बुधवार, 30 सितंबर 2009

शाकाहार की महिमा


शाकाहार मांस न खाने को कहा गया है। सनातन धर्म में शाकाहारी होना अनिवार्य नहीं, पर यह प्रबुद्ध व्यक्ति, वेदव्यास, भीष्म, आदि शंकराचार्य, पतञ्जलि (योगसूत्र), वल्लभाचार्य, स्वामिनारायण, महात्मा गांधी और बहुत-से स्वामी के आचरण से जोडा जाता है। अहिंसा और करुणा शाकाहार का तत्त्व हैं। अहिंसा को परम धर्म माना जाता है (अहिंसा पर्मो धर्म:)| भारतीय संस्कृति में हमेशा से शाकाहार की महिमा पर जोर दिया गया है, लेकिन वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के कई अध्ययनों के बाद शाकाहार का डंका अब विश्व भर में बजने लगा है। शरीर पर शाकाहार के सकारात्मक परिणामों को देखते हुए दुनियाभर में लोगों ने अब मांसाहार से किनारा करना शुरू कर दिया है।

विश्वभर के शाकाहारियों को एक स्थान पर लाने और खुरपका-मुंहपका तथा मैडकाऊ जैसे रोगों से लोगों को बचाने के लिए उत्तरी अमेरिका के कुछ लोगों ने 70 के दशक में नॉर्थ अमेरिकन वेजिटेरियन सोसाइटी का गठन किया। सोसाइटी ने 1977 से अमेरिका में विश्व शाकाहार दिवस मनाने की शुरुआत की। सोसाइटी मुख्य तौर पर शाकाहारी जीवन के सकारात्मक पहलुओं को दुनिया के सामने लाती है। इसके लिए सोसाइटी ने शाकाहार से जुड़े कई अध्ययन भी कराए हैं।


दिलचस्प बात यह है कि सोसाइटी के इस अभियान के शुरू होने के बाद से अकेले अमेरिका में लगभग 10 लाख से ज्यादा लोगों ने मांसाहार को पूरी तरह त्याग दिया है। विश्व शाकाहार दिवस के अवसर पर आहार विशेषज्ञ डा. अमिता सिंह ने बताया कि हाल के एक शोध के मुताबिक शाकाहारी भोजन में रेशे बहुतायत में पाए जाते हैं और इसमें विटामिन तथा लवणों की मात्रा भी अपेक्षाकृत ज्यादा होती है।

डा. अमिता ने बताया कि ऐसे भोजन में पानी की मात्रा ज्यादा होती है, जिससे मोटापा कम होता है। मांसाहार की तुलना में शाकाहारी भोजन में संतृप्त वसा और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होती है, जिससे यह हृदय रोगों की आशंका कम करता है।

आहार विशेषज्ञ डा. अंजुम कौसर ने बताया कि अनाज, फली, फल और सब्जियों में रेशे और एंटीऑक्सीडेंट ज्यादा होते हैं, जो कैंसर को दूर रखने में सहायक होते हैं। डा. कौसर ने बताया कि उनके पास कई ऐसे मरीज आए, जिन्होंने मांसाहार त्यागने के बाद अपने स्वास्थ्य में कई सकारात्मक परिवर्तन देखे।


फिजीशियन डा. केदार नाथ शर्मा ने बताया कि बहुत से लोग गोश्त को अच्छे स्वाद के नाम पर तेज मसाला डाल कर देर तक पकाते हैं। इस प्रक्रिया से पका गोश्त खाने पर कार्डियोवेस्कुलर सिस्टम को बहुत नुकसान पहुंचता है। यह भोजन रक्तचाप बढ़ाने के साथ रक्तवाहिनियों में जम जाता है, जो आगे चल कर दिल की बीमारियों को न्यौता देता है।

पिछले दिनों अमेरिका के एक अंतरराष्ट्रीय शोध दल ने इस बात को प्रमाणित किया कि मांसाहार का असर व्यक्ति की मनोदशा पर भी पड़ता है। शोधकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि लोगों की हिंसक प्रवृत्ति का सीधा संबंध मांसाहार के सेवन से है। अध्ययन के परिणामों ने इस बात की और संकेत दिया कि मांसाहार के नियमित सेवन के बाद युवाओं में धैर्य की कमी, छोटी-छोटी बातों पर हिंसक होने और दूसरों को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।

सोसाइटी की गतिविधियां शुरूआत में अमेरिकी उपमहाद्वीप तक सीमित रहीं, लेकिन बाद में इसने अपने कार्यक्षेत्र को यूरोपीय महाद्वीप समेत पूरे विश्व में फैलाया। एक अक्टूबर के दिन दुनिया भर में शाकाहार प्रेमी मांसाहार के नुकसान के बारे में लोगों को जानकारी देने के लिए विभिन्न स्थानों पर कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।


हाल ही में किए गए एक शोध के मुताबिक पता चला है कि शाकाहारी लोगों को कैंसर का खतरा कम होता है ।
तो शाक सब्ज़ी खायें और इस नामुराद बीमारी से बचें ।

शाकाहार जीवन को दीर्धायु, शुद्ध, बलवान एवं स्वस्थ बनाता है। शाकाहारी भोजन मन में दया, समानता, आपसी स्नेह और सहनशीलता उत्पन्न करता है। शारीरिक नैतिक और आध्यात्मिकसभी दृष्टि से शाकाहारी
भोजन मानव के लिये सर्वोत्तम है। शाकाहारी अधिक उत्पादक हैं और कम से कम अपव्ययी है। दुर्बल रोगी फलों अथवा सब्जियों के रसों का उपयोग कर स्वास्थय लाभ प्राप्त कर सकता है। मनुष्य के दाँतों और दाँतों की रचना शाकाहारी भोजन के लिये की है। फलाहार विटामिन की कमी के कारण होने वाले रोगों से बचाव व छुटकारा देता है।

शनिवार, 26 सितंबर 2009

अमेरिका ने माना भारत की वैज्ञानिक क्षमता का लोहा


सदी की सबसे बड़ी खोज

सदी की सबसे बड़ी खोज और शून्य के बाद भारत की सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि के बाद इसरो के अध्यक्ष जी माधवन नायर ने जो संदेश दिया है, वह देश के कोने-कोने में फैले, यह इस खोज की सबसे बड़ी कामयाबी होगी। संवाददाताओं के सवालों के बौछार के बीच उन्होंने कहा कि इस खोज के बाद टेलीविजन प्रोग्राम में एक बच्चे ने एस्ट्रोनाट बनने की इच्छा जताई, तो उन्होंने समझ लिया कि इस मिशन का असर दूरगामी होगा। देश में साइंटिफिक टेंपर के विकास में यह खोज मील का पत्थर साबित होगी। वही साइंटिफिक टेंपर जिसका जिक्र बार-बार देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू करते थे और जिसका उल्लेख संविधान में दर्ज मूल कर्तव्यों में भी है।

यह बहुत बड़ी बात है कि देश की इस उपलब्धि को उस अमेरिका ने भी सलाम किया है जो हमें सपेरों और जादूगरों का देश मानता आया है। हमारे महर्षि कणाद, आर्यभंट्ट और चरक को खारिज करते आए एक देश के नजरिए में आया बदलाव
उल्लेखनीय है। गौर से देखा जाए तो यह सब इतना अचानक नहीं हुआ है, जैसा कि ऊपरी तौर पर दिख रहा है। इसमें उन धरती पुत्रों का अमूल्य योगदान है, जो अमेरिका गए। नासा में नौकरी हासिल की। अपनी विलक्षण बुद्धि का लोहा मनवाया। तभी तो नासा को यह यकीन हुआ कि उसके मून मिनरोलाजी मैपर [एम 3] को ले जाने के लिए सबसे अच्छा अंतरिक्ष यान भारत ही बना सकता है। इसरो के अक्ष्यक्ष ने सही कहा है कि चंद्रमा पर पानी की तलाश में नासा ने उपकरण जरूर भेजा था, लेकिन उसे सही जगह पर ले जाने का काम तो उस यान ने किया, जो पूरी तरह स्वदेश निर्मित है। जिन्होंने देश के अंतरिक्ष विज्ञानियों को सत्तार के दशक में थुंबा उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र में साइकिल पर राकेट ले जाते वैज्ञानिकों को देखा होगा, उन्हें यकीन नहीं होगा कि हमारे वैज्ञानिकों ने वह कर दिखाया है, जो विज्ञान कथाओं का हिस्सा था। अब यह कपोल कल्पना नहीं रह गई है कि चांद पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्री प्यास बुझाने के लिए उसकी सतह से पानी हासिल कर सकते हैं और अपने राकेट यान के लिए ईंधन के रूप में हाइड्रोजन प्राप्त कर सकते हैं।


यह खोज सिर्फ इस मायने में महत्वपूर्ण नहीं है कि इसने चंद्रमा पर पानी होने की पुष्टि की है बल्कि इसलिए भी अहम है कि इससे अन्य ग्रहों पर भी पानी की उपस्थिति का पता लगने की उम्मीद बढ़ गई है। इसके बावजूद इस वैज्ञानिक उपलब्धि के खुमार में यह नहीं भूला जा सकता कि इसी देश में एक हिमाचल प्रदेश है जहां महिलाओं को अब भी मासिक धर्म के दौरान गोशाला में रहना पड़ता है। एक अंधविश्वास के कारण। इसी अंधश्रद्धा का नतीजा है कि महिलाओं को डायन बताकर मार डाला जाता है। अंतहीन है यह फेहरिश्त। लेकिन इस अंधेरे में भी उम्मीद कि किरणें चमक रही हैं। अंतरिक्ष से लेकर खेल के मैदान तक हम प्रगति कर रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश के वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि एक दिन इस अवैज्ञानिकता का भी नाश करने में कामयाब होगी।

किंवदंतियों, लोरियों और कहानियों से गुजरता हुआ चंद्रमा हमारे इतने करीब पहुंच गया है कि अब दूर का नहीं लगता। इतना पास कि वहां इंसानी बस्तियां बसाए जाने के मंसूबे बांधे जा रहे हैं। क्या यह मंसूबे पूरे होंगे? विज्ञान की असीम संभावनाओं को देखते हुए यह असंभव नहीं लगता। इसके लिए हमें शुक्रगुजार होना चाहिए उन लेखकों का जिन्होंने कई दशक पहले अपनी कहानियों और उपन्यासों में इसकी कल्पना की।

अंतरिक्ष युग के शुरू होने से पहले ही रूस के लेखक कानस्टेंटिन सियोलकोवस्की [1857-1935] ने चांद पर इंसान के बसने की कल्पना की थी। 1950 के बाद तो कई वैज्ञानिक और इंजीनियर इस अवधारणा और उस पर आधारित डिजाइन को लेकर सामने आते रहे। मशहूर विज्ञान कथा लेखक आर्थर सी क्लार्क ने 1954 में अपनी पुस्तक [रांडवू विथ रामा] में फुले हुए माड्यूल के साथ चंद्रमा पर केंद्र बनाने की कल्पना की थी। क्लार्क के अनुसार एक अंतरिक्ष यान चंद्रमा की ओर जाएगा। उसमें सवार अंतरिक्ष यात्री इग्लू [बर्फीले इलाको में बनाया जाने वाला घर] जैसे माड्यूल में रहेंगे। उसके बाद एक गुंबदनुमा स्टेशन बनाया जाएगा, जिसमें हवा को साफ करने के उपकरण के अलावा एक परमाणु बिजली घर भी होगा। उसमें इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तोपें होंगी, जो अंतरिक्ष में एक ग्रह से दूसरे पर जाने वाले अंतरिक्ष यानों को लांच करेंगी। इसके बाद चंद्रमा को लेकर कई काल्पनिक उपन्यास प्रकाशित हुए। इस बीच धीरे-धीरे यह कल्पना अंतरिक्ष विज्ञानियों की परियोजनाओं में शुमार होने लगी।

अमेरिका में माइनिंग रिसर्च लैबोरेटरी के डायरेक्टर जान एस. रिंचार्ट ने 1959 में अपने शोध पत्र 'बेसिक क्राइटेरिया फार मून बिल्डिंग' में चंद्रमा पर रहने के लिए दोनों सिरों पर गुंबदवाले बेलनकार माड्यूल बनाने की कल्पना की। चूंकि उस समय यह माना जाता था कि चंद्रमा की सतह पर मीलों गहरी धूल है। इसलिए रिंचार्ट ने एक ऐसे माड्यूल का प्रस्ताव दिया, जो धूल के समुद्र में तैर सके। 1959 तक आते-आते अमेरिकी सेना चंद्रमा पर किला बनाने की परियोजना पर काम करने लगी। और, 1969 में तो इंसान ने चांद पर कदम रख दिया। अब वहां पानी की खोज। निश्चित रूप से आने वाला समय काफी रोमांचक होगा।

चंद्रमा के बारे में लिखे गए साहित्य और बनाई गई फिल्मों पर एक नजर:

किताबों में: द मून इज ए हार्श मिस्ट्रेस

राबर्ट ए हेनीन के इस उपन्यास में चांद पर शासन कर रहे धरती के सम्राटों के खिलाफ चंद्रमा पर बगावत की कहानी है

ट्रांस माइग्रेशन आफ सोल्स 1996 में प्रकाशित बिलियम बार्टन के इस उपन्यास में चंद्रमा से शुरू एक अभियान में एलियनों के ठिकाने की खोज की कहानी है

द मूनराइज एंड मूनवार

बेन बोवा द्वारा लिखित इस किताब के अनुसार एक अमेरिकी कंपनी चंद्रमा पर बेस बनाती है। जहां से बाद में धरती के खिलाफ बगावत होती है

मून फाल

जैक मैकडेविट द्वारा लिखित इस किताब में बताया गया है कि जैसे ही चंद्रमा पर पहला बेस बनकर तैयार होता है एक बड़ा धूमकेतु चंद्रमा से टकराने की ओर अग्रसर है।

टेलीविजन पर :1999 में ब्रिटिश टेलीविजन शो स्पेस में दिखाया गया कि चांद पर बना बेस अल्फा अपनी कक्षा से अलग होकर असाधारण तेजी से बढ़ रहा है।

1973 के ब्रिटिश साइंस फिक्सन टीवी शो 'मूनबेस 3' में चंद्रमा पर बने एक केंद्र की कहानी थी

2003 में जापान में 'प्लेनेट्स' नामक धारावाहिक प्रसारित किया गया

1980 के दौरान जापान में 'मोबाइल सूट गुंडम' धारावाहिक दिखाया गया। जिसमें चंद्रमा पर बसी बड़ी बस्तियों को दिखाया गया। बड़े क्रेटर्स के बगल में भूमिगत शहरों को भी दिखाया गया

फिल्मों में

ए स्पेस ओडिसी- 2001 में स्टेनली कुब्रिक और आर्थर सी क्लार्क ने इस फिल्म में चांद के क्लेवियस क्रेटर में चंद्रमा के केंद्र की कल्पना की थी

वीडियो गेम्स में

एप्पल कंप्यूटर द्वारा निर्मित लुनर कालोनी

आईरेम द्वारा तैयार मून पैट्रोल

क्लेवरमीडियाडाटकाम द्वारा तैयार कालोनी डिफेंडर

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती है पटन देवी


भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती है पटन देवी


पटना। नवरात्र के प्रारंभ होते हुए माता दुर्गा के मंदिरों में भक्तों की भीड़ लगने लगती है। देशभर के सभी शक्तिपीठों में भक्तों का नवरात्र के समय जनसैलाब उमड़ पड़ता है।

पटना के 'पटन देवी' शक्तिपीठ में भी नवरात्र में बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते है। मान्यता है कि यहां भक्तों की सभी मनोकामना पूर्ण हो जाती है। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे दिल से यहां आकर मां की अराधना करते है उनकी मनोकामना जरुर पूर्ण होती है।


मंदिर के महंत विजय शंकर गिरी बताते है कि यहां वैदिक और तांत्रिक विधि से पूजा होती है। वैदिक पूजा सार्वजनिक होती है, जबकि तांत्रिक पूजा मात्र आठ-दस मिनट की होती है लेकिन इस मौके पर विधान के अनुसार भगवती का पट बंद रहता है। गिरी बताते है कि यहां सती की दाहिनी जांघ गिरी थी, इस कारण यह शक्ति पीठों में एक है।


