मंगलवार, 15 सितंबर 2009

बिहार मैरिज रजिस्ट्रेशन रूल 2006

तो अवैध है ये सभी शादियां



पटना। फूला-फूला फिरे जगत में होत हमारो ब्याह। शादी हो या विवाह, ये शब्द मन में रोमांच भरने के लिए काफी होते हैं। वाइफ वुड बी हसबैंड और हसबैंड वुड बी वाइफ को लेकर मन में कई तरह के ख्यालात बुनते हैं। सपने गढ़ते हैं। फिर वो घड़ी भी आती है जब घर में मंगल ध्वनि गूंजती हैं, शहनाइयां बजती हैं और घोड़े पर सवार होकर दुल्हे राजा हसबैंड बनने की लालसा के साथ वुड बी वाइफ को विदा कराने उसके घर जा पहुंचता है। दो परिवारों के इस मिलन का प्रॉसेस काफी लंबा है, लेकिन सारे प्रॉसेस पूरा कर दो अजनबी प्यार के पवित्र रिश्ते में जीवनभर के लिए बंध जाते हैं। ये बात तो सभी जानते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस प्रॉसेस को पूरा कर आपने शादी की है वह अवैध है। झटका लगा ना? लगने की बात है भी, क्योंकि सच्चाई यही है कि आपने हिन्दू धार्मिक रीति-रिवाज से जिसे अपना हसबैंड या वाइफ बनाया है, उससे आपके रिलेशन को तब तक मान्यता नहीं है, जब तक कि गवर्नमेंट के बही-खाते में आपके नाम और विवरण दर्ज न हो जायें। दो अजनबी परिवार एक होने के लिए तमाम दूसरे प्रॉसेस तो पूरे करते हैं, लेकिन एक मामूली और छोटा काम करना भूल जाते हैं या फिर कहिए करना ही नहीं चाहते, जिससे उनकी शादी को गवर्नमेंट के बही खाते में मान्यता नहीं मिल सकती है। तो क्या ऐसी शादियां अवैध हैं। यह हम नहीं आंकड़े कहते है।. यदि कानून के आइने में इन शादियों को परखें, तो 100 में 98 परसेंट शादियां अवैध हैं.




ज्यादा उत्सुकता नहीं दिखती

अमूमन शादियां कई प्रकार से होती हैं। अगर सिर्फ हिन्दू धर्म की बात करें तो इसमें भी शादियां कई प्रकार से होती हैं। अमूमन व्यवस्था के अनुकूल हिन्दू रीति रिवाज और कर्मकांड से ज्यादा शादियां होती हैं। लेकिन 1954 में बने कानून [विशेष विवाह निबंधन नियमावली-1954] के अनुसार हिन्दू कर्मकांड या रीति रिवाज से हुई शादियों का रजिस्ट्रेशन भी अनिवार्य है। लेकिन सिर्फ बिहार की क्यों देश के किसी भी दूसरे प्रांत में शादियों के रजिस्ट्रेशन को लेकर वैसे युवा जिनकी निकट फ्यूचर में शादी होने वाली है या फिर शादी शुदा जीवन बीता रहे लोगों में बहुत ज्यादा उत्सुकता नहीं दिखती है।

स्टेट गवर्नमेंट ने बदला कानून

करीब तीन साल पहले स्टेट की नीतीश गवर्नमेंट ने 1954 के शादी कानून में ड्रास्टिक चेंजेज किये। गवर्नमेंट ने फैसला लिया कि वर्ष 2006 के बाद स्टेट में जितनी भी शादियां होंगी, उनका रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा। पहले के नियमों को गवर्नमेंट ने शिथिल भी किया। 2006 में शादियों के रजिस्ट्रेशन के लिए जो कानून बना उसे नाम दिया गया बिहार मैरिज रजिस्ट्रेशन रूल 2006। इस कानून में ऐसे प्रावधान हैं कि यदि कोई शादी करने के बाद रजिस्ट्रेशन के लिए बहुत भागदौड़ के कारण ऐसा करने से भागता है, तो उसे अब ऐसा नहीं करना होगा। क्योंकि रजिस्ट्रेशन कर सर्टिफिकेट इश्यू करने के अधिकार गवर्नमेंट ने ग्राम पंचायत के मुखिया, वार्ड कमिश्नर और अरबन एरिया में काउंसलर को सौंपा है।

