सोमवार, 14 सितंबर 2009

मातृभाषा हिन्दी या अंग्रेजी




भाषा के मुद्दे पर हम 62 साल पहले जहा थे, आज भी वहीं खडे़ है। इसका सर्वमान्य हल नहीं निकल पाना हम सबके लिए शर्म की बात है। इसी वजह से समय-समय पर भाषा को लेकर विवाद भी पैदा हुए है।

रूस में बोली जाने वाली अवार भाषा के जनकवि रसूल हमजातोव ने 'मेरा दागिस्तान' में प्रसिद्ध लोककवि अबूतालिब के साथ घटित एक रोचक किस्से का वर्णन किया है-


अबूतालिब एक बार मास्को में थे। सड़क पर उन्हे किसी राहगीर से कुछ पूछने की आवश्यकता हुई। शायद यही कि मंडी कहा है? संयोग से कोई अंग्रेज ही उनके सामने आ गया।

अंग्रेज अबूतालिब की बात न समझ पाया और पहले तो अंग्रेजी, फ्रासीसी, स्पेनी और शायद दूसरी भाषाओं में पूछताछ करने लगा।

अबूतालिब ने शुरू में रूसी, फिर लाक, अवार, लेजगीन, दार्गिन और कुमीक भाषाओं में अंग्रेज को अपनी बात समझाने की कोशिश की।

आखिर एक-दूसरे को समझे बिना वे दोनों अपनी-अपनी राह चले गए। एक बहुत ही सुसंस्कृत ने, जो अंग्रेजी भाषा के ढाई शब्द जानता था, बाद में अबूतालिब को उपदेश देते हुए कहा, 'देखा, संस्कृति का क्या महत्व है? अगर तुम कुछ अधिक सुसंस्कृत होते तो अंग्रेज से बात कर पाते। समझे न।'

'समझ रहा हूं।' अबूतालिब ने जवाब दिया, 'मगर अंग्रेज को मुझसे अधिक सुसंस्कृत कैसे मान लिया जाए? वह भी तो उनमें से एक भी जबान नहीं जानता था, जिनमें मैंने उससे बात करने की कोशिश की।'

हमारे मन में अपनी मातृभाषा और देश की भाषाओं के लिए अबूतालिब की तरह स्वाभिमान नहीं, बल्कि कुंठा है। इसी का परिणाम है कि हम भारतीय भाषाओं को और संस्कृति की बात करने वाले को दकियानूसी और पिछड़ा मानते है। अंग्रेजी भाषा व संस्कृति को अपनाने वालों को सम्मान की दृष्टि से देखते हुए उन्हे आधुनिक तथा प्रगतिशील होने का खिताब देते है। अंग्रेजी का ज्ञान नहीं होने पर अंग्रेजीदा तो हमारी उपेक्षा करते ही है, किंतु हम भी स्वयं को हीन व लज्जिात महसूस करते है।

अंतरराष्ट्रीयता का हवाला देकर ऐसा भ्रमजाल फैलाया गया कि मानो प्रत्येक भारतीय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाकर काम करना है। इसलिए हर किसी के लिए अंग्रेजी सिखना जरूरी है। इसी भ्रमजाल के कारण हम अपने बच्चों को महंगे से महगे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाना चाहते है। इन स्कूलों में डोनेशन के नाम पर मोटी रकम भेंट चढ़ाई जाती है। यह शिक्षा पद्धति बहुत महगी भी है। अपनी सीमित आय होने के कारण इसके लिए आर्थिक अपराधों की शरण में जाना पड़ता है। अत: अप्रत्यक्ष रूप से यह शिक्षा पद्धति भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा देती है।


अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने का सबसे बड़ा नुकसान प्रतिभा का हृास है। बच्चा जब प्राथमिक शिक्षा प्रारभ करता है तो वह उसके बहुमुखी विकास की उम्र होती है। तब उसे विदेशी भाषा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए बाध्य किया जाता है। इससे उसके विकास पर प्रतिकूल असर पड़ता है। वह बड़ा होकर प्रतियोगिताओं की तैयारी करता है तो अंग्रेजी फिर अड़चन पैदा करती है। प्रतियोगी को जो समय अपने विषय के गहरे अध्ययन में लगाना चाहिए, वह समय उसे अंग्रेजी के अध्ययन में लगाना पड़ता है। वह जब सरकारी या गैर सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करता है तो यहा पर भी सबसे पहले अंग्रेजी का ज्ञान होना आवश्यक है। योग्य से योग्य व्यक्ति को भी अंग्रेजी का ज्ञान न होने पर या कम होने पर अयोग्य करार दिया जाता है। ऐसे में हीन भावना आना स्वाभाविक है।