गिरी के अनुसार नवरात्र में यहां महानिशा पूजा का सबसे अधिक महत्व है। उन्होंने कहा कि पटन देवी ग्राम देवी के रूप में यहां पूजित है। मान्यता के मुताबिक मंदिर के पीछे एक बहुत बड़ा गड्ढ़ा है, जिसे 'पटन देवी खंदा' कहा जाता है। मान्यता है कि यहीं से निकालकर देवी की तीन मूर्तियों को मंदिर में स्थापित किया गया था यहां महाकाली, महासरस्वती तथा महालक्ष्मी की प्रतिमाएं स्थापित है।

सोमवार, 21 सितंबर 2009

अंध्विस्वाश की अदालत



भभुआ। मानव की अंतरिक्ष में छुट्टियां मनाने और चांद पर बस्तियां बसाने की योजना के बीच, बिहार के कैमूर जिले में अंधविश्वास के चलते भूतों की अदालत लगती है जिसमें कथित तौर पर भूत, डायन और चुड़ैल से मुक्ति दिलाई जाती है।

यह अदालत नवरात्र के दौरान लगती है। इस वर्ष भी नवरात्र शुरू होते ही कैमूर जिले के केचैनपुर प्रखंड स्थित हरसू ब्रह्माधाम में कथित भूत प्रेत आदि बाधाओं से पीड़ित लोग पहुंच रहे हैं।

किसी का कहना है कि उसके सर पर उसके पड़ोसी ने भूत बिठा रखा है तो कोई कहता है कि श्मशान के पास से गुजरते समय उस पर भूत सवार हो गया। कोई कुलदेवता की नाराजगी से परेशान है तो कोई किसी तांत्रिक से पीछा छुड़ाने की बात करता है। किसी को आशंका है कि प्रेत बाधा के कारण वह संतान सुख से वंचित है तो किसी को व्यापार में हानि हो रही है।

राजधानी दिल्ली के जाने माने मनोविज्ञानी समीर पारेख भूत प्रेत आदि की बातों को सिरे से नकारते हुए कहते हैं कि यह अंधविश्वास के अलावा और कुछ नहीं है। उन्होंने कहा कि हम जिस जगह पर रहते हैं उसके आसपास के माहौल का हम पर गहरा असर होता है। वहां प्रचलित कोई विचार इतना गहरा होता है कि लोग उसी पर अमल करते रहते हैं और उसकी सच्चाई की तह तक नहीं जाते।

राजस्थान से जी एस पटेल अपने पुत्र सतीश को लेकर हरसू ब्रह्माधाम पहुंचे। उनका कहना था कि उनके पुत्र का प्रेत बाधा के कारण मानसिक संतुलन बिगड़ गया था और हरसू ब्रह्माधाम पहुंच कर उसे इससे मुक्ति मिल गई।

हरसू ब्रह्माधाम में ओझा भूत उतारने के लिए मंत्र बुदबुदाते हुए पीड़ित व्यक्ति के शरीर पर छड़ी घुमाता है फिर पीड़ित की छड़ी से पिटाई करता है। पीड़ित चीखता चिल्लाता है। ओझा उससे पूछता है 'कौन हो तुम'। अगर इस सवाल के जवाब में पीड़ित 'भूत या चुडै़ल' कहता है तो उसकी बुरी तरह पिटाई की जाती है।

यहां स्थानीय भाषा में ओझा को सोखा कहा जाता है। पीड़ित को पीटते हुए सोखा कथित भूत से चले जाने को कहता है। इसके बाद पीड़ित ठीक हो जाता है।

डा समीर पारेख स्पष्ट करते हैं कि यह मानसिक रोग या भूत प्रेत वाली कोई बात नहीं है। यह जो कुछ है वह उसी गहरी सामाजिक धारणा का असर है जो अंधविश्वास की वजह से लोगों के मन में गहरे तक जमी होती है। कुछ लोग इस स्थिति का फायदा उठाते हुए धन कमाने लग जाते हैं।

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद से बलजीत मिश्र अपनी पत्नी को लेकर दो साल पहले यहां आए थे। इस निसंतान दंपत्ति को लगता था कि किसी बाधा की वजह से वे संतान सुख से वंचित हैं। हरसू ब्रह्माधाम आने के बाद उन्हें पुत्र हुआ और इस साल वे आभार व्यक्त करने यहां आए हैं।

इस बारे में डा पारेख कहते हैं कि इस तथ्य को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता और न ऐसे कोई वैज्ञानिक प्रमाण हैं।

कुष्ठ रोग से ग्रसित महाराष्ट्र के अमरावती के सुभाष पवार इससे निजात पाने के लिए यहां पहुंचे हैं और उन्हें उम्मीद है कि बाबा के दरबार से वे खाली नहीं लौटेंगे।

हरसू ब्रह्माधाम स्थित मंदिर के पुजारी पंडित राजकेश्वर त्रिपाठी ने बताया कि यहां पहुंचते ही लोगों के दैहिक, दैविक एवं भैतिक तीनों प्रकार के कष्ट स्वत: दूर हो जाते हैं। पुजारी ने कहा कि स्थानीय लोगों के अलावा यहां देश के अन्य राज्यों से भी लोग आते हैं।

कॉफी की लोकप्रियता




कॉफी दुनिया भर में किस तरह से लोकप्रिय हुई, यह कहानी बेहद दिलचस्प है। इंटरनेशनल कॉफी ऑर्गनाइजेशन केअनुसार, कॉफी की शुरुआत अरब देशों से हुई। यमन में पंद्रहवीं सदी के आसपास इसके पौधों की खेती की जाती थी। वैसे, अरब के व्यापारी किसी उर्वर बीज का व्यापार नहीं करते थे।

गौरतलब है कि कॉफी के बीन्स ही कॉफी के बीज होते हैं। जब इनके बाहरी हिस्से को उतार दिया जाता है, तो ये बीज उर्वर नहीं रह जाते। इस तरह, काफी समय तक कॉफी अरब देशों तक ही सीमित हो गई। वे डच थे, जो कॉफी को इन देशों से निकालकर हॉलैंड लाए। एशिया और भारत में भी कॉफी को लाने का श्रेय डच व्यापारियों को ही जाता है।

अरब के लोग शुरुआती समय में कॉफी के स्वाद से परिचित नहीं थे। कॉफी के प्रभाव का अंदाजा उन्हें तब हुआ, जब जानवरों ने इन पौधों को चरना शुरू किया। दरअसल, वे कॉफी के बीज खाने के बाद कुछ अजीब सी हरकतें करने लगते थे। उस समय आमतौर पर कैट नामक झाडी का प्रयोग स्टीमुलेंट के रूप में प्रयोग होता था। लेकिन जल्द ही इसका साइड इफेक्ट पता चला, जो काफी नुकसानदेह था।

जब लोगों को पता चला कि कॉफी के बीजों का भी स्टीमुलेंट की तरह प्रयोग हो सकता है, तो उन्होंने इनका सेवन करने में बिल्कुल देर नहीं की। हां, उस समय लोग इसे कॉफी नहीं, गहवा कहते थे। कहते हैं गहवा इसलिए पॉपुलर हुआ, क्योंकि इस्लाम में नशीले पदार्थो की मनाही थी और गहवा में इसकी भरपाई करने का सारा गुण था।

लगभग ग्यारहवीं सदी के आसपास कॉफी सेवन को बढावा देने के लिए कॉफी हाउसेस बनने लगे, जहां लोग कॉफी पीने के लिए इकट्ठा होते थे। जबकि ये स्थान विचारशील लोगों के विचार विनिमय और बहस मुबाहिसों के लिए लोकप्रिय होने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि अरब समाज में एक तरह से सकारात्मक बदलाव पैदा हुआ। और इस तरह, कॉफी की प्रतिष्ठा में खूब इजाफा हुआ।

लगभग सोलहवीं सदी के आसपास इसकी खुशबू यूरोपीय देशों में भी फैलने लगी। हालांकि हर नई चीज की तरह कॉफी सेवन को लेकर भी तरह-तरह की अफवाहें सुनी जातीं। इसे कई नामों से नवाजा गया। कुछ इसे बाइटर इनवेंशन कहते। इन विवादों से दूर 1652 के आसपास यूरोप में पहला कॉफी हाउस बना। इसे पेनी यूनिवर्सिटीज कहा गया। पेनी इसलिए क्योंकि वहां एक पेनी यानी पैसा देने के बाद ही एक कप कॉफी मिलती थी।

सत्रहवीं सदी के मध्य में कॉफी की खुशबू अमेरिकी देशों में भी फैलने लगी। चाय से ज्यादा लोग कॉफी को पसंद करने लगे। आज दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील कॉफी इंडस्ट्री का गढ है। कॉफी हाउसेस के बनने और कॉफी के उत्पादन और इसकी गुणवत्ता को बढाने का प्रयास जारी है। व्यापार के लिए तेल के बाद कुछ बहुमूल्य उपयोगी वस्तुओं में कॉफी का स्थान सबसे ऊपर है। दिन की शुरुआत करना हो या थकावट से निजात पाने के लिए कॉफी हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है।

कॉफी, एक ऐसा पेय है जिसे कभी स्टॆटस सिम्बोल की तरह पीया जाता है, कभी महज समय बिताने के लिए कॉफी शॉप में पीया जाता है या फिर बस मज़े के लिए पीया जाता है. देखा गया है कि उत्तर भारत के लोग कॉफी के प्रति उदासीन ही होते हैं. इसके विपरीत दक्षिण भारत में कॉफी एक नियमित पेय के रूप में ज्यादा प्रचलित है.

वैसे कॉफी में कोको की मात्रा उसे तुरंत स्फूर्तिदायक पेय बना देती है. दिन भर की दौड़ भाग से थके आदमी को एक कप कॉफी मिल जाए तो उसकी सारी थकान दूर हो जाती है.

ऐसा माना जाता रहा है कि अधिक कॉफी पीने से स्वास्थ्य को नुकसान हो सकता है. परंतु अब संशोधनों से साबित हुआ है कि एक दिन में पाँच कप तक कॉफी पीने से स्वास्थ्य को कोई नुकसान नहीं होता. बल्कि कॉफी कई बिमारियों की रोकथाम में अत्यंत उपयोगी साबित हुई है.अल्ज़ाइमर, फेफडो की पथरी, डिप्रेशन, तनाव, आदि समस्याओं से निदान दिलाने में कॉफी बहुत कारगर है.

रिसर्चरों का दावा है कि रोज हरी कॉफी पीने से अतिरिक्त चर्बी से छुटकारा पाया जा सकता है। रिसर्च में वैज्ञानिकों ने पाया है कि हरी कॉफी का क्लोरोजेनिक एसिड आहार नली में शुगर के अवशोषण को घटाता है और फैट के खत्म होने की प्रक्रिया को तेज करता है। वैज्ञानिकों ने अपनी स्टडी में पाया कि जिन्होंने रोज़ एक कप हरी कॉफी पी, उनका दो सप्ताह में वजन करीब डेढ़ किलो और एक महीने में दो किलो कम हो गया।

ब्रिटिश अखबार डेली मेल ने वैज्ञिनक लॉरेंट फ्रेसनेल के हवाले से कहा, 'कॉफी हरी चाय के समान है। इसके कच्चे और बिना भुने स्वरूप में मौजूद तत्व पाचन बढ़ाते हैं और वजन कम करने में मदद करते हैं। दुर्भाग्य से यह तत्व भूनने के दौरान नष्ट हो जाते हैं इसलिए नियमित तौर पर पी जाने वाली कॉफी में नहीं मिलते।' शोध के परिणाम जरनल ऑफ क्लिनिकल न्यूट्रिशन में छपे हैं।

कॉफी पीने से शरीर में ग्लूकोज और मेटाबोलिजम की क्रियाओं में सरलता आती है. स्फूर्ति का अनुभव होता है. रक्त प्रवाह सुचारु बनता है. कॉफी पीने से शरीर में कैफिन, क्लोरोजेनिक एसिड, मेग्नेशियम, पोटेशियम, विटामीन बी3, ट्रीग्नोलेन जैसे तत्व भी मिलते हैं.

वैसे तो किसी भी चीज की अति बुरी ही होती है. लेकिन अगर सही मात्रा में सेवन किया जाए तो कॉफी जैसा पेय आपके स्वास्थ्य के लिए उपयोगी ही साबित होता है. तो चलिए एक कप कॉफी हो जाए!

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

एक जेल जहां कैदी बदल रहे हैं अपनी किस्मत

भागलपुर केंद्रीय कारागार में बंद कई खूंखार कैदी इन दिनों साहित्य का अध्ययन करने में गंभीरता से जुटे हुए हैं। इस कारण उनके सोचने के तौर-तरीके और समाज के बारे में उनके नजरिये में व्यापक बदलाव हो रहा है।

जेल में बदलाव की इस लहर को जन्म देने वाले वे 12 खूंखार कैदी हैं। जिनके हाथों मे अब फणीश्वर नाथ रेणु का 'मैला आंचल' और प्रेमचंद के 'गोदान' सहित टैगोर और गांधी की जीवनी देखी जा सकती है। गुनाहों से दूर होने के क्रम में ये कैदी रामायण व महाभारत जैसे धार्मिक पुस्तकों का नियमित अध्ययन कर रहे हैं।

बंदियों की रुचि को देख जेल अधीक्षक शिवेंद्र प्रियदर्शी ने कारागार के पुस्तकालय को समृद्ध बनाने का काम शुरू कर दिया है, अच्छी पुस्तकें मंगाई जा रहीं हैं। जेल में बदलाव की यह बयार लाने वाले बंदियों में इंद्रसेन शर्मा, अजय कुमार चौधरी, योगेश यादव, लालबाबू सिंह, रामविलास सिंह, योगेंद्र यादव, लल्लन यादव, संजय सिंह, चंद्रचूड़ यादव, गणेश सिंह, दयाशंकर सिंह व राजनीति सिंह आदि खूंखार अपराधी शामिल हैं, ये सभी संगीन जुर्म में सजा काट रहे हैं।

भलमानस बनने की चाहत में इनमें से कई जेल में रहते हुए स्नातक की डिग्री हासिल कर लिए हैं और कंप्यूटर ज्ञान में दक्ष हो गए हैं। इन बंदियों की रुचि को देखते हुए अन्य कैदी भी इनके हमराह होकर पुस्तकालय में बैठने लगे हैं। ऐसे बंदियों की संख्या अब 40 तक पहुंच गई है। कुछ बंदियों में तो अपनी निजी डायरी लिखने की आदत भी पड़ चुकी है।

राजनीति सिंह की डायरी में लिखे व्यंग्यात्मक अल्फाज हैरत में डालने वाले हैं। उसने लिखा है: चलो गुनाह के किस्से तमाम लिखते हैं, गिरी दीवार पर रिश्तों का नाम लिखते हैं। उन्हें गरीबी का मतलब समझ में आएगा, किसी फकीर के थैलों का दाम लिखते हैं। हमारे समाज के बच्चे भला न क्यूं मरते, अमीर लोग तो उनको ही काम लिखते हैं। किसी गरीब का दामन जो हमने थामा तो, मेरे खिलाफ वो सावन की शाम लिखते हैं।

गुनाहों की सजा काट रहे इन कठोर चेहरों के पीछे एक कड़वा सच यह भी है कि आज इन्हें अपने किए पर पछतावा है। अब ये गुनाह की दुनिया को तौबा कर जीने की नई राह पकड़ना चाहते हैं।

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा..



