गुरुवार, 27 अगस्त 2009

भारत के भविष्य कूड़े में रोटी की जंग में


वो निगाहे सलीब है,हम बहुत बदनसीब है।

आइए आंख मूंद लें, ये नजारे अजीब है॥


Aug 27, 11:47 amबताएं
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बस्ती [आशुतोष कुमार मिश्र]।

वो निगाहे सलीब है,हम बहुत बदनसीब है।

आइए आंख मूंद लें, ये नजारे अजीब है॥

कवि दुष्यंत कुमार ने इस बात को दुनिया जहान को समझाने के लिए कलम चलाई। यहां हमारे पास एक तस्वीर हैं जिसमें देश के भविष्य कूड़े में रोटी तलाश रहे हैं। तस्वीर सवाल करती है। सवाल यह कि आखिर समाज कूड़े में रोटी की तलाश करने वालों की ओर कब देखेगा।

भारत की यह तस्वीर बस्ती शहर की है। पुराने किसान हाईस्कूल के पीछे जीवन गुजार रहे दो मासूम और उनके पिता फैजान से मिलिए। 15 साल उम्र है इस्लाम की और 13 वर्ष उसकी बहन मुस्कान की। दोनो मां के साये से दूर हो गये है। तब इन मासूमों का ठिकाना सूबे की राजधानी लखनऊ थी। वक्त के थपेड़ों में पत्नी गंवा चुका फैजान यहां रोटी की जंग में जुटा है।

शुक्रवार सुबह कुनबे की एक अजीब कहानी आम हुई। धरती पर मैले कपड़े में फैजान झपकी लेते नजर आया। थोड़ी दूर पर मासूमों की रोंगटे खड़ी देने वाली कहानी दिखाई दी। कूड़े में खुशी तलाशते मासूमों ने मानो दुनिया की दौलत बटोर ली थी। बकौल इस्लाम पहले हम लखनऊ में रहते थे। एक वर्ष तक पढ़ाई भी की लेकिन मां दुनिया से चल बसी। फिर फकीरी का पड़ाव यहां आ पहुंचा।

इस्लाम की बात सुनकर उसकी बहन के चेहरे का रंग हर क्षण बदलता नजर आया। इसी बीच फैजान ने मासूमों की ओर आंख तरेरी, कि क्या यहां भी फिर कोई मुसीबत आने वाली है। इस्लाम ने कहा हम रोज उन गलियों से होकर गुजरते है, जहां कोई दूसरा नहीं जाता। थैला लेकर प्लास्टिक व कबाड़ चुनने का सिलसिला शुरू होता है। गुरुवार शाम तो मानो ऊपर वाले ने करिश्मा ही कर दिया। एक गली में इतनी सारी रोटियां थैले में मिल गयीं। और दो होटल के बाहर ढेर सारा चावल। हम चावल व रोटी को सुखाकर रख रहे है। जब भूख लगेगी तब खाएंगे।