भारत में अभी भी करीब 35 फीसदी लोग अशिक्षित है। देश के एक बडे़ हिस्से में प्राथमिक शिक्षा की समुचित व्यवस्था तक नहीं है। और जहा व्यवस्था है भी, वहा सब रामभरोसे चल रहा है। ऐसे में अंग्रेजी की वकालत करना समझ से परे है।

असल में गुलामी के दौरान ही एक ऐसे वर्ग ने जन्म ले लिया था, जिसे देश-समाज से कुछ लेना-देना नहीं था। यह वर्ग आजादी भी नहीं चाहता था। इस वर्ग का मकसद अंग्रेजों के प्रति वफादारी साबित कर सत्ता सुख भोगना था। इसके लिए इसने खुद को अंग्रेजी रहन-सहन में ढालना शुरू कर दिया। यह वर्ग जुबान भी अंग्रेजों कीे बोलता। अंग्रेजों से नजदीकी साबित करने के लिए भारतीयों से दूरी बनाना इसकी मजबूरी थी। इसे श्रेष्ठता का दंभ होने लगा। अन्य लोगों को यह गंवार और जाहिल समझाता। दुर्भाग्यवश आजादी के बाद सत्ता की कुंजी इसी वर्ग के हाथ में आई। यह वर्ग तो चाहता ही नहीं कि मात्र एक भाषा से उन्हे जो श्रेष्ठता मिली है, वह छीन जाए।

भाषा को लेकर प्राथमिक स्तर से ही प्रयास किए जाने की जरूरत है। दस मिन्स टेन, जिस बच्चे को यह बताना पड़ रहा हो, उसे हिदी में काम करने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि जिस भी देश ने भी तरक्की की है, अपनी मातृभाषा में ही है। यदि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान हिदी में उपलब्ध नहीं है तो यह हिदी की नहीं, शासक वर्ग की कमी है। हिदी के प्रचार-प्रचार के नाम पर तमाम तरह की नौटकी करने की बजाए, विश्व ज्ञान-विज्ञान, साहित्य हिदी में उपलब्ध कराया जाए। एक अनुमान के अनुसार भारत में हिदी में बोलने वाले 40 प्रतिशत से अधिक है, जबकि अंग्रेजी बोलने वाले मात्र 0.021 प्रतिशत है।

आज हिदी किसी प्रदेश या देश तक सीमित नहीं रही। भारत से बाहर फीजी, मारीशस, गायना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, अरब, अमीरात, इग्लैंड, अमेरिका, कनाडा आदि कई देशों में लोग इसे दैनिक व्यवहार में लाते है। तकनीकी विकास के चलते आज हिदी में एसएमएस, ईमेल आदि सभी सुविधाएं उपलब्ध है। इटरनेट पर भी हिदी का साम्राच्य बढ़ा है। हिंदी ने विश्वभाषा का रूप धारण कर लिया है।

हिदी को लेकर एक बात अक्सर कही जाती है कि गैर हिदी भाषी क्षेत्रों विशेषकर दक्षिण भारत में हिदी का विरोध है। यह बात पूर्णत: सही नहीं है। गैर हिदी भाषी प्रदेशों में हिदी का विरोध हुआ तो वह राजनीति प्रेरित था।

और यदि अंग्रेजी ही राजभाषा के काबिल है तो फिर हिदी पखवाड़ा, हिदी सप्ताह और हिंदी दिवस जैसे ढोंग करने की क्या जरूरत है? क्यों मंत्रालयों और विभागों में हिदी अधिकारी नियुक्त कर करोड़ों रुपये बरबाद किए जा रहे है? क्यों हिदी अकादमी, हिदी विश्वविद्यालय खोले जा रहे है? जो भाषा इस देश के काबिल ही नहीं है और जिसमें इस देश की कार्यपालिका, न्याय पालिका और विधायिका काम नहीं कर सकती है, उसके प्रचार-प्रचार के लिए क्यों देश की धन, श्रम और समय नष्ट किया जा रहा है?

भाषा के मुद्दे को और टालने की बजाए, तुरत समाधान किया जाना चाहिए। इसके लिए दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत है और इसका राजनेताओं में अभाव है। इसलिए इनसे अपेक्षा करना बेकार है। जब पूरे देश में आदोलन शुरू हुए, तभी आजादी मिल सकी। आज ऐसे ही देशव्यापी आदोलन की जरूरत है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा का मसला, आजादी से कम महत्वपूर्ण नहीं है।