नई दिल्ली [जागरण न्यूज नेटवर्क]। देश को आजाद हुए 62 साल हो चुके हैं। इस दौरान उसने सूचना, प्रौद्योगिकी और औद्योगिक उत्पादन जैसे कई क्षेत्रों में अभूतपूर्व सफलता हासिल की। लेकिन पानी के प्रबंधन के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए गए।

यही कारण है कि हमारे किसान आज भी मानसून पर निर्भर हैं। भारत इस समस्या का हल नहीं खोज सका। पानी नहीं बरसता तो हाहाकार मच जाता है, और बरसे तो भी। यह जल के कुप्रबंधन का ही नतीजा है कि हर दो तीन वर्षो में मानसून सरकार के छक्के छुड़ा देता है। लेकिन किसी सरकार ने इससे सबक लेने की जरूरत नहीं समझी।

देश में करीब चार करोड़ 50 लाख किसान ऐसे हैं, जो मानसून पर निर्भर हैं। इस साल जून-सितंबर के मानसून सीजन में इतनी कम बारिश हुई, जितनी पिछले कई दशक से नहीं हुई। देश के करीब 604 जिले यानी करीब आधा भारत सूखे से प्रभावित है।

देश के सबसे गरीब प्रदेशों में एक बिहार ने 38 जिलों में 26 में सूखा को घोषित किया है। सोलह करोड़ 80 लाख की आबादी वाले उत्तर प्रदेश ने धान की फसल के अनुमान में 60 फीसदी कटौती की है। रबी की फसल के भी खराब रहने के अनुमान है। इसका कारण ये है कि ज्यादातर पानी के स्रोतों में कम पानी है।

मानूसन सत्र के अंत में हुई बारिश से कुछ राहत जरूर मिलेगी। लेकिन इससे किसानों कोई विशेष फायदा नहीं होगा। किसानों के आत्महत्या करने की खबरें फिर आने लगी हैं।

पिछले महीने आंध्र प्रदेश में 20 किसानों ने आत्महत्या कर ली। यह संख्या बढ़ भी सकती है।

हैदराबाद के पुनिया राव ने 16 एकड़ में कपास बोया है। उन्होंने कहा कि यदि फसल खराब होती है तो मेरे ऊपर दो लाख का कर्ज चढ़ जाएगा। मैं मजदूरी करके भी इसे नहीं चुका पाऊंगा। अब मुझे मरने के बाद ही मुक्ति मिलेगी।

देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 18 फीसदी है। 1990 में यह 30 फीसदी था। इतना महत्वपूर्ण क्षेत्र होने के बावजूद देश का दुर्भाग्य देखिए कि यह महज 15 दिन की बढि़या बारिश पर निर्भर करता है।

लेकिन देश में कम बारिश होना जितनी बड़ी समस्या है उससे कहीं अधिक बड़ी समस्या है ज्यादा बारिश हो जाना। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस साल जुलाई तक देश के विभिन्न इलाकों में आई बाढ़ में करीब 992 लोगों की मौत हो चुकी है। हजारों बेघर हुए हैं। सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि बर्बाद हुई है।


बाढ़ का प्रभाव सबसे ज्यादा बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और असम पर पड़ा है। पश्चिम बंगाल में इस महीने की शुरुआत से अब तक 21 हजार लोग अपना घर छोड़ चुके हैं। यहां के पांच हजार 103 गांव और 10 हजार एकड़ कृषि भूमि इससे बर्बाद हो गई। बिहार में बाढ़ ने तीन लाख से ज्यादा लोगों को प्रभावित किया है।

विडंबना देखिए कि गया और नालंदा जैसे क्षेत्र जो जून जुलाई तक गंभीर सूखा महसूस कर रहे थे, वहां बाढ़ ने सबसे ज्यादा कहर बरपाया।

जरूरत प्रबंधन की

देश की आबादी 2050 तक करीब 1.7 अरब पहुंचने के आसार हैं। पानी के कुप्रबंधन की समस्या से अगर भारत जल्द न
निपटा तो भविष्य में स्थितियां विकराल हो सकती हैं। पानी के प्रबंधन में भारत की जनसंख्या और गरीबी बड़ी चुनौतियां हैं।

पानी को लेकर विभिन्न राज्य सरकारों के बीच विवाद इस समस्या को और गहरा सकती है। सरकार को निश्चित ही इस दिशा में गंभीरता पूर्वक कदम उठाने होंगे।

पहली बार भारतीय सरहद पर लड़कियों की तैनाती


वे हुई तैनात, अब हमें भी मिल जाए मौका

नई दिल्ली। देश के इतिहास में पहली बार भारतीय सरहद पर लड़कियों की तैनाती ने उन लड़कियों की आशाओं को पंख लगा दिए हैं, जो भविष्य में सेना में जाने के सपने संजोए हुए हैं।


देशभक्ति से ओत-प्रोत यह लड़कियां अब भारत की सीमाओं की चौकसी का 'एक मौका' पाने को बेताब हैं। सैन्य शास्त्र की छात्रा श्रुति सराठे ने कहा कि सीमा सुरक्षा बल के इस कदम से हम बहुत उत्साहित हैं। अभी तक हमें सिर्फ सेना से जुड़े सामान्य कार्यो में भाग लेने का
मौका मिलता था, लेकिन अब सरहद पर तैनाती से देश की रक्षा से सीधे तौर पर जुड़ने का मौका मिलेगा। श्रुति ने कहा कि लड़कियों में अब सीमा पर तैनाती के प्रति भी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और सेना में जाने वाली हर लड़की सरहद पर तैनात होने का एक मौका पाना चाहेगी।

सीमा पर तैनात लड़कियों से मिलने की इच्छा व्यक्त करते हुए सैन्य शास्त्र, स्नातकोत्तर की छात्रा अंजना धोटे ने कहा कि जब मैंने सैन्य शास्त्र में दाखिला लिया, तो सोचा भी नहीं था कि लड़कियों को देश सेवा से सीधे तौर पर ऐसे जुड़ने का मौका मिलेगा। लड़कियों को देश की सबसे अहम सीमा 'भारत-पाक' पर तैनात होने का मौका मिलना एक ऐतिहासिक कदम है।
सीमा पर तैनात होने वाली लड़कियां हमारी आदर्श हैं और अब हम उनसे मिलने के इच्छुक हैं। सीमा सुरक्षा बल के इस फैसले को स्वागतयोग्य कदम बताते हुए भोपाल के मोतीलाल विज्ञान महाविद्यालय के सैन्य शास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष डा. कैलाश त्यागी ने फोन पर बताया कि इस फैसले से लड़कियों में सेना के प्रति निश्चित तौर पर उत्साह बढ़ा है। हमारे विभाग में मौजूदा सत्र में लगभग 70 फीसदी लड़कियां हैं, जो अखबारों में इस खबर को पढ़कर खासी उत्साहित हैं।


डा. त्यागी ने कहा कि अब तक लड़कियों को ऐसे मौके नहीं मिलते थे, लेकिन अब यह मौका भी मिल रहा है, जिसके चलते लड़कियां स्वयं को साबित करने के लिए बेताब हैं। उन्होंने कहा कि अब वे अपने विभाग की लड़कियों को सीमा की परिस्थितियों का सामना करने के लिए भी तैयार कराएंगे। सेना में पूर्व लेफ्टिनेंट संगीता सैम्युअल ने कहा कि लड़कियों के लिए यह एक स्वर्णिम मौका है, जो इसके पहले उन्हें कभी नहीं मिला था।

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

जब तक बिहार नहीं सुधरता, प्रकाश झा नहीं रुकेंगें




परदे के पीछे. अमेरिका में ओलिवर स्टोन राजनैतिक फिल्में बनाने के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं और जॉन एफ. कैनेडी पर बनाई उनकी फिल्म अपनी साफगोई और साहस के कारण इस श्रेणी की श्रेष्ठतम फिल्म मानी जाती है।

भारत में राजनैतिक फिल्में प्रकाश झा बनाते हैं और ‘दामुल’ से लेकर ‘अपहरण’ तक उनकी सारी फिल्में सामाजिक दस्तावेज की तरह पढ़ी जानी चाहिए। ‘मृत्युदंड’ ‘गंगाजल’ और ‘अपहरण’ उनकी फिल्म त्रिवेणी है, जिसे सिलसिलेवार देखने पर ग्रामीण और कस्बाई भारत में हिंसा और भ्रष्टाचार की तस्वीर साफ उभरकर आती है।

उनकी ताजा फिल्म ‘राजनीति’, संभवत: उनकी फिल्म त्रिवेणी के उपसंहार की तरह गढ़ी है। अपनी श्रेणी में झा श्रेष्ठतम हैं। ओलिवर स्टोन का रास्ता प्रकाश झा के रास्ते से कम भयावह है,
क्योंकि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के माहौल में फिल्म बना रहे हैं और उन्हें इसकी भी स्वतंत्रता है कि कैनेडी के कातिल को उसके नाम से पुकारें।

इधर, प्रकाश झा को ऐसे वातावरण में फिल्म बनानी पड़ रही है, जहां कूपमंडूक सेंसर बोर्ड से पारित होने के बाद भी मोहल्लाई दादाओं की स्वीकृति लेना पड़ती है। कोई भी व्यावसायिक हुड़दंगी आपको कहीं भी रोक सकता है।
बिहार में कोसी नदी का संयम टूटा और आधा बिहार इसकी चपेट में आ गया। केंद्र सरकार ने तीन हजार करोड़ की सहायता भेजी, लेकिन मुसीबतजदा लोगों के पास कितनी पहुंची! पूरा देश नदी के तांडव को उस समय की सुर्खी मानकर जबानी सहानुभूति जताता रहा और आज सब लोग भूल गए, जबकि नदी के मारे आज भी संकट में जी रहे हैं। नदी का संयम टूटता है, परंतु बिहार का आलस्य नहीं टूटता। क्या इन सवालों के जवाब ‘राजनीति’ फिल्म में है? जब तक बिहार नहीं सुधरता, भारत की प्रगति नहीं हो सकती।

अमेरिका, रूस, फ्रांस, कजाकिस्तान और नामीबिया के बाद मंगोलिया के साथ भी हुआ एटमी करार

नई दिल्ली। भारत ने सोमवार को मंगोलिया के साथ एक असैन्य परमाणु करार किया। माना जाता है कि मंगोलिया में यूरेनियम के प्रचुर भंडार हैं। मंगोलिया छठा राष्ट्र बन गया है, जिसके साथ भारत ने परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की तरफ से छूट मिलने के बाद असैन्य परमाणु करार किया है।

45 सदस्यीय परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह ने इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ व्यापार करने पर भारत पर लगी 34 वर्ष पुरानी रोक को हटा लिया था।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और मंगोलिया के राष्ट्रपति साखियाजीन अलबगदोर्ज के बीच यहां व्यापक बातचीत के बाद परमाणु समझौते और चार अन्य करारों पर दस्तखत किए गए।

भारत ने पहले ही अमेरिका, रूस, फ्रांस, कजाकिस्तान और नामीबिया के साथ असैन्य परमाणु करार किया है। रेडियोएक्टिव खनिजों और परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के क्षेत्र में सहयोग पर सहमति से भारत मंगोलिया में यूरेनियम की तलाश कर सकेगा।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री सिंह ने कहा कि दोनों देश खनन और कृषि सरीखे अन्य क्षेत्रों में सहयोग के लिए सहमत हो गए हैं। दोनों पक्षों ने स्वास्थ्य, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, सांख्यिकीय मामले और कर्ज देने के संबंध में भी अन्य करार किए हैं। भारत ने मंगोलिया के लिए स्थायित्व कोष के तौर पर ढाई करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि की भी घोषणा की है।

बिहार मैरिज रजिस्ट्रेशन रूल 2006

तो अवैध है ये सभी शादियां



पटना। फूला-फूला फिरे जगत में होत हमारो ब्याह। शादी हो या विवाह, ये शब्द मन में रोमांच भरने के लिए काफी होते हैं। वाइफ वुड बी हसबैंड और हसबैंड वुड बी वाइफ को लेकर मन में कई तरह के ख्यालात बुनते हैं। सपने गढ़ते हैं। फिर वो घड़ी भी आती है जब घर में मंगल ध्वनि गूंजती हैं, शहनाइयां बजती हैं और घोड़े पर सवार होकर दुल्हे राजा हसबैंड बनने की लालसा के साथ वुड बी वाइफ को विदा कराने उसके घर जा पहुंचता है। दो परिवारों के इस मिलन का प्रॉसेस काफी लंबा है, लेकिन सारे प्रॉसेस पूरा कर दो अजनबी प्यार के पवित्र रिश्ते में जीवनभर के लिए बंध जाते हैं। ये बात तो सभी जानते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस प्रॉसेस को पूरा कर आपने शादी की है वह अवैध है। झटका लगा ना? लगने की बात है भी, क्योंकि सच्चाई यही है कि आपने हिन्दू धार्मिक रीति-रिवाज से जिसे अपना हसबैंड या वाइफ बनाया है, उससे आपके रिलेशन को तब तक मान्यता नहीं है, जब तक कि गवर्नमेंट के बही-खाते में आपके नाम और विवरण दर्ज न हो जायें। दो अजनबी परिवार एक होने के लिए तमाम दूसरे प्रॉसेस तो पूरे करते हैं, लेकिन एक मामूली और छोटा काम करना भूल जाते हैं या फिर कहिए करना ही नहीं चाहते, जिससे उनकी शादी को गवर्नमेंट के बही खाते में मान्यता नहीं मिल सकती है। तो क्या ऐसी शादियां अवैध हैं। यह हम नहीं आंकड़े कहते है।. यदि कानून के आइने में इन शादियों को परखें, तो 100 में 98 परसेंट शादियां अवैध हैं.




ज्यादा उत्सुकता नहीं दिखती

अमूमन शादियां कई प्रकार से होती हैं। अगर सिर्फ हिन्दू धर्म की बात करें तो इसमें भी शादियां कई प्रकार से होती हैं। अमूमन व्यवस्था के अनुकूल हिन्दू रीति रिवाज और कर्मकांड से ज्यादा शादियां होती हैं। लेकिन 1954 में बने कानून [विशेष विवाह निबंधन नियमावली-1954] के अनुसार हिन्दू कर्मकांड या रीति रिवाज से हुई शादियों का रजिस्ट्रेशन भी अनिवार्य है। लेकिन सिर्फ बिहार की क्यों देश के किसी भी दूसरे प्रांत में शादियों के रजिस्ट्रेशन को लेकर वैसे युवा जिनकी निकट फ्यूचर में शादी होने वाली है या फिर शादी शुदा जीवन बीता रहे लोगों में बहुत ज्यादा उत्सुकता नहीं दिखती है।

स्टेट गवर्नमेंट ने बदला कानून

करीब तीन साल पहले स्टेट की नीतीश गवर्नमेंट ने 1954 के शादी कानून में ड्रास्टिक चेंजेज किये। गवर्नमेंट ने फैसला लिया कि वर्ष 2006 के बाद स्टेट में जितनी भी शादियां होंगी, उनका रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा। पहले के नियमों को गवर्नमेंट ने शिथिल भी किया। 2006 में शादियों के रजिस्ट्रेशन के लिए जो कानून बना उसे नाम दिया गया बिहार मैरिज रजिस्ट्रेशन रूल 2006। इस कानून में ऐसे प्रावधान हैं कि यदि कोई शादी करने के बाद रजिस्ट्रेशन के लिए बहुत भागदौड़ के कारण ऐसा करने से भागता है, तो उसे अब ऐसा नहीं करना होगा। क्योंकि रजिस्ट्रेशन कर सर्टिफिकेट इश्यू करने के अधिकार गवर्नमेंट ने ग्राम पंचायत के मुखिया, वार्ड कमिश्नर और अरबन एरिया में काउंसलर को सौंपा है।

बस कदम बढ़ाने की जरूरत

स्टेट गवर्नमेंट को उम्मीद थी कि उसके इस फैसले को लेकर लोग उत्साह दिखाएंगे और दो कदम बढ़ा कर जिस प्रकार शादियों के लिए उत्साह पूर्वक तमाम कामों को अंजाम देते हैं, उसी प्रकार शादियों के रजिस्ट्रेशन के लिए भी आगे आएंगे। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। यह सच्चाई है कि 2006 में इस कानून के बाद भी अब तक पूरे स्टेट में महज 145 के करीब नव विवाहितों ने अपनी मैरिज को लीगल रूप दिया और शादियों का रजिस्ट्रेशन कराया। गवर्नमेंट की सोच थी कि रजिस्ट्रेशन को लेकर सबसे ज्यादा उत्साह मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास दिखाएंगे। हां, अपर मिडिल क्लास और अपर क्लास के लोग शायद इसमें ज्यादा इंटरेस्टेड ना हों। लेकिन अपर क्लास के लोग तो रजिस्ट्रेशन को नहीं ही आए, इस क्लास के अलावा भी किसी ने रजिस्ट्रेशन को लेकर कोई उत्साह नहीं दिखाया।