बस कदम बढ़ाने की जरूरत

स्टेट गवर्नमेंट को उम्मीद थी कि उसके इस फैसले को लेकर लोग उत्साह दिखाएंगे और दो कदम बढ़ा कर जिस प्रकार शादियों के लिए उत्साह पूर्वक तमाम कामों को अंजाम देते हैं, उसी प्रकार शादियों के रजिस्ट्रेशन के लिए भी आगे आएंगे। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। यह सच्चाई है कि 2006 में इस कानून के बाद भी अब तक पूरे स्टेट में महज 145 के करीब नव विवाहितों ने अपनी मैरिज को लीगल रूप दिया और शादियों का रजिस्ट्रेशन कराया। गवर्नमेंट की सोच थी कि रजिस्ट्रेशन को लेकर सबसे ज्यादा उत्साह मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास दिखाएंगे। हां, अपर मिडिल क्लास और अपर क्लास के लोग शायद इसमें ज्यादा इंटरेस्टेड ना हों। लेकिन अपर क्लास के लोग तो रजिस्ट्रेशन को नहीं ही आए, इस क्लास के अलावा भी किसी ने रजिस्ट्रेशन को लेकर कोई उत्साह नहीं दिखाया।

तो भरना पड़ सकता है दंड

2006 में बने कानून का पालन हर क्लास और तबके के लोगों को करना था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। शायद कहीं ना कहीं गवर्नमेंट को इस बात का एहसास भी था इसलिए गवर्नमेंट ने कानून में दंड के प्रावधान भी किए। व्यवस्था ऐसी की गई कि मैरिज के अगले दिन से लेकर तीस दिनों के भीतर रजिस्ट्रेशन कराना मस्ट होगा। अगर कोई विवाहित जोड़ा ऐसा नहीं करता है तो उसे 90 दिनों के अंदर रजिस्ट्रेशन कराना होगा और दंड स्वरूप एक सौ रुपए देने होंगे। इसके बाद यदि रजिस्ट्रेशन नहीं कराता है तो वैसी स्थिति में संबंधित विवाहितों से अधिकतम एक हजार रुपए दंड स्वरूप लेने की व्यवस्था की गई।

नियम-कानून से फर्क नहीं पड़ता

कहा जाता है कि नियम तो तोड़ने के लिए ही बनते हैं और सच्चाई भी यही है कि नियम बन रहे हैं और टूट भी रहे हैं। यह कटु सत्य है कि पूरे बिहार की बात छोड़ भी दें तो अकेले पटना शहर में शादियों के मौसम में चार से पांच हजार युवा शादी के बंधन में बंध जाते है। शहर के प्रतिष्ठित होटल मौर्या और चाणक्या सिर्फ चार महीने के विवाह के मौसम में दो सौ से चार सौ शादियां करा देते हैं, लेकिन यह भी सच्चाई है कि इन शादियों का कोई रजिस्ट्रेशन नहीं होता। शादियों के रजिस्ट्रेशन के क्या मायने हो सकते हैं। इसका अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि आपको राशन कार्ड बनाने से लेकर पासपोर्ट बनाने तक में इस रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट का यूज करना होता है, लेकिन आज के युवा मानते हैं कि पैसे के बल पर तमाम सुविधाएं घर बैठे मिल जाती हैं वैसी स्थिति में इतनी भाग दौड़ का क्या मतलब है। जिस दिन शादी के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट की आवश्यकता होगी, उसी दिन थोड़े से पैसे खर्च कर बनवा लिया जाएगा।


सोशल साइंटिस्ट डा. रणधीर कुमार सिंह का मानना है कि ये पूरा मामला अवेयरनेस से जुड़ा हुआ है। लोग आज भी अपने हिसाब से दुनिया चलाना चाहते हैं। उनके पास पैसा है वे पैसे के जोर पर तमाम सुविधा हासिल कर लेने का माद्दा रखते हैं। गवर्नमेंट जब इस प्रकार के कानून बनाती है तो उसकी मॉनिटरिंग से लेकर प्रचार तक की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके बाद दंड के भी कड़े प्रावधान होने चाहिए। अब बताइये रजिस्ट्रेशन नहीं कराने पर दंड स्वरूप एक हजार रुपए लेने का प्रावधान है। जो हजार रुपए का पानी पी जाते हैं उनके लिए हजार रुपए खर्च करना कौन सा मुश्किल काम है तो आज जरूरत है कि कोई कानून अगर लागू किया जाए तो उसका व्यापक प्रचार प्रसार भी किया जाए।


कानून बनाने और दंड का प्राभ्धान करने से सिर्फ लोगों की रूचि इसमें नहीं बढ़ सकती| सरकार को चाहिए की ग्राम पंचायत के मुखिया, वार्ड कमिश्नर और अरबन एरिया में काउंसलर के द्वारा हर सादियों में जाकर सगुण के तौर पर १०० या ५०० रूपये दे और साथ ही साथ सादी विवाह को भी रजिस्ट्रेशन करे|