में चंद्रमा पर रहने के लिए दोनों सिरों पर गुंबदवाले बेलनकार माड्यूल बनाने की कल्पना की। चूंकि उस समय यह माना जाता था कि चंद्रमा की सतह पर मीलों गहरी धूल है। इसलिए रिंचार्ट ने एक ऐसे माड्यूल का प्रस्ताव दिया, जो धूल के समुद्र में तैर सके। 1959 तक आते-आते अमेरिकी सेना चंद्रमा पर किला बनाने की परियोजना पर काम करने लगी। और, 1969 में तो इंसान ने चांद पर कदम रख दिया। अब वहां पानी की खोज। निश्चित रूप से आने वाला समय काफी रोमांचक होगा।

चंद्रमा के बारे में लिखे गए साहित्य और बनाई गई फिल्मों पर एक नजर:

किताबों में: द मून इज ए हार्श मिस्ट्रेस

राबर्ट ए हेनीन के इस उपन्यास में चांद पर शासन कर रहे धरती के सम्राटों के खिलाफ चंद्रमा पर बगावत की कहानी है

ट्रांस माइग्रेशन आफ सोल्स 1996 में प्रकाशित बिलियम बार्टन के इस उपन्यास में चंद्रमा से शुरू एक अभियान में एलियनों के ठिकाने की खोज की कहानी है

द मूनराइज एंड मूनवार

बेन बोवा द्वारा लिखित इस किताब के अनुसार एक अमेरिकी कंपनी चंद्रमा पर बेस बनाती है। जहां से बाद में धरती के खिलाफ बगावत होती है

मून फाल

जैक मैकडेविट द्वारा लिखित इस किताब में बताया गया है कि जैसे ही चंद्रमा पर पहला बेस बनकर तैयार होता है एक बड़ा धूमकेतु चंद्रमा से टकराने की ओर अग्रसर है।

टेलीविजन पर :1999 में ब्रिटिश टेलीविजन शो स्पेस में दिखाया गया कि चांद पर बना बेस अल्फा अपनी कक्षा से अलग होकर असाधारण तेजी से बढ़ रहा है।

1973 के ब्रिटिश साइंस फिक्सन टीवी शो 'मूनबेस 3' में चंद्रमा पर बने एक केंद्र की कहानी थी

2003 में जापान में 'प्लेनेट्स' नामक धारावाहिक प्रसारित किया गया

1980 के दौरान जापान में 'मोबाइल सूट गुंडम' धारावाहिक दिखाया गया। जिसमें चंद्रमा पर बसी बड़ी बस्तियों को दिखाया गया। बड़े क्रेटर्स के बगल में भूमिगत शहरों को भी दिखाया गया

फिल्मों में

ए स्पेस ओडिसी- 2001 में स्टेनली कुब्रिक और आर्थर सी क्लार्क ने इस फिल्म में चांद के क्लेवियस क्रेटर में चंद्रमा के केंद्र की कल्पना की थी

वीडियो गेम्स में

एप्पल कंप्यूटर द्वारा निर्मित लुनर कालोनी

आईरेम द्वारा तैयार मून पैट्रोल

क्लेवरमीडियाडाटकाम द्वारा तैयार कालोनी डिफेंडर