तो भरना पड़ सकता है दंड

2006 में बने कानून का पालन हर क्लास और तबके के लोगों को करना था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। शायद कहीं ना कहीं गवर्नमेंट को इस बात का एहसास भी था इसलिए गवर्नमेंट ने कानून में दंड के प्रावधान भी किए। व्यवस्था ऐसी की गई कि मैरिज के अगले दिन से लेकर तीस दिनों के भीतर रजिस्ट्रेशन कराना मस्ट होगा। अगर कोई विवाहित जोड़ा ऐसा नहीं करता है तो उसे 90 दिनों के अंदर रजिस्ट्रेशन कराना होगा और दंड स्वरूप एक सौ रुपए देने होंगे। इसके बाद यदि रजिस्ट्रेशन नहीं कराता है तो वैसी स्थिति में संबंधित विवाहितों से अधिकतम एक हजार रुपए दंड स्वरूप लेने की व्यवस्था की गई।

नियम-कानून से फर्क नहीं पड़ता

कहा जाता है कि नियम तो तोड़ने के लिए ही बनते हैं और सच्चाई भी यही है कि नियम बन रहे हैं और टूट भी रहे हैं। यह कटु सत्य है कि पूरे बिहार की बात छोड़ भी दें तो अकेले पटना शहर में शादियों के मौसम में चार से पांच हजार युवा शादी के बंधन में बंध जाते है। शहर के प्रतिष्ठित होटल मौर्या और चाणक्या सिर्फ चार महीने के विवाह के मौसम में दो सौ से चार सौ शादियां करा देते हैं, लेकिन यह भी सच्चाई है कि इन शादियों का कोई रजिस्ट्रेशन नहीं होता। शादियों के रजिस्ट्रेशन के क्या मायने हो सकते हैं। इसका अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि आपको राशन कार्ड बनाने से लेकर पासपोर्ट बनाने तक में इस रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट का यूज करना होता है, लेकिन आज के युवा मानते हैं कि पैसे के बल पर तमाम सुविधाएं घर बैठे मिल जाती हैं वैसी स्थिति में इतनी भाग दौड़ का क्या मतलब है। जिस दिन शादी के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट की आवश्यकता होगी, उसी दिन थोड़े से पैसे खर्च कर बनवा लिया जाएगा।


सोशल साइंटिस्ट डा. रणधीर कुमार सिंह का मानना है कि ये पूरा मामला अवेयरनेस से जुड़ा हुआ है। लोग आज भी अपने हिसाब से दुनिया चलाना चाहते हैं। उनके पास पैसा है वे पैसे के जोर पर तमाम सुविधा हासिल कर लेने का माद्दा रखते हैं। गवर्नमेंट जब इस प्रकार के कानून बनाती है तो उसकी मॉनिटरिंग से लेकर प्रचार तक की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके बाद दंड के भी कड़े प्रावधान होने चाहिए। अब बताइये रजिस्ट्रेशन नहीं कराने पर दंड स्वरूप एक हजार रुपए लेने का प्रावधान है। जो हजार रुपए का पानी पी जाते हैं उनके लिए हजार रुपए खर्च करना कौन सा मुश्किल काम है तो आज जरूरत है कि कोई कानून अगर लागू किया जाए तो उसका व्यापक प्रचार प्रसार भी किया जाए।


कानून बनाने और दंड का प्राभ्धान करने से सिर्फ लोगों की रूचि इसमें नहीं बढ़ सकती| सरकार को चाहिए की ग्राम पंचायत के मुखिया, वार्ड कमिश्नर और अरबन एरिया में काउंसलर के द्वारा हर सादियों में जाकर सगुण के तौर पर १०० या ५०० रूपये दे और साथ ही साथ सादी विवाह को भी रजिस्ट्रेशन करे|

न्यूक्लियर बम घोषित हैं 23 हजार, अघोषित कितने






23,000 बमों पर है दुनिया

ये आंकड़े डराते हैं। पढ़कर माथे पर चिंता की लकीरें गहराती हैं। मन में एक सिहरन पैदा होती है। आंखों के सामने हिरोशिमा और नागासाकी का मंजर घूमने लगता है। तब कुछ न्यूक्लियर बमों ने ऐसा कहर बरपाया था कि दशकों बाद सिचुएशंस पूरी तरह नहीं सुधर पाई हैं। व‌र्ल्ड में अब तक 23 हजार न्यूक्लियर बम घोषित रूप से बनाए जा चुके हैं। इतना ही नहीं, इनमें से 8100 से ज्यादा बम कभी भी दागे जाने की सिचुएशन में हैं। भारत के लिए यह और भी मायने इसलिए रखता है क्योंकि इस लिस्ट में साफ है कि पाकिस्तान के पास भारत से ज्यादा न्यूक्लियर वेपंस हैं।

एफएएस की रिपोर्ट

ये डेटाज फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट की ओर से जारी एक रिपोर्ट में दिखाए गए हैं। इसमें व‌र्ल्ड के सभी देशों के पास न्यूक्लियर वेपंस की इंफॉर्मेशन विस्तार से दी गई है। इसके मुताबिक व‌र्ल्ड की नौ कंट्रीज के पास कुल 23, 395 न्यूक्लियर वेपंस हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पाकिस्तान के न्यूक्लियर वेपंस की संख्या अब भारत के न्यूक भंडार से अधिक है।

सबसे ज्यादा रूस के पास

खुद को दुनिया का दादा कहने वाले अमेरिका आश्चर्यजनक रूप से इस लिस्ट में सेकंड पोजीशन पर है। रूस का परमाणु जखीरा 13, 000 बमों के साथ सबसे बड़ा है। अमेरिका के पास 9400 न्यूक वेपंस हैं। चीन के पास 300 वेपंस हैं और वह थर्ड पोजीशन पर है। 240 बमों के साथ फ्रांस चौथे नंबर पर है। जबकि ब्रिटेन पांचवी पोजीशन पर है और उसके पास 185 बम हैं। इस तरह सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों के पास कुल 23, 125 न्यूक वेपंस हैं। यह व‌र्ल्ड के कुल न्यूक वेपंस का 98.5 परसेंट है।

किसके पास क्या?

रूसी जखीरे में 2790 वेपंस रणनीतिक, 2050 गैर रणनीतिक और 4840 ऑपरेशनल हैं। रूस के पास 1991 में गैर रणनीतिक मुखास्त्र की संख्या 15000 थी। यह अब 5390 रह गई ह।. लगभग 200 मुखास्त्र निष्क्रिय अवस्था में यूरोपीय भाग में तैनात हैं और 2500 मुखास्त्र रिजर्व हैं। जबकि अमेरिका के पास 2126 रणनीतिक, 500 गैर रणनीतिक व 2623 ऑपरेशनल वेपंस हैं।

भारत से आगे पाक

जो अन्य देश परमाणु शक्ति संपन्न डिक्लेयर किए गए हैं उनमें पाकिस्तान का न्यूक भंडार इजरायल और भारत की तुलना में कहीं अधिक हो गया है। रणनीतिक हथियारों के मामले में भारत और पाक का पलड़ा भारी है। दोनों के पास 60-60 हथियार हैं। लेकिन कुल हथियारों के मामले में भारत के 60 से 80 के कंपैरिजन में पाक के पास 70 से 90 न्यूक वीपंस हैं। यह इजरायल के 80 से भी ज्यादा हो सकते हैं। इस तरह साउथ और वेस्ट एशिया में पाकिस्तान सबसे बड़ी परमाणु ताकत हो सकता है। नॉर्थ कोरिया के पास न्यूक वेपंस का ब्यौरा हालांकि किसी के पास अवेलेबल तो नहीं। पर इंटेलीजेंस इंफॉर्मेशंस के बेस पर रिपोर्ट में बताया गया है कि उसके पास 10 से अधिक बम हो सकते हैं। नॉर्थ कोरिया ने हाल ही में दो न्यूक टेस्ट किए हैं।


रिपोर्ट में इजरायल, पाकिस्तान, भारत और नॉर्थ कोरिया के पास गैर रणनीतिक एवं ऑपेरशनल यानी दागने के लिए तैयार वेपंस की संख्या अनुपलब्ध बताई गई है। रिपोर्ट में ईरान के बारे में कोई जिक्र नहीं है। [जेएनएन]

सोमवार, 14 सितंबर 2009

मातृभाषा हिन्दी या अंग्रेजी




भाषा के मुद्दे पर हम 62 साल पहले जहा थे, आज भी वहीं खडे़ है। इसका सर्वमान्य हल नहीं निकल पाना हम सबके लिए शर्म की बात है। इसी वजह से समय-समय पर भाषा को लेकर विवाद भी पैदा हुए है।

रूस में बोली जाने वाली अवार भाषा के जनकवि रसूल हमजातोव ने 'मेरा दागिस्तान' में प्रसिद्ध लोककवि अबूतालिब के साथ घटित एक रोचक किस्से का वर्णन किया है-


अबूतालिब एक बार मास्को में थे। सड़क पर उन्हे किसी राहगीर से कुछ पूछने की आवश्यकता हुई। शायद यही कि मंडी कहा है? संयोग से कोई अंग्रेज ही उनके सामने आ गया।

अंग्रेज अबूतालिब की बात न समझ पाया और पहले तो अंग्रेजी, फ्रासीसी, स्पेनी और शायद दूसरी भाषाओं में पूछताछ करने लगा।

अबूतालिब ने शुरू में रूसी, फिर लाक, अवार, लेजगीन, दार्गिन और कुमीक भाषाओं में अंग्रेज को अपनी बात समझाने की कोशिश की।

आखिर एक-दूसरे को समझे बिना वे दोनों अपनी-अपनी राह चले गए। एक बहुत ही सुसंस्कृत ने, जो अंग्रेजी भाषा के ढाई शब्द जानता था, बाद में अबूतालिब को उपदेश देते हुए कहा, 'देखा, संस्कृति का क्या महत्व है? अगर तुम कुछ अधिक सुसंस्कृत होते तो अंग्रेज से बात कर पाते। समझे न।'

'समझ रहा हूं।' अबूतालिब ने जवाब दिया, 'मगर अंग्रेज को मुझसे अधिक सुसंस्कृत कैसे मान लिया जाए? वह भी तो उनमें से एक भी जबान नहीं जानता था, जिनमें मैंने उससे बात करने की कोशिश की।'

हमारे मन में अपनी मातृभाषा और देश की भाषाओं के लिए अबूतालिब की तरह स्वाभिमान नहीं, बल्कि कुंठा है। इसी का परिणाम है कि हम भारतीय भाषाओं को और संस्कृति की बात करने वाले को दकियानूसी और पिछड़ा मानते है। अंग्रेजी भाषा व संस्कृति को अपनाने वालों को सम्मान की दृष्टि से देखते हुए उन्हे आधुनिक तथा प्रगतिशील होने का खिताब देते है। अंग्रेजी का ज्ञान नहीं होने पर अंग्रेजीदा तो हमारी उपेक्षा करते ही है, किंतु हम भी स्वयं को हीन व लज्जिात महसूस करते है।

अंतरराष्ट्रीयता का हवाला देकर ऐसा भ्रमजाल फैलाया गया कि मानो प्रत्येक भारतीय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाकर काम करना है। इसलिए हर किसी के लिए अंग्रेजी सिखना जरूरी है। इसी भ्रमजाल के कारण हम अपने बच्चों को महंगे से महगे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाना चाहते है। इन स्कूलों में डोनेशन के नाम पर मोटी रकम भेंट चढ़ाई जाती है। यह शिक्षा पद्धति बहुत महगी भी है। अपनी सीमित आय होने के कारण इसके लिए आर्थिक अपराधों की शरण में जाना पड़ता है। अत: अप्रत्यक्ष रूप से यह शिक्षा पद्धति भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा देती है।


अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने का सबसे बड़ा नुकसान प्रतिभा का हृास है। बच्चा जब प्राथमिक शिक्षा प्रारभ करता है तो वह उसके बहुमुखी विकास की उम्र होती है। तब उसे विदेशी भाषा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए बाध्य किया जाता है। इससे उसके विकास पर प्रतिकूल असर पड़ता है। वह बड़ा होकर प्रतियोगिताओं की तैयारी करता है तो अंग्रेजी फिर अड़चन पैदा करती है। प्रतियोगी को जो समय अपने विषय के गहरे अध्ययन में लगाना चाहिए, वह समय उसे अंग्रेजी के अध्ययन में लगाना पड़ता है। वह जब सरकारी या गैर सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करता है तो यहा पर भी सबसे पहले अंग्रेजी का ज्ञान होना आवश्यक है। योग्य से योग्य व्यक्ति को भी अंग्रेजी का ज्ञान न होने पर या कम होने पर अयोग्य करार दिया जाता है। ऐसे में हीन भावना आना स्वाभाविक है।

भारत में अभी भी करीब 35 फीसदी लोग अशिक्षित है। देश के एक बडे़ हिस्से में प्राथमिक शिक्षा की समुचित व्यवस्था तक नहीं है। और जहा व्यवस्था है भी, वहा सब रामभरोसे चल रहा है। ऐसे में अंग्रेजी की वकालत करना समझ से परे है।

असल में गुलामी के दौरान ही एक ऐसे वर्ग ने जन्म ले लिया था, जिसे देश-समाज से कुछ लेना-देना नहीं था। यह वर्ग आजादी भी नहीं चाहता था। इस वर्ग का मकसद अंग्रेजों के प्रति वफादारी साबित कर सत्ता सुख भोगना था। इसके लिए इसने खुद को अंग्रेजी रहन-सहन में ढालना शुरू कर दिया। यह वर्ग जुबान भी अंग्रेजों कीे बोलता। अंग्रेजों से नजदीकी साबित करने के लिए भारतीयों से दूरी बनाना इसकी मजबूरी थी। इसे श्रेष्ठता का दंभ होने लगा। अन्य लोगों को यह गंवार और जाहिल समझाता। दुर्भाग्यवश आजादी के बाद सत्ता की कुंजी इसी वर्ग के हाथ में आई। यह वर्ग तो चाहता ही नहीं कि मात्र एक भाषा से उन्हे जो श्रेष्ठता मिली है, वह छीन जाए।

भाषा को लेकर प्राथमिक स्तर से ही प्रयास किए जाने की जरूरत है। दस मिन्स टेन, जिस बच्चे को यह बताना पड़ रहा हो, उसे हिदी में काम करने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि जिस भी देश ने भी तरक्की की है, अपनी मातृभाषा में ही है। यदि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान हिदी में उपलब्ध नहीं है तो यह हिदी की नहीं, शासक वर्ग की कमी है। हिदी के प्रचार-प्रचार के नाम पर तमाम तरह की नौटकी करने की बजाए, विश्व ज्ञान-विज्ञान, साहित्य हिदी में उपलब्ध कराया जाए। एक अनुमान के अनुसार भारत में हिदी में बोलने वाले 40 प्रतिशत से अधिक है, जबकि अंग्रेजी बोलने वाले मात्र 0.021 प्रतिशत है।

आज हिदी किसी प्रदेश या देश तक सीमित नहीं रही। भारत से बाहर फीजी, मारीशस, गायना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, अरब, अमीरात, इग्लैंड, अमेरिका, कनाडा आदि कई देशों में लोग इसे दैनिक व्यवहार में लाते है। तकनीकी विकास के चलते आज हिदी में एसएमएस, ईमेल आदि सभी सुविधाएं उपलब्ध है। इटरनेट पर भी हिदी का साम्राच्य बढ़ा है। हिंदी ने विश्वभाषा का रूप धारण कर लिया है।

हिदी को लेकर एक बात अक्सर कही जाती है कि गैर हिदी भाषी क्षेत्रों विशेषकर दक्षिण भारत में हिदी का विरोध है। यह बात पूर्णत: सही नहीं है। गैर हिदी भाषी प्रदेशों में हिदी का विरोध हुआ तो वह राजनीति प्रेरित था।

और यदि अंग्रेजी ही राजभाषा के काबिल है तो फिर हिदी पखवाड़ा, हिदी सप्ताह और हिंदी दिवस जैसे ढोंग करने की क्या जरूरत है? क्यों मंत्रालयों और विभागों में हिदी अधिकारी नियुक्त कर करोड़ों रुपये बरबाद किए जा रहे है? क्यों हिदी अकादमी, हिदी विश्वविद्यालय खोले जा रहे है? जो भाषा इस देश के काबिल ही नहीं है और जिसमें इस देश की कार्यपालिका, न्याय पालिका और विधायिका काम नहीं कर सकती है, उसके प्रचार-प्रचार के लिए क्यों देश की धन, श्रम और समय नष्ट किया जा रहा है?

