शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

एक जेल जहां कैदी बदल रहे हैं अपनी किस्मत

भागलपुर केंद्रीय कारागार में बंद कई खूंखार कैदी इन दिनों साहित्य का अध्ययन करने में गंभीरता से जुटे हुए हैं। इस कारण उनके सोचने के तौर-तरीके और समाज के बारे में उनके नजरिये में व्यापक बदलाव हो रहा है।

जेल में बदलाव की इस लहर को जन्म देने वाले वे 12 खूंखार कैदी हैं। जिनके हाथों मे अब फणीश्वर नाथ रेणु का 'मैला आंचल' और प्रेमचंद के 'गोदान' सहित टैगोर और गांधी की जीवनी देखी जा सकती है। गुनाहों से दूर होने के क्रम में ये कैदी रामायण व महाभारत जैसे धार्मिक पुस्तकों का नियमित अध्ययन कर रहे हैं।

बंदियों की रुचि को देख जेल अधीक्षक शिवेंद्र प्रियदर्शी ने कारागार के पुस्तकालय को समृद्ध बनाने का काम शुरू कर दिया है, अच्छी पुस्तकें मंगाई जा रहीं हैं। जेल में बदलाव की यह बयार लाने वाले बंदियों में इंद्रसेन शर्मा, अजय कुमार चौधरी, योगेश यादव, लालबाबू सिंह, रामविलास सिंह, योगेंद्र यादव, लल्लन यादव, संजय सिंह, चंद्रचूड़ यादव, गणेश सिंह, दयाशंकर सिंह व राजनीति सिंह आदि खूंखार अपराधी शामिल हैं, ये सभी संगीन जुर्म में सजा काट रहे हैं।

भलमानस बनने की चाहत में इनमें से कई जेल में रहते हुए स्नातक की डिग्री हासिल कर लिए हैं और कंप्यूटर ज्ञान में दक्ष हो गए हैं। इन बंदियों की रुचि को देखते हुए अन्य कैदी भी इनके हमराह होकर पुस्तकालय में बैठने लगे हैं। ऐसे बंदियों की संख्या अब 40 तक पहुंच गई है। कुछ बंदियों में तो अपनी निजी डायरी लिखने की आदत भी पड़ चुकी है।

राजनीति सिंह की डायरी में लिखे व्यंग्यात्मक अल्फाज हैरत में डालने वाले हैं। उसने लिखा है: चलो गुनाह के किस्से तमाम लिखते हैं, गिरी दीवार पर रिश्तों का नाम लिखते हैं। उन्हें गरीबी का मतलब समझ में आएगा, किसी फकीर के थैलों का दाम लिखते हैं। हमारे समाज के बच्चे भला न क्यूं मरते, अमीर लोग तो उनको ही काम लिखते हैं। किसी गरीब का दामन जो हमने थामा तो, मेरे खिलाफ वो सावन की शाम लिखते हैं।

गुनाहों की सजा काट रहे इन कठोर चेहरों के पीछे एक कड़वा सच यह भी है कि आज इन्हें अपने किए पर पछतावा है। अब ये गुनाह की दुनिया को तौबा कर जीने की नई राह पकड़ना चाहते हैं।