भाषा के मुद्दे को और टालने की बजाए, तुरत समाधान किया जाना चाहिए। इसके लिए दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत है और इसका राजनेताओं में अभाव है। इसलिए इनसे अपेक्षा करना बेकार है। जब पूरे देश में आदोलन शुरू हुए, तभी आजादी मिल सकी। आज ऐसे ही देशव्यापी आदोलन की जरूरत है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा का मसला, आजादी से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

2014 तक पता चलेगा अंतरिक्ष में कहां है जीवन







लंदन। ब्रिटेन के खगोल वैज्ञानिकों का दावा है कि हालीवुड की सुपर हिट फिल्म सीरीज स्टार वार्स में दिखाई गई दुनिया की तरह जीवन के अनुकूल हजारों चंद्रमा आकाशगंगा में फैले हो सकते हैं। 2014 तक इनका पता कर लिया जाएगा।

यूनिवर्सिटी कालेज लंदन की टीम ने उम्मीद जताई है कि अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा बनाई गई दूरबीन की मदद से जीवन की संभावना वाले चंद्रमाओं का पता अगले पांच साल में लगा लिया जाएगा।

द डेली टेलीग्राफ में प्रमुख खगोलशास्त्री डा. डेविड किपिंग के हवाले से कहा गया है किनासा की दूरबीन से अंतरिक्ष में चंद्रमा की परिक्रमा करने में सक्षम 12 हजार पांच सौ से अधिक सितारों को देखा गया। वहां परिस्थितियां जीवन के अनुकूल हो सकती हैं।

उन्होंने बताया कि अन्य सौर प्रणाली में चंद्रमाओं का पता लगाने के लिए नया तरीका तैयार किया है। इसे एक्सोमूंस कहते हैं।

उन्होंने कहा, पहली बार हमने सैकड़ों प्रकाश वर्ष की दूरी पर रहने योग्य संभावित चंद्रमाओं के बारे में बताया है। नए उपकरण की मदद से दुनिया के पांचवें हिस्से के बराबर आकार वाले चंद्रमाओं का पता लगाया जा सकेगा। डा. किपिंग ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता हैं कि लाखों एक्सोमूंस आकाशगंगा में मौजूद हैं। जहां जीवन की संभावना हो सकती है। हमने अब इन उपग्रहों को देखना शुरू कर सकते हैं।

चीन ने भारत पर लगाया जासूसी का आरोप

चीन ने भारत पर लगाया जासूसी का आरोप

from danik jagran। चीन के एक सैन्य विशेषज्ञ ने भारत पर बीजिंग के राजनयिक अधिकारों का उल्लंघन करने तथा कोलकाता में रोके गए यूएई वायुसेना के मालवाहक विमान की तलाशी के दौरान चीन के सैन्य साजोसामान की जासूसी करने का आरोप लगाया है।

प्रख्यात सैन्य विशेषज्ञ दाई जू ने कहा कि भारतीय अधिकारियों की कार्रवाई से राजनयिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है क्योंकि विमान में रखा सामान चीन का था। सरकार द्वारा चलाए जा रहे ग्लोबल टाइम्स में दाई के हवाले से कहा गया कि विमान में किसी भी तरह की जांच के लिए यूएई और चीन से मंजूरी ली जानी चाहिए थी। इससे चीन के संपत्ति अधिकार का हनन हुआ है और इसके सैन्य रहस्यों की गुप्तचरी हुई है।

अखबार ने एक अज्ञात सैन्य सूत्र के हवाले से यह भी खबर दी है कि संयुक्त अरब अमीरात का सी 130 ह‌र्क्यूलिस विमान अबुधाबी की सैन्य प्रदर्शनी से चीनी हथियारों का परिवहन कर रहा था।

भारत ने इस विमान के कोलकाता में 10 सितंबर को उतरने के चार दिनों बाद इसे छोड़ा। विमान इसलिए रोका गया था क्योंकि इसमें ले जाए जा रहे हथियारों और गोला-बारूद की घोषणा नहीं की गई थी। विमान के दस सदस्यीय चालक दल से भी पूछताछ की गई।

भारत ने इस विमान को तब मंजूरी जब यूएई अधिकारियों ने बताया कि इसके पायलटों ने विमान में सवार हथियार एवं गोला-बारूद की घोषणा में तकनीकी त्रुटि की है जिसके लिए उसने खेद जताया।

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

धुन के पक्के

धुन के पक्केfrom danik jagran
Sep 10, 11:22 pmबताएं
Twitter Delicious Facebook

दोस्तो, जुनून एक हिडेन एनर्जी है, जिसका साथ मिल जाए, तो हो सकते हैं बड़े-बड़े कमाल। यह एक ऐसी शक्ति है, जिसकी बदौलत तुम अपना नाम उन रोल मॉडल प्रोफाइल्स में शामिल कर सकते हो, जिन पर दुनिया नाज करती है। आज बात करते हैं ऐसे ही कुछ जुनूनी यानी धुन के पक्के लोगों से, जिनकी कामयाबी एक मिसाल बन चुकी है।

[चार्ली चैपलिन]

हॉलीवुड के इस मशहूर हास्य अभिनेता का पूरा नाम था चार्ली स्पेंसर चैपलिन। वे एक ऐसे आर्टिस्ट थे, जो काम को घंटों में बांटकर नहीं करते थे। बस एक बार धुन सवार हो जाए, तो फिर लगातार उस काम में जुटे रहना उनकी आदत थी। अपना बेस्ट देना है, यही उनकी सोच थी। इसी कारण वे बहुत छोटी उम्र में ही एक जाने-माने आर्टिस्ट बन गए। इतना ही नहीं, इस अमर कलाकार का जुनून कभी खत्म नहीं हुआ। अस्सी वर्ष की उम्र में भी उनमें वही ऊर्जा थी, जो कभी युवा उम्र में रही थी। जिस दिन उन्होंने आखिरी सांस ली, उस समय भी वे एक रेगुलर एम्प्लॉई के रूप में अपने कार्यालय में कार्य कर रहे थे।

[डॉन ब्रैडमैन]

सर डॉन ब्रैडमैन का नाम क्रिकेट का पर्याय बन चुका है। इन्हें क्रिकेट का भगवान भी कहा जाता है। क्रिकेट के प्रति जुनून, खासकर बैंटिंग से उनका लगाव बचपन से ही था। वे गोल्फ की बॉल से दीवार पर कुछ इस तरह से शॉट लगाते कि लोग चकित रह जाते। कुछ उनकी कॉपी करने की कोशिश करते, पर ठीक वैसा ही बॉल पर नियंत्रण पाना किसी के वश की बात नहीं थी। उन्होंने पहला मैच महज ग्यारह साल की उम्र में खेला और पहली सेंचुरी बनाई बारह साल की उम्र में। फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और बन गए एक लेजेंड क्रिकेटर।

[पीट सैम्प्रास]

ऑल टाइम फेवरेट स्पो‌र्ट्समैन में नाम लिया जाता है पीट सैम्प्रास का। यह अमेरिकी टेनिस प्लेयर जब कोर्ट पर होता था, तो उस दौरान उनका खेलने का तरीका हर किसी को हैरान कर जाता। जीत हो या हार, उनके चेहरे पर एक ही भाव बना रहता। ऐसा लगता कि वे एक ही लक्ष्य-बेस्ट परफॉर्मेंस में विश्वास करते हैं। इसी का परिणाम था कि वे पंद्रह साल के अपने करियर में कुल चौदह ग्रैंड स्लैम जीत चुके थे। फिर कई तरह के रिकॉर्ड उनके नाम हुए, जिन्हें तोड़ना हर खिलाड़ी का सपना और लक्ष्य बन गया। टेनिस के प्रति जुनून उनमें बचपन से ही था। महज तीन साल की उम्र में ही रैकेट पकड़ना सीख गए थे। उनकी प्रतिभा की भनक जब उनके अभिभावकों को लगी, तो उन्होंने सैंप्रास को पूरा सपोर्ट दिया। अपनी लगन की बदौलत ग्यारह वर्ष की छोटी उम्र में ही पीट ने अपने रोल मॉडल रोड लीवर के साथ मैच खेलने का सपना भी पूरा कर लिया।

[वाल्ट डिज्नी]

यदि तुम यह सोच रहे हो कि वाल्ट डिज्नी केवल डिज्नीलैंड के निर्माता हैं, तो अपनी जानकारी में इजाफा कर लो। वाल्ट डिज्नी फिल्म प्रोड्यूसर, एनिमेटर और थीम पार्क डिजायनर भी थे। मिकी माउस के जन्मदाता वाल्ट डिज्नी को एक दो नहीं, कई एकेडमी अवॉर्ड मिले और 26 ऑस्कर अवॉर्ड भी।

उनका बचपन बहुत शानदार नहीं था। वे आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से थे। बचपन में ही उनके एक मित्र ने उन्हें एनिमेशन व‌र्ल्ड से परिचित कराया। फिर क्या था, आर्टिस्ट डिज्नी को जैसे उनकी मंजिल मिल गई। उनकी राह में कई तरह की मुश्किलें आई। वे कभी एम्बुलेंस ड्राइवर बने, तो कभी दिन के समय स्कूल और रात में जागकर नाइट कोर्स किया। वे एक स्कूल के न्यूजपेपर में कार्टूनिस्ट भी बने। काम की तलाश में घर भी छोड़ा। उन्हें बस एक ही धुन थी-अपने लिए एक मनपसंद करियर की तलाश। इस दौरान ऐसा भी दिन आया, जब उन्हें कहीं भी काम नहीं मिल रहा था। वे एक एड फिल्म कंपनी के एनिमेशन आर्ट से बेहद प्रभावित थे। वाल्ट उससे बड़ा और कुछ अलग करना चाहते थे। यह धुन उन जैसे सवार हो गया और एक दिन यह जुनून रंग लाया और वे बन गए एक महान रोल मॉडल।

[मैक्सिम गोर्की]

अगर हौसला हो, तो जुनूनी व्यक्ति अपनी राह खुद तलाश लेता है। इसका बेहतरीन उदाहरण हैं मैक्सिम गोर्की। वे अनाथ थे। माता-पिता की गैरमौजूदगी में दादी ने उन्हें पाला। लेकिन दादी के चल बसने के बाद वे अकेले हो गए। अकेलेपन के दिनों में स्कूल की पढ़ाई काम आई। हालांकि उन्हें स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ना पड़ा, लेकिन जीवन के कड़वे अनुभव ने उन्हें काफी कुछ सिखा दिया। उन्होंने जीवन बसर करने के लिए कई तरह के काम किए, लेकिन जब लिखना शुरू किया, तो दुनिया दंग रह गई। मैक्सिम गोर्की के लेखन से अंदाजा लग जाता था कि वे अपने विषय पर कितना मेहनत करते हैं। तभी उसका प्रभाव काफी गहरा होता था। बाद में वे एक महान लेखक और पॉलिटिकल एक्टिविस्ट बनकर उभरे।

पैशन हम सब के अंदर है। यह एक प्रकार का रिएक्शन होता है। काफी ऊर्जा होती है इस इमोशन में। कुछ लोग पैशन का सकारात्मक इस्तेमाल कर जाते हैं, तो कुछ इस असीम ऊर्जा को गलत दिशा दे देते हैं। बड़े-बड़े चमत्कार हो जाते हैं, यदि आपका जुनून सही दिशा में हो। लेकिन सवाल है कि क्या हर व्यक्ति सक्षम है ऐसा करने में? बेशक हर व्यक्ति में यह साम‌र्थ्य है। पर कोई ऐसा करने में सफल है, तो इसमें उसकी अपनी सूझ-बूझ अपनी काबिलियत का हाथ होता है। हमें कोशिश करनी चाहिए कि अपना एक लक्ष्य बनाएं। उसे पाने के लिए कड़ी मेहनत करें, सही तरीका अपनाएं। भावुक होकर नहीं, विवेक से हर फैसला लें। जो ऐसा करता है, वही जा सकता है आगे और आगे..। -पूर्व निदेशक, सीबीआई

[सीमा झा]

बुधवार, 9 सितंबर 2009

भारतीय स्त्री की रोटी बनाने के साथ रोटी कमाने की कला


मेरा+तुम्हारा =हमारा पैसा
यह लेख सखी मासिक पत्रिका से लिया गया है



भारतीय समाज में अब तक यह परंपरावादी धारणा चली आ रही थी कि धन अर्जित करना पति की जिम्मेदारी है और घर को सुव्यवस्थित रूप से चलाने का दायित्व पत्नी का होता है। लेकिन समय के साथ भारतीय स्त्री ने रोटी बनाने के साथ रोटी कमाने की कला में भी महारत हासिल कर ली।

पुराने समय में यह कहा जाता था कि आदमी सिर्फ पैसे कमाना जानता है, जोडना नहीं। तोल-मोल कर पैसे खर्च करने और एक-एक पैसा जोड कर गृहस्थी चलाने की कला सिर्फ स्त्रियों को ही आती है। अगर आज के संदर्भ में देखा जाए तो अब कहा जा सकता है कि स्त्री सिर्फ सोच-समझकर खर्च करना ही नहीं, बल्कि कमाना भी जानती है।

आज के शहरी मध्यवर्गीय भारतीय परिवारों का यह फील गुड फैक्टर है कि परिवार में एक की जगह दो लोगों की कमाई आने लगी, डिनर के लिए वीकेंड में बाहर जाने, शो विंडो पर हाथ रखते ही बच्चे को उसका मनपसंद खिलौना दिलाने, अपने लिए मोबाइल का लेटेस्ट मॉडल खरीदने जैसी छोटी-छोटी खुशियों के लिए अब लोगों को मन मसोस कर नहीं रहना पडता। जाहिर सी बात है, दो लोगों की आमदनी का मतलब है, दोगुनी सुख-सुविधाएं और ज्यादा आरामदायक जिंदगी। लेकिन इस फील गुड फैक्टर में सब कुछ अच्छा-अच्छा ही नहीं है बल्कि इसका एक स्याह पहलू भी है। आज परिवार में स्त्री की परंपरागत भूमिका बदल गई है और वह दोहरी जिम्मेदारियां निभा रही है। उसे नौकरी के साथ-साथ घर के कामकाज और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारियां भी पहले की ही तरह निभानी पडती हैं। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बावजूद परंपरागत जिम्मेदारियों के मामले में उसे कोई रियायत नहीं मिली है। आज की स्त्री तो समय के साथ चलना सीख गई है, लेकिन भारतीय पुरुष आज भी अपनी पारंपरिक मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया है। उसे पत्नी से यही अपेक्षा होती है कि वह नौकरी के साथ-साथ आज भी पुराने जमाने की पत्नी की तरह घर के सारे काम खुद करे।

दांपत्य का अर्थशास्त्र

अब तक पारंपरिक भारतीय परिवारों में जब केवल पति कमाता था तो घर में उसी का सिक्का चलता था। लेकिन जब पत्नी भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गई तब परिवार में उसका भी आर्थिक योगदान महत्वपूर्ण हो गया। इससे उसके भीतर आत्मविश्वास का विकास हुआ है और अब वह अपनी मनपसंद चीजों के लिए पति से दबी जुबान में फरमाइश करने वाली परंपरागत पत्नी नहीं रह गई है, बल्कि वह अपने शौक और जरूरतों पर खुल कर खर्च करती है। इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ.अशुम गुप्ता कहती हैं, पति-पत्नी के आपसी रिश्ते पर आर्थिक मुद्दों का बहुत गहरा प्रभाव पडता है। परिवार में जो व्यक्ति आर्थिक रूप से ज्यादा सक्षम होता है, उसकी स्थिति ज्यादा मजबूत होती है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे पॉवर रिलेशन कहा जाता है। पहले पति निर्विवाद रूप से परिवार का मुखिया होता था, पत्नी और बच्चे उसकी हर बात सिर झुका कर मानते थे, लेकिन आज स्थिति बदल गई है। अपना आर्थिक सहयोग देकर पत्नी भी परिवार को चलाने में समान रूप से भागीदार है। इससे परिवार और समाज में उसकी स्थिति सुदृढ हुई है। आज के बच्चों की नजरों में मां का सम्मान पहले से कहीं ज्यादा बढ गया है, क्योंकि आज की मां बच्चे के लिए खाना बनाने, उसका होमवर्क करवाने से लेकर उसके स्कूल की फीस जुटाने तक सारे काम खुद करती है।

बात सिर्फ पैसों की नहीं

आर्थिक आजादी का यह मामला सिर्फ पैसे कमाने और मनचाहे ढंग से खर्च करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इससे स्त्री का आत्मविश्वास बढा है और अब वह स्वयं या अपने परिवार से जुडे बडे निर्णय खुद लेने का हौसला रखती है। इस संबंध में बैंक में कार्यरत मंजूषा अग्रवाल कहती हैं, मेरी मां अल्प शिक्षित गृहिणी थीं, उनका सपना था कि उनकी बेटी डॉक्टर बने। पीएमटी में मेरा चुनाव भी हो गया था, लेकिन मेरे पिता मुझे पढने के लिए हॉस्टल भेजने को तैयार नहीं थे। उनकी मर्जी के आगे मां कुछ बोल नहीं पाई। लेकिन जब मेरी बेटी ने एमबीए करने की इच्छा जाहिर कि तो पति की आपत्ति के बावजूद मैंने उसका साथ दिया और आज वह अहमदाबाद स्थित आईआईएम से एमबीए कर रही है। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि अपनी बेटी की पढाई का खर्च उठाने में मैं सक्षम हूं। आर्थिक आत्मनिर्भरता स्त्री की बहुत बडी ताकत है। इससे परिवार और समाज उसे सम्मानजनक दर्जा देता है। अगर पत्नी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो तो पति चाह कर भी हर मामले में अपनी मनमर्जी नहीं चला सकता।

असली मुद्दा है अहं का

समाज चाहे कितना ही आधुनिक क्यों न हो जाए, लेकिन स्त्रियों के प्रति पुरुषों के दृष्टिकोण में अभी भी ज्यादा बदलाव नहीं आया है। अगर परिवार में पति-पत्नी दोनों ही बराबर कमाते हों तब भी अपने पुरुषवादी अहं के कारण पति यही मानता है कि मेरा परिवार मेरी मर्जी से चलना चाहिए।

इस संबंध में इंटर कॉलेज की शिक्षिका संगीता (परिवर्तित नाम) कहती हैं, मेरे पति वैसे तो बहुत के अरिंग स्वभाव के हैं, लेकिन आर्थिक मामलों में उनका व्यवहार बडा ही अजीब है। मेरी शादी के आठ साल हो चुके हैं, लेकिन वह मुझे बैंक से मेरी तनख्वाह निकालने ही नहीं देते। उनका कहना है कि तुम मुझे बताया करो कि तुम्हें क्या चाहिए। मैं तुम्हारी और बच्चों की सारी जरूरतें पूरी करूंगा। अपने पैसों को तुम बचत मान लो। हालांकि वह मेरी सारी जरूरतें पूरी करते हैं, लेकिन खुद कमाने के बावजूद इस तरह उन पर निर्भर रहना मुझे अच्छा नहीं लगता। अगर मुझे अपने लिए मनपसंद ज्यूलरी खरीदनी हो या छोटी बहन के बर्थडे में उसे कोई उपहार देना हो तो मैं संकोचवश उनसे नहीं कह पाती। इन आठ वर्षो में मैंने अपने पति के व्यक्तित्व को जितना समझा है, उससे तो यही लगता है कि वह केवल अपने अहं की संतुष्टि के लिए ऐसा करते हैं।

डॉ. अशुम गुप्ता के अनुसार, पुरुष के लिए उसका अहं बहुत अधिक मायने रखता है। पत्नी के नौकरी करने से परिवार के जीवन स्तर में होने वाला सुधार तो पति को पसंद है, लेकिन उसे यह बात हर्गिज गवारा नहीं कि करियर की सफलता की दौड में पत्नी उससे आगे निकल जाए या उससे अधिक पैसे कमाए। सच तो यह है कि आज भी आम भारतीय परिवारों के लिए सुखद और संतुलित स्थिति वही है- जिसमें पत्नी कमाए तो जरूर लेकिन उसकी आय पति से कम हो। कुछ दिनों पहले मेरे पास एक दंपती का मामला आया था, जिसमें पत्नी एक एमएनसी में काम करती थी और प्रमोशन के बाद उसकी आय पति से ज्यादा हो गई थी। इस बात को लेकर पति का व्यवहार बहुत चिडचिडा हो गया था और वह अपनी नाराजगी का असली कारण बताने के बजाय मुझसे यह शिकायत कर रहा था कि मेरी पत्नी अब घर को जयादा समय नहीं दे पाएगी। इसलिए उसे अपनी नौकरी छोड देनी चाहिए।

फर्क मानसिकता का

दांपत्य जीवन के आर्थिक मुद्दों के संबंध में स्त्री और पुरुष का मनोविज्ञान अलग-अलग ढंग से काम करता है। डॉ.अशुम गुप्ता के मुताबिक, अध्ययनों से यह साबित होता है कि भारतीय पुरुष अपनी व्यक्तिगत जरूरतों पर खर्च करना ज्यादा पसंद करते हैं और इसके बारे में वे पत्नी को बताना नहीं चाहते। जबकि स्त्रियों का स्वभाव बहुत केअरिंग होता है। इसलिए वे पति, बच्चों, रिश्तेदारों और दोस्तों पर खर्च करना ज्यादा पसंद करती हैं। साथ ही स्त्रियों में मोल-भाव करके सामान खरीदने, कम पैसे में घर का खर्च चलाने जैसे स्वाभाविक गुण जन्मजात रूप से पाए जाते हैं। स्त्री के मन में एक तरह की स्थायी असुरक्षा की भावना भी होती है। वह हमेशा परिवार की आकस्मिक जरूरतों के बारे में सोचती है और उनके लिए वह कुछ न कुछ बचाती भी है। वैसे भी, भारतीय स्त्रियों में पति से छिपाकर बचत करने की आदत बहुत पुरानी रही है।

स्त्री-पुरुष की मानसिकता के इसी फर्क के कारण हर दंपती के बीच आर्थिक मुद्दों को लेकर थोडा-बहुत मतभेद स्वाभाविक है। कुछ अलग-अलग क्षेत्रों में सफलता के शीर्ष पर विराजमान मशहूर हस्तियां अपने दांपत्य जीवन के आर्थिक पहलू से जुडे अनुभवों को बांट रही हैं, सखी के साथ...

माना से लेता हूं पॉकेटमनी- सुनील शेट्टी, अभिनेता

मेरी पत्नी माना एक सफल ड्रेस डिजाइनर है और वह अपनी बुटीक भी चलाती है। उसने मेरी कई फिल्मों के लिए ड्रेस डिजाइनिंग का काम किया है। वह मेरे लिए कुछ स्टेज शोज भी आर्गेनाइज कर चुकी है। माना मल्टी टास्किंग वुमन है। मैंने अब तक जितना भी कमाया, सब माना को ही सौंपा है। एक वक्त ऐसा भी था, जब मेरे पास बहुत ज्यादा फिल्में होती थीं। तब मैं अति व्यस्त रहता था और मेरे पास घर के लिए जरा भी वक्त नहीं होता था। ऐसी स्थिति में गृहस्थी चलाने और पैसे खर्च करने की पूरी जिम्मेदारी माना पर होती थी।

पहले मेरे पिता परिवार के सारे खर्चे उठाते थे और पैसों का हिसाब-किताब भी वही रखते थे। शादी के बाद माना ने खुद-ब-खुद यह जिम्मेदारी उठाई। पैसों के मामले में हमारे बीच कोई दुराव-छिपाव नहीं है। मेरे सारे पैसे माना के ही पास होते हैं। जहां तक संभव हो हम दोनों क्रेडिट कार्ड और एटीएम के झंझट से दूर रहने की कोशिश करते हैं। घर के खर्च से जुडे सभी मामले, चाहे वह बच्चों की स्कूल फीस हो या घर के अन्य खर्च, यह सब कुछ माना ही देखती है। यहां तक कि मैं भी अपनी पॉकेटमनी माना से ही मांगता हूं लेकिन जब मैं अपने दोनों बच्चों आतिया और आहान को पॉकेटमनी देना चाहता हूं तो माना मुझे ऐसा करने से रोक देती है। उसका कहना है कि बच्चों को पॉकेटमनी देकर उनकी आदतें नहीं बिगाडनी चाहिए। उन्हें इस बात का एहसास होना चाहिए कि कडी मेहनत करने के बाद ही पैसा मिलता है और पैसे की कद्र करनी चाहिए।

माना तो इतनी अनुशासित है कि प्यास लगने पर वह कोल्डड्रिंक खरीदकर पीने के खिलाफहै। उसका कहना है कि पानी की जगह कोल्डड्रिंक पीना पैसे और सेहत दोनों की बर्बादी है। इन मुद्दों के लेकर कभी-कभी हमारे बीच हल्की झडप हो जाती है। बच्चों की पढाई उसकी प्राथमिकताओं की सूची में सबसे ऊपर है। इसकेलिए वह दूसरे खर्चो में कटौती करने को भी तैयार रहती है।

जहां तक निवेश का सवाल है, हम दोनों ही इस मामले में रिस्क लेने के बजाय सेफ इनवेस्टमेंट में यकीन रखते हैं। माना इतना सोच-समझकर खर्च करती है कि उसकी वजह से मुझे कभी भी आर्थिक तंगी महसूस नहीं हुई।

सोच-समझकर खर्च करते हैं हम- संजीव कपूर, शेफ

यदि मैं कुकिंग एक्सपर्ट हूं तो मेरी पत्नी अल्यूना गृहस्थी चलाने में माहिर है। आज वह प्रकाशक केरूप में अपनी पहचान बना चुकी है। उसने रेसिपीज पर आधारित कई किताबों का प्रकाशन किया है। आम तौर पर हर महीने की शुरुआत में मेरी पत्नी परिवार का बजट बनाती है। घर के सारे खर्च वही करती है। मैंने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि इस बढती महंगाई में वह किस तरह घर का खर्च चला रही है। एटीएम कार्ड के मामले में हम दोनों का यह मानना है कि इसका सीमित इस्तेमाल करना चाहिए वरना पैसे की बर्बादी होती है। स्टाफ की सेलरी से लेकर ऑफिस की मेंटेनेंस तक सभी खचरें की जिम्मेदारी अल्यूना की है और वह इस काम को कई बरसों से बहुत अच्छी तरह संभाल रही है। एक साथ ऑफिस और घर संभालना कोई आसान काम नहीं है। हमारे घर में हर तरह के बिल भरने का जिम्मा भी अल्यूना का ही है। इनवेस्ट्मेंटस का सारा काम वही देखती है। आर्थिक मामलों से जुडे कुछ बडे निर्णय हम दोनों मिलकर ले लेते हैं। वह बच्चों के स्कूल की फीस हमेशा साल की शुरुआत में ही एडवांस में जमा करा देती है, ताकि अचानक बीच में कोई दूसरा खर्च आ भी जाए तो उसकी वजह से उनकी पढाई का नुकसान न हो। मुझे बचपन से यही सिखाया गया था कि अपनी चादर देखकर ही पैर फैलाओ और अल्यूना भी इसी बात पर विश्वास करती है। इसलिए हमें कभी भी आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पडा। छुट्टियों के दौरान हम अकसर सपरिवार घूमने के लिए विदेश जाते हैं, पर मेरी पत्नी को आम औरतों की तरह अनाप-शनाप शॉपिंग करना बिलकुल पसंद नहीं है। हम खर्चे को अपना स्टेटस सिंबल नहीं मानते। विदेश जाने के बाद वहां हम थ्री स्टार होटलों में ठहरते हैं। हमने अपने बच्चों को भी यही सिखाया है कि वे पैसे बर्बाद न करें। किसी भी अनावश्यक खरीदारी की जिद न करें। यहां तक कि मैं अन्न की बर्बादी को भी पाप समझता हूं और अगर किसी कारण से हमारे घर में खाना बच भी जाता है तो दूसरे दिन उसे खाने में मुझे या मेरे परिवार को कभी कोई परेशानी नहीं होती।

घर की फाइनेंस मिनिस्टर हूं मैं- पायल कपूर, इंटीरियर डिजाइनर

मेरे घर की सारी अर्थव्यवस्था के संचालन की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है। मेरे पति अजय कपूर नार्थ दिल्ली पॉवर लिमिटेड के वाइस प्रेसीडेंट और चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर हैं। वह अपनी प्रोफेशनल लाइफ में बहुत ज्यादा व्यस्त रहते हैं। मेरा अपना बिजनेस है। इसलिए मैं अपने काम और घर को अपनी सहूलियत से खुद एक साथ मैनेज कर लेती हूं। घर का बजट भी मैं ही बनाती हूं। ऑफिस और घर के स्टाफ की सैलरी, महीने का राशन, दूध, फल-सब्जियां और इसके अलावा गृहस्थी को चलाने के लिए रोजमर्रा के जितने भी खर्चे होते हैं, उन्हें उठाने की जिम्मेदारी मेरी होती है। यूं कहा जा सकता है कि मैं घर की फाइनेंस मिनिस्टर हूं। किचन की जरूरत की चीजें और राशन महीने में एक ही बार खरीदती हूं, क्योंकि इससे बचत होती है। मैं फिजूलखर्ची में विश्वास नहीं करती। शॉपिंग के लिए कभी भी क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल नहीं करती। जहां तक संभव होता है चेक से पेमेंट करने की कोशिश करती हूं। अपने पास बहुत ज्यादा कैश भी नहीं रखती। मैं बहुत सोच-समझकर खर्च करती हूं और जितना संभव हो आकस्मिक जरूरतों के लिए थोडी-बहुत बचत भी कर लेती हूं। मैं बिजनेस के क्षेत्र में हूं। इसमें हर महीने की आमदनी निश्चित नहीं होती। इसलिए मैं हमेशा इस बात का ध्यान रखती हूं कि जहां जरूरी हो वहीं खर्च किया जाए। मेरी तुलना में मेरे पति का हाथ खुला है और कई बार वह बिना सोचे-समझे बहुत ज्यादा खर्च कर देते हैं। हम दोनों अपने पैसे अलग-अलग रखते हैं और खुद अपनी जरूरतों पर खर्च करते हैं। हम अपनी बचत भी अलग करते हैं। मेरे पति को मेरी आमदनी के बारे में जानकारी होती है लेकिन मुझे उनकी सेलरी के बारे में ज्यादा पता नहीं होता और न ही मुझे आम पत्नियों की तरह पूछताछ करने की आदत है।

जहां तक इनवेस्टमेंट का सवाल है तो टैक्स की बचत के लिहाज से ज्यादातर निवेश मेरे पति ही करते हैं। मुझे घर की सजावट की चीजें खरीदने और घर सजाने का शौक है तो मेरे पति को इलेक्ट्रॉनिक्स की चीजें ज्यादा पसंद हैं। हम दोनों अपने पैसों से अपने शौक पूरे करते हैं। आर्थिक मामलों में हम स्वतंत्र होते हुए भी एक-दूसरे पर निर्भर हैं। मेरे पति को एकाउंट्स की बहुत जानकारी है। इसलिए कोई भी बडा निवेश मैं उन्हीं की सलाह पर करती हूं।

बचाती हूं आकस्मिक जरूरतों के लिए- इशी खोसला, डाइटीशियन

आर्थिक मामलों में हमारे संबंध बेहद सुलझे हुए हैं। मेरे पति गगन खोसला अपनी फाइनेंस कंपनी चलाते हैं। गृहस्थी की जिम्मेदारियां हम दोनों मिलकर उठाते हैं। परिवार का बजट बनाने में भी हम दोनों का योगदान होता है। लेकिन प्रॉपर्टी, लोन, टैक्स, गाडी, इनवेस्टमेंट जैसे मामलों में मैं अपना सिर नहीं खपा सकती। इसलिए इनके बारे में मेरे पति ही निर्णय लेते हैं। खर्च के मामले में हम दोनों का हाथ बेहद खुला है। लेकिन पैसों केमामले में मैं अपने पति की तुलना में ज्यादा लापरवाह हूं अपने पैसे गिन कर कभी नहीं रखती पर मेरे पति थोडा सोच-समझकर खर्च करते हैं। हाथ खुला होने के बावजूद मैं आकस्मिक जरूरतों के लिए कुछ पैसे बचाकर जरूर रखती हूं। खुद कमाने के बाद भी आम स्त्रियों की तरह मुझे अपने पति से ज्यूलरी की फरमाइश करना बहुत अच्छा लगता है। मैं अपने पैसे अपने पास जरूर रखती हूं, लेकिन साधिकार भाव से पति से गिफ्ट या पैसे लेना मुझे बहुत अच्छा लगता है। पैसों को लेकर हमारे बीच हल्की-फुल्की नोक-झोंक भी चलती रहती है। जब हम सपरिवार कहीं घूमने जाने की तैयारी कर रहे होते हैं तो पैसे कौन खर्च करेगा इस बात को लेकर हमारे बीच हल्की-फुल्की बहस होती है। अगर पति कोई चीज दिलाने में आनाकानी करते हैं तो मुझे गुस्सा आ जाता है और मैं खुद अपने पैसों से अपनी पसंद की सारी चीजें खरीद लेती हूं। मेरा मानना है कि पति-पत्नी के बीच होने वाली हल्की-फुल्की नोक-झोंक दांपत्य जीवन को जीवंत बनाए रखती है।

आर्थिक संकट से उबारा पत्नी ने- डॉ. केकी मेहता, नेत्र रोग विशेषज्ञ

मेरी अपनी आई क्लीनिक है। मेरी पत्नी झेनोबिया कॉन्टेक्ट लेंस स्पेशलिस्ट है। अपनी व्यस्तता के बावजूद मेरी पत्नी घर-गृहस्थी और अस्पताल के आर्थिक मामलों को बडी कुशलता से संभालती है। हमारा पेशा ऐसा है कि कभी मेरी आय उससे ज्यादा होती है तो कभी उसकी आमदनी मुझसे ज्यादा हो जाती है, पर इस मुद्दे को लेकर कभी भी हमारे बीच अहं का टकराव नहीं होता। हम बजट बनाने से लेकर, खर्च का हिसाब तक सब कुछ कंप्यूटर पर करते हैं, जिससे हमारा काम व्यवस्थित रहता है और जब चाहें अपने खर्च का हिसाब देख सकते हैं। शादी के शुरुआती दिनों में जब पैसों की कमी रहती थी तब एक-एक पैसे की बडी कीमत थी। तब मेरी पत्नी ने बडी कुशलता से खर्च में कटौती करके मुझे आर्थिक संकट से उबारा। उसने शुरू से ही इस बात का खास ध्यान रखा कि बेवजह खर्चो को कैसे टाला जाए।

छोटे इनवेस्टमेंट हम अलग-अलग करते हैं लेकिन बडे इनवेस्टमेंट हम मिल-जुलकर करते हैं। हम दोनों अपने क्रेडिट कार्ड का उपयोग विदेश जाने पर ही करते हैं।

बराबर की भागीदारी है हमारी- अपर्णा भारद्वाज, अधिवक्ता सर्वोच्च न्यायालय

हम पति-पत्नी दोनों वकील हैं। हर महीने हमारी आमदनी निश्चित नहीं होती। इसलिए हम आर्थिक मामलों में किसी खास नियम से बंधे नहीं होते। मेरे पति राजेश त्यागी भी मेरी ही तरह आर्थिक मामलों में बेहद उदार हैं। घर का बजट बनाने में हम दोनों की बराबर की भागीदारी होती है।

परिवार का बजट बनाते समय हमारी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर किताबें होती हैं, क्योंकि हम दोनों को पढने का बहुत शौक है। फिर हमारा काम भी कुछ ऐसा है कि हमें किताबों की बहुत जरूरत होती है। हम दोनों का अलग बैंक एकाउंट है, लेकिन पैसों के मामले में हमारे बीच पूरी पारदर्शिता है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा था किहर महीने हमारी आमदनी निश्चित नहीं होती, इसलिए जिस महीने, जिसके एकाउंट में ज्यादा पैसे होते हैं, बडे पेमेंट जैसे- बिजली का बिल, एलआईसी का प्रीमियम आदि उसी के एकाउंट से दिया जाता है।

आमतौर पर किचन और घर से जुडे अन्य छोटे-छोटे खर्च मैं खुद अपने पैसों से पूरा कर लेती हूं। अगर कभी मेरे पास पैसे कम पड जाते हैं तो पति से मांग लेती हूं। कहने का अर्थ यह है कि वित्तीय मामलों में बराबर की भागीदारी है हमारी। मेरी बेटी दसवीं क्लास में पढती है। मैं उसे कोई पॉकेटमनी नहीं देती। उसे जब पैसों की जरूरत होती है, वह मुझसे मांग लेती है। हम दोनों बहुत ज्यादा बचत या इनवेस्टमेंट में यकीन नहीं करते, लेकिन जब भी घर के लिए कोई बडा सामान खरीदना होता है तो उसके पहले हम आपस में सलाह-मशविरा जरूर कर लेते हैं।

मुझे ऐसा महसूस होता है कि स्त्रियों की आर्थिकस्वतंत्रता का स्पष्ट प्रभाव उनके दांपत्य जीवन पर भी देखने को मिलता है। पहले परिवार से संबंधित सभी निर्णय पुरुष ही लिया करते थे और निर्णय प्रक्रिया में (खास तौर से वित्तीय मामलों में) स्त्रियों की भागीदारी नहीं के बराबर होती थी। लेकिन आज की स्त्री आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है। इसलिए परिवार से जुडे हर छोटे-बडे निर्णय पर उसकी राय बहुत मायने रखती है और पैसे खर्च करने के मामले में वह पति के बराबर की भागीदार होती है।

पसंद नहीं, पैसों को लेकर बहस- शक्ति आनंद, टीवी कलाकार

मेरे घर में पैसों का हिसाब मैं नहीं मेरी पत्नी सई रखती है। मेरा मानना है कि भारतीय समाज में सदियों से चली आ रही यह परंपरा अपने आपमें सही भी है। क्योंकि एक स्त्री ही घर को अच्छी तरह संभाल सकती है। पुरुष के लिए यह काम बहुत मुश्किल होता है। लिहाजा मेरी पत्नी भी अपना यह फर्ज बखूबी अदा करती है।

वैसे घर के खर्च की जिम्मेदारी हम दोनों की ही है। लेकिन मैं इन बातों पर अधिक ध्यान नहीं दे पाता। पैसों को लेकर मैं ज्यादा चिक-चिक पसंद नहीं करता।

मुझे पता है कि सई बहुत समझदार है। वह उतना ही खर्च करेगी, जितनी उसकी जरूरत होगी। अगर वह कभी घर के खर्च के बारे में मुझे कुछ बताने की कोशिश भी करती है तो मेरे पास सुनने का समय नहीं होता।

पैसों के मामले में हमारे बीच बेहद खुलापन है। जब भी जरूरत होती है, हम दोनों एक-दूसरे का एटीएम कार्ड इस्तेमाल कर लेते हैं। घर का बजट सई ही बनाती है। हम दोनों का ज्वाइंट एकाउंट है। जिसको जब जरूरत होती है, वह पैसे निकाल लेता है।

सई बहुत व्यवहार कुशल है और घर आने वाले मेहमानों की बहुत अच्छी तरह आवभगत करती है। रिश्तेदार चाहे मेरी तरफ के हों या उसके मायके के , वहसबका बहुत अच्छी तरह खयाल रखती है। पैसों को लेकर मैं अधिक बहस नहीं करता, क्योंकि जब हमारी शादी हुई थी तभी हमने यह निश्चय कर लिया था कि हम पैसों को हम बहुत ज्यादा अहमियत नहीं देंगे। इससे रिश्ते में कडवाहट आती है। इस मामले में सई भी बहुत उदार है।

जहां तक बडी इनवेस्टमेंट का सवाल है, इस पर हम दोनों की ही सहमति होती है। लेकिन मैं किसी भी इनवेस्टमेंट पर थोडी जांच-परख करता हूं, ताकि बाद में कोई नुकसान न हो। फलस्वरूप मुझे अधिक परेशानी नहीं होती। हमारे क्षेत्र में कभी भी किसी की आय निश्चित नहीं होती।

इसलिए जब कभी सई की आमदनी मुझसे अधिक होती है तो इससे मेरे अहं को कोई ठेस नहीं पहुंचती क्योंकि हमारे संबंधों में बहुत खुलापन है।

लिखकर रखती हूं हिसाब- डॉ. सोमा घोष, शास्त्रीय गायिका

मैं पैसों के मामले में शुरु से ही थोडी लापरवाह किस्म की रही हूं। हिसाब नहीं रख पाती। जहां जैसी जरूरत होती है, खर्च करती हूं। पहले मैं खर्च का हिसाब लिखकर नहीं रखती थी। फलस्वरूप किसे कितना देना है या किसने कितना दिया है, यह भूल जाती थी। एक रोज मेरे ससुर जी ने मुझे समझाया कि खर्च का हिसाब लिखकर रखना हमेशा फायदेमंद होता है। उसके बाद से मैं खर्च का हिसाब लिखकर रखती हूं और इससे मुझे बहुत आसानी होती है। घर के खर्चे की जिम्मेदारी हम दोनों की ही होती है।

मेरे पति शुभंकर घोष संगीतकार हैं और हम दोनों को एक-दूसरे की आमदनी के बारे में पता होता है। मेरे पास एटीएम कार्ड है पर मैं ज्यादा टेक्नोलॉजी फ्रेंड्ली नहीं हूं इसलिए मैं उसका ज्यादा इस्तेमाल नहीं कर पाती। परिवार का बजट बनाने में पति की मुख्य भूमिका होती है। हम दोनों का ज्वाइंट एकाउंट है और जब जिसे जरूरत होती है, वह पैसे निकाल लेता है। रिश्तेदारों की आवभगत की पूरी जिम्मेदारी मेरी होती है। क्योंकि कहां क्या खर्च करना है, यह मुझे पता होता है।

मैं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर जरूर हूं, लेकिन घर का खर्च चलाने के लिए पैसे देने की जिम्मेदारी मेरे पति की होती है। मेरे विचार से हमारी यह भारतीय परंपरा अपने आपमें बहुत अच्छी है, जिससे स्त्री को घर में पूरा सम्मान मिलता है। जब हमारे सामने खर्च बहुत ज्यादा होता है और पैसे कम होते हैं तो हमारे बीच हल्की-फुल्की नोक-झोंक हो ही जाती है। जैसा कि अकसर हम कलाकारों के साथ होता है। हमारे जीवन में भी कई बार ऐसा दौर आया जब हमें आर्थिक तंगी के दौर से गुजरना पडा। हम दोनों ने बडी मुश्किल से अपने जरूरी खर्चो में कटौती की, तब जाकर संकट से बाहर निकल पाए। जहां तक इनवेस्टमेंट का सवाल है तो बडी इनवेस्टमेंट पर हम दोनों मिलकर खर्च करते हैं। बच्चों की पॉकेटमनी का हिसाब मेरे पति ही रखते हैं।

मुझे ऐसा नहीं लगता कि मेरी आमदनी ज्यादा होने के कारण मेरे पति के अहं को ठेस पहुंचती है, बल्कि इससे उन्हें खुशी मिलती है कि उनकी पत्नी घर में आर्थिक सहयोग दे रही है।

अच्छा नहीं लगता पति से मांगना- जरीना वहाब, अभिनेत्री

मेरी अम्मी बहुत अच्छी तरह गृहस्थी चलाती थीं। उन्हें देखकर ही मैंने भी अपना घर संभालना सीखा है। जहां तक मेरी गृहस्थी का सवाल है, मेरे पति आदित्य पंचोली वैसे तो बहुत अच्छे इंसान हैं लेकिन घर-गृहस्थी के काम वह बिलकुल नहीं कर पाते। सब कुछ मुझे ही संभालना पडता है। जहां तक मेरे और आदित्य दोनों के पारिश्रमिक की बात है, आदित्य मुझे घर चलाने के लिए एक निश्चित रकम दे देते हैं। बचत की कोशिश मेरी ही तरफ से होती है। हम दोनों का जॉइंट एकाउंट है। मैं एटीएम पर ज्यादा विश्वास नहीं करती। आदित्य अपने रोज के खर्चे किस तरह मैनेज करते हैं, इस बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं होती। पैसों के मामले में हम दोनों के बीच पूरी पारदर्शिता है। पर मुझे लगता है कि पैसों को लेकर एक-दूसरे से ज्यादा पूछताछ करना ठीक नहीं है। हम दोनों एक-दूसरे पर पूरा विश्वास करते हैं। अकसर मैं हर तीन महीने में एक बार सुपर मार्केट जाती हूं और रोजमर्रा जरूरत की चीजें खरीद लाती हूं। हर महीने के यूटीलिटी बिल्स का ध्यान मैं ही रखती हूं। हां, एक बार हम दोनों शूटिंग के सिलसिले में मुंबई से बाहर थे और आदित्य इलेक्ट्रिक बिल जमा कराना भूल गए, जिसके कारण हमारे घर से बिजली का कनेक्शन काट दिया गया। इसके बाद से ये सारे काम मैं खुद करती हूं। मैंने 17 साल की उम्र से मॉडलिंग शुरू की और बहुत जल्दी अपने पैरों पर खडी हो गई। इसलिए मुझे अपने खर्चो के लिए कभी भी किसी से कुछ मांगने की आदत नहीं रही। मैंने कुछ इनवेस्टमेंट रिअल एस्टेट में किया है तो आदित्य ने स्टॉक मार्केट में। बडी इनवेस्टमेंट के लिए हम एक-दूसरे से सलाह-मशविरा जरूर करते हैं।

मुझे ऐसा लगता है कि पति की आमदनी चाहे कितनी ही अधिक क्यों न हो लेकिन हर स्त्री को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर जरूर होना चाहिए ताकि उसे अपने रोजमर्रा खर्च के लिए पति से पैसे मांगने की जरूरत न पडे।

नारियल के गुण पर एक नजर





नारियल एक, गुण अनेक
Sep 08, 04:53 pm

नई दिल्ली [जागरण न्यूज नेटवर्क]। भारतीय खानपान में नारियल का प्रयोग सदियों से होता आ रहा है। नारियल का गूदा, पानी और तेल इस्तेमाल में लाया जाता है। यह न सिर्फ खाने में स्वादिष्ट होता है, इसे बेहद पौष्टिक भी माना गया है। इसमें प्रचुर मात्रा में फाइबर, विटामिन और खनिज होता है। नारियल के क्या-क्या फायदे हैं, आइये डालते हैं एक नजर।

-यह इंफ्लूएंजा, दाद, चेचक, हेपेटाइटिस सी, एड्स जैसे बीमारियों के लिए जिम्मेदार वायरस को खत्म कर देता है।

-यह उन बैक्टीरिया को भी खत्म करता है जो अल्सर, गले का संक्रमण, दांतों की बीमारी और निमोनिया पैदा करते हैं।

-शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है।

-यह इंसुलिन के स्राव को बेहतर करता है रक्त में ग्लूकोज की मात्रा को संतुलित बनाए रखता है। यह डायबिटीज का खतरा भी घटाता है।

-नारियल के सेवन से शरीर द्वारा कैल्शियम और मैग्नीशियम के अवशोषण की प्रक्रिया बेहतर हो जाती है। यह हड्डियों और दांतों को भी मजबूत बनाता है।

-आस्टियोपोरोसिस [हड्डियों का कमजोर हो जाना] के खतरे से बचाता है।

-पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है।

-नारियल बवासीर में होने वाले दर्द को घटाने में कारगर है।

-यह ब्रेस्ट, कोलन [बड़ी आंत] और लिवर कैंसर के खतरे से बचाता है।

-दिल के मरीजों के लिए काफी फायदेमंद है। यह कोलेस्ट्राल के अनुपात को सुधारता है और दिल की बीमारी के खतरे को कम करता है।

-पित्ताशय से संबंधित बीमारी के लक्षणों से छुटकारा दिलाने में मदद करता है।

-यह किडनी के स्टोन को गलाने में मदद करता है।

-इसमें कैलोरी काफी मात्रा में पाई जाती हैं।

-मोटापे से बचाता है।

-सूर्य की पराबैगनी किरणों के दुष्प्रभाव से शरीर की रक्षा करता है।

-यह शरीर पर पड़ने वाली झुर्रियों और शिथिल पड़ती त्वचा के लिए उपयोगी होता है।

-नारियल का तेल किसी दवा से कम नहीं। स्वास्थ्य के लिहाज से इसे सबसे अच्छा तेल माना गया है।

नारियल का लेटिन नाम कोकोस न्यूसीफेरा है। नारियल का पानी पीकर, कच्चा नारियल खाने से कृमि निकल जाते है। ५०ग्राम नारियल के तेल में २नींबू का रस मिलाकर मालिश करने से खुजली कम होती है।प्रातः भूखे पेट २५ग्राम नारियल खाने से नक्सीर आना बन्द होता है। यह सात दिन तक खाये। नित्य एक नारियल का पानी गर्भावस्था में पीते रहने से सुन्दर सन्तान का जन्म होता है। नारियल मूत्र साफ़ करता है।कामोत्तेजक है। मासिक धर्म खोलता है। यह शरीर को मोटा करता है।मस्तिष्क की दर्बलता दूर करता है। खाँसी और दमा वालों को नारियल नहीं खाना चाहिये। नारियल का पानी पीने से पथरी निकल जाती है।कच्चा नारियल विशेष लाभदायक है।

मंगलवार, 8 सितंबर 2009

पटना कारोबार के लिए सबसे अच्छे शहर में

कारोबार शुरू करने के लिहाज से पटना, मुंबई से अच्छा और नई दिल्ली के बाद दूसरे नंबर का सबसे बेहतर शहर है।
विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम (आईएफसी) की रपट में कहा गया है कि इनके अलावा जयपुर हैदराबाद और भुवनेश्वर ऐसे शहर हैं जहां कारोबार करना आसान है।
रपट में कहा गया कि लुधियाना में कारोबार करना सबसे आसान है जिसके बाद हैदराबाद, भुवनेश्वर, गुड़गांव, अहमदाबाद, नई दिल्ली, जयपुर और गुवाहाटी का स्थान है।
जिन 17 शहरों को सर्वेक्षण किया गया है उनमें कारोबार करने के लिहाज पटना का स्थान 14वां है और यह चेन्नई और कोलकाता से ऊपर है। कोलकाता इस सूची में सबसे नीचले पायदान पर है।
इन शहरों को सात मानकों के आधार पर स्थान दिया गया है जिनमें कारोबार शुरू करना निर्माण परमिट संपत्ति का पंजीकरण कर भुगतान आदि शामिल हैं।
हालांकि रैंकिंग में वृहत् आर्थिक हालात बुनियादी ढांचा कार्यबल का कौशल या सुरक्षा शामिल नहीं है। रपट में कहा गया कि पिछले तीन साल के मुकाबले भारत के ज्यादातर बड़े शहरों में कारोबार करना अब ज्यादा आसान है। जहां तक सबसे तेजी से कारोबार शुरू करने की बात है तो मुंबई और नोएड सबसे आगे हैं। यहां सिर्फ 30 दिनों में कारोबार शुरू किया जा सकता है जबकि लागत के लिहाज से पटना में कारोबार शुरू करना सबसे सस्ता है।
लुधियाना जयपुर और नोएडा में कर अदायगी आसान है जबकि चेन्नई कोलकाता और पटना में कर का भुगतान करना मुश्किल है। वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले भारतीय शहर कारोबार बंद करने और कर अदा करने के मामले में पीछे हैं। रपट के मुताबिक भारत में 90 फीसद से ज्यादा रोजगार अनौपचारिक क्षेत्र में हैं और नियमन प्रक्रिया में सुधार से औपचारिक क्षेत्र में कारोबार के अच्छे परिचालन से मदद मिल सकती है।
विश्व बैंक ने कहा लाल फीताशाही में कमी संपत्ति अधिकार में स्पष्टता और नियामक अनुपालन को सुगठित करने जैसे सुधार कंपनियों और कर्मचारियों के लिए फायदेमंद हो सकते हैं।

महिमा हस्ताक्षर की

हस्ताक्षर और आपका भविष्य

यह तो आप जानते ही हैं कि हर व्यक्ति के दो रूप होते हैं - एक रूप जो उसके असली व्यक्तित्व को दर्शाता है तथा दूसरा रूप जो वह समाज में सबको दिखाने के लिए अपनाए रखता है। समाज में लोक मर्यादा के कारण कई बार हमें अलग तरह से व्यवहार करना पडता है जिसे आप कमजोरी भी कह सकते हैं अत: इसके फलस्वरूप व्यवहार में भिन्नता होना स्वाभाविक है।
हस्ताक्षर व्यक्ति के व्यक्तित्व का संपूर्ण आइना होता है अत: व्यक्ति के हस्ताक्षर में उसके व्यक्तित्व की सभी बातें पूर्ण रूप से दिखाई देती है। इस प्रकार हस्ताक्षर एक दर्पण है जिसमें व्यक्तित्व की परछाई स्पष्ट यप से झलकती है।

जो व्यक्ति अपने हस्ताक्षर का पहला शब्द काफी बडा रखता है, वह व्यक्ति उतना ही विलक्षण प्रतिभा का घनी, समाज में काफी लोकप्रिय व उच्चा पद प्राप्त करने वाला होता है। हस्ताक्षर में पहला शब्द बडा व बाकी के शब्द सुन्दर व छोटे आकार में होते हैं, ऎसा व्यक्ति घीरे-घीरे उच्चा पद प्राप्त करते हुए सर्वोच्चा स्थान पाता है। ऎसा व्यक्ति जीवन में पैसा बहुत कमाता है। कई भवनों का मालिक बनता है व समाज में काफी लोकप्रिय होता है, किन्तु कुछ रंगीत तबियत का व संकोची स्वभाव का उत्तम श्रेणी का विद्वान भी होता है। वह अपने कुल का काफी नाम ऊँचा करता है।

जो व्यक्ति अपने हस्ताक्षर इस प्रकार से लिखता है जो काफी अस्पष्ट होते हैं तथा जल्दी-जल्दी लिखे गये होते हैं, वह व्यक्ति जीवन को सामान्य रूप से नहीं जी पाता है। हर समय ऊँचाई पर पहुँचने की ललक लिए रहता है। इस प्रकार का व्यक्ति राजनीति, अपराघी, कूटनीतिज्ञ या बहुत बडा व्यापारी बनता है। जीवन आपाघापी में व्यतीत करने के कारण समाज से कटने लगता है तथा लोगों की अपेक्षा का शिकार भी बनता है। यह व्यक्तिगत रूप से पूर्ण संपन्न तथा इनका वैवाहिक जीवन कम सामान्य रहता है। घोखा दे सकता है परंतु घोखा खा नहीं सकता है। यह इनकी विशेषता है।

जो व्यक्ति हस्ताक्षर काफी छोटा व शब्दों को तोड-मरोडकर उनके साथ खिलवाड करता है जिसके फलस्वरूप हस्ताक्षर बिल्कुल पढने में नहीं आता है वह व्यक्ति बहुत ही घूर्त व चालाक होता है। अपने फायदे के लिए किसी का भी नुकसान करने व नुकसान पहुँचाने से नहीं चूकता। पैसा घन भी गलत रास्ते से कमाता है तथा ऎसा व्यक्ति राजनीति एवं अपराघ के क्षेत्र में काफी नाम कमाता है।

जो व्यक्ति अपने हस्ताक्षर के नीचे दो लाइनें खींचता है वह व्यक्ति भावुक होता है। पूरी शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाता, मानसिक रूप से थोडा कमजोर होता है। जीवन में असुरक्षा की भावना रहती है, जिसके कारण आत्महत्या करने का विचार मन में रहता है। पैसा जीवन में अच्छा होता है परंतु कंजूस स्वभाव भी रहता है।
जो व्यक्ति अपने हस्ताक्षर के शब्दों को काफी घुमाकर सजाकर प्रदर्शित करके करता है वह व्यक्ति किसी न कसी हुनर का मालिक अवश्य होता है, यानि कलाकारख् गायक, पेंटर, व्यग्यकार व अपराघी होता है। ऎसे व्यक्तियों का समय जीवन के उत्तरार्द्ध में अच्छा होता है।

जो व्यक्ति अपने हस्ताक्षर में नाम का पहला अक्षर सांकेतिक रूप में तथा उपनाम पूरा लिखता है तथा हस्ताक्षर के नीचे बिन्दु लगाता है, ऎसा व्यक्ति भाग्य का घनी होता है। मृदुभाषी, व्यवहार कुशल, समाज में पूर्ण सम्मान प्राप्त करता है। ईश्वरवादी होने के कारण इन्हें किसी भी प्रकार की लालसा नहीं सताती, इसके फलस्वरूप जो भी चाहता है स्वत: ही प्राप्त हो जाता है। वैवाहिक जीवन सुखी व संतानों से भी सुख प्राप्त होता है।

जो व्यक्ति अपने हस्ताक्षर के अंतिम शब्द के नीचे बिंदु (.) रखता है। ऎसा व्यक्ति विलक्षण प्रतिभा का घनी होता है। ऎसा व्यक्ति जिस क्षेत्र में जाता है काफी प्रसिद्धि प्राप्त करता है और ऎसे व्यक्ति से बडे-बडे लोग सहयोग लेने को उत्सुक रहते हैं।

जो व्यक्ति अपने हस्ताक्षर स्पष्ट लिखते हैं तथा हस्ताक्षर के अंतिम शब्द की लाइन या मात्रा को इस प्रकार खींच देते हैं जो ऊपर की तरफ जाती हुई दिखाई देती हे, ऎसे व्यक्ति लेखक, शिक्षक, विद्वान, बहुत ही तेज दिमाग के शातिर अपराघी होते हैं। ऎसे व्यक्ति दिल के बहुत साफ होते हैं हरेक के साथ सहयोग करने के लिए तैयार रहते हैं। मिलनसार, मृदुभाषी, समाज सेवक, परोपकारी होते हैं। यह व्यक्ति कभी किसी का बुरा नहीं सोचते हैं, सामने वाला व्यक्ति कैसा भी क्यों न हो हमेशा उसे सम्मान देते हैं। सर्वगुण संपन्न होने के बावजूद भी आपको समाज में सम्मान घीरे-घीरे प्राप्त होता है। जीवन के उत्तरार्द्ध में आपको काफी पैसा व पूर्ण सम्मान प्राप्त होता है। जीवन में इच्छाएं सीमित होने के कारण इन्हें जो भी घन व प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। उससे यह काफी संतुष्ट रहते हैं।

हस्ताक्षर या लिखावट से हमारा सीघा संबंघ मानसिक विचारों से होता है, यानि हम जो सोचते हैं करते हैं। जो व्यवहार मे लाते हैं वह सब अवचेतन रूप में कागज पर अपनी लिखावट व हस्ताक्षर के द्वारा प्रदर्शित कर देते हैं।
हस्ताक्षर के अघ्ययन से व्यक्ति अपने भविष्य व व्यक्तित्व के बारे में जानकारी कर सकते हैं और हस्ताक्षर में दिखाई देने वाली कमियों को दूर करते हुए अच्छे हस्ताक्षर के साथ-साथ अपना भविष्य व व्यक्तित्व भी बदल सकते हैं।

एक खुशनुमा दिन बनाने के लिए जरुरी है 90-10 का सिद्धांत

90-10 का सिद्धांत
एक बहुत ही महत्वपूर्ण सूत्र है जो जीवन के प्रति एक नया दृष्टिकोण दे सकता है। "90-10 का सिद्धांत" नाम के इस सूत्र के अनुसार हमारे जीवन में जो घटित होता है उसका मात्र 10 प्रतिशत हमारे हाथ में नहीं होता बाकी का 90 प्रतिशत हमारे हाथ में होता है। इसे एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं। आप दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहे हैं। नाश्ते की मेज पर आपकी बेटी ने चाय का प्याला आपकी कमीज पर गिरा दिया, आपने गुस्से में उसे एक चपत लगा दी और साथ ही पत्नी को भी डांट पिला दी कि उसने न तो चाय का प्याला ठीक से रखा न ही बेटी को कोई तमीज सिखाई है। गुस्से में भुनभुनाते हुए आप ऊपर गए कपडे बदल कर जब नीचे आए तो देखा कि रोने के कारण बेटी ने नाश्ता पूरा नहीं किया और उसकी स्कूल बस निकल गई। पत्नी को भी दफ्तर जाना था और क्रोध में वो किसी तरह का सहयोग भी नहीं देना चाहती थी इसलिए बच्ची को स्कूल आपको ही छोडना था। गुस्से में आपने उसे स्कूल छोडा तो आपसे इतनी नाराज थी कि पीछे मुडकर भी नहीं देखा। दफ्तर के लिए पहले ही देर हो चुकी थी इसलिए आपने गाडी की गति बढा दी और ट्रेफिक पुलिस के हत्थे चढ गए। पैसे देकर जैसे तैसे दफ्तर पहुंचे तो याद आया कि ब्रीफकेस तो घर ही भूल आए। एक खराब दिन के बाद जब शाम को घर पहुंचे तो पत्नी और बेटी का मूंड खराब था और आपसे बात करने या आपका स्वागत करने में उनकी कोई रूचि नहीं थी।
इसी घटना को दूसरी तरह देखते हैं। बेटी ने कमीज पर चाय गिरा दी। आप हडबडाए परन्तु तुरन्त ही संभलते हुए आपने घबराई हुई बेटी को प्यार से कहा, " कोई बात नहीं आगे से घ्यान रखना। " जल्दी-जल्दी कपडे बदल कर आप नीचे आए तो देखा आपकी बेटी स्कूल बस में चढ रही है और आपको देखते ही उसने हाथ दिया। आप और आपकी पत्नी मुस्कुराते हुए एक साथ काम पर निकले। समय पर दफ्तर पहुंच कर अपने एक खुशनुमा दिन बिताया। घर लौटे तो बेटी और पत्नी ने मुस्कुराते हुए आपका स्वागत किया। इस घटना में जो 10 प्रतिशत आपके हाथ में नहीं था वो है चाय के प्याले का गिरना बाकी का 90 प्रतिशत अर्थात आपकी प्रतिक्रिया आपके हाथ में थी।
ज्योतिष शास्त्र में इस त्वरित प्रतिक्रिया के लिए केतु एवं सूर्य तथा द्वितीय एवं चतुर्थ भाव की महत्वपूर्ण भूमिका है। दूसरा भाव वाणी का है तथा चौथा भाव हमारे विचार या opinion का है। केतु त्वरित परिणामों के लिए जाने जाते हैं। दूसरे भाव में स्थित केतु त्वरित एवं अत्यधिक खरा बोलने के लिए प्रेरित करते हैं। इसी प्रकार इन भावों में सूर्य की उपस्थिति भी समान परिणाम देती है,
जैसे भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव मजबूत करने का श्रेय लार्ड कर्जन को जाता है। अपनी जवान के तीखेपन से ही इन्होंने तत्कालीन नवाबों को निरूत्तर कर दिया था और वकालत के क्षेत्र में राम जेठमलानी ने अपने नाम के झण्डे गाडे हैं। यह त्वरित एवं तीखी टिप्पणियों के लिए सदा मशहूर रहे हैं।
ये द्वितीय भाव स्थित केतु की ही कृपा है। उक्त हस्तियों ने अपने-अपने क्षेत्र में पूर्ण निष्ठा से अपने लिए जगह बनाई, अत: इनके professional field में तीखी टिप्पणियों को भी सर माथे लिया गया। साथ ही इनकी टिप्पणियों में इनका अनुभव, अपने क्षेत्र में इनकी पकड सम्मिलित है। इनकी टिप्पणियां उस कडवी गोली की तरह है जो अंतत: फायदा देती हैं परन्तु व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया से गुजरते हुए या निजी रिश्तों में त्वरित एवं तीखी प्रतिक्रिया घातक सिद्ध हो सकती है। यद्यपि यह ग्रह प्रदत्त है परन्तु ग्रहों के इस इशारे को समझ कर तथा उनके आशीर्वाद और अपने प्रयास से हम इससे बच सकते हैं। हमारे हाथ में जो 90 प्रतिशत है, उसका सही प्रयोग ही इस प्रतिस्पर्द्धा के युग में हमें संतुलित व्यक्तित्व प्रदान कर सकता है जो हमें दौड में औरों से आगे ले जाएगा।