बुधवार, 30 दिसंबर 2009

बथुआ खाओ, पथरी और कब्ज भगाओ

http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_6063400.html

नई दिल्ली [जागरण न्यूज नेटवर्क]। बथुआ कई औषधीय गुणों से भरपूर होता है। डाक्टरों के मुताबिक बथुआ को खाने में किसी न किसी रूप में शामिल जरूर करना चाहिए। यह स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होता है। इसमें आयरन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसके साग को नियमित रूप से खाने से कई रोगों को जड़ से समाप्त किया जा सकता है। इससे गुर्दे में पथरी होने का खतरा काफी कम हो जाता है। गैस, पेट में दर्द और कब्ज की समस्या भी दूर हो जाती है। आज हम आपको बता रहे हैं बथुआ के औषधीय गुणों के बारे में :




-कच्चे बथुआ के एक कप रस में थोड़ा सा नमक मिलाकर प्रतिदिन लेने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।



-गुर्दा, मूत्राशय और पेशाब के रोगों में बथुआ का रस पीने से काफी लाभ मिलता है।



-बथुआ को उबाल कर इसके रस में नींबू, नमक और जीरा मिलाकर पीने से पेशाब में जलन और दर्द नहीं होता।



-सिर में अगर जुएं हों तो बथुआ को उबालकर इसके पानी से सिर धोएं। जुएं मर जाएंगे और सिर भी साफ हो जाएगा।




-सफेद दाग, दाद, खुजली फोड़े और चर्म रोगों में बथुआ को प्रतिदिन उबालकर इसका रस पीना चाहिए।



-बथुआ का रस मलेरिया, बुखार और कालाजार संक्रामक रोगों में भी फायदेमंद होता है।



-कब्ज के रोगियों को तो इसका नियमित रूप से सेवन करना चाहिए। कुछ हफ्तों तक नियमित रूप से खाने से कब्ज की समस्या समाप्त हो जाती है।



-बथुआ को साग के तौर पर खाना पसंद न हो तो इसका रायता बनाकर खाएं।



-पथरी होने पर एक गिलास कच्चे बथुआ के रस में शक्कर को मिलाकर रोज पिएं। पत्थरी टूटकर बाहर निकल आएगी।

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

शनि के टाइटन पर कोहरा



शनि ग्रह के सबसे बड़े चंद्रमा टाइटन पर पानी की तलाश करने के बाद वैज्ञानिकों ने उसके दक्षिणी ध्रुव पर कोहरे का जमाव खोज निकाला है।
कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी के वैज्ञानिकों के अनुसार टाइटन के दक्षिणी ध्रुव पर कमोबेश मीथेन का संघनन मिला है जिससे यहां वहां कोहरे की परत जमा हुई है।

मुख्य शोधकर्ता माइक ब्राउन ने कहा कि सौर परिवार में पृथ्वी को छोड़कर टाइटन ही ऐसा स्थान है जहां भारी मात्रा में द्रव [व्यापक तौर पर द्रवित मीथेन और एथेन] जमा है।

उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि टाइटन की विशेषताओं के एक बात और जुड़ गई है वह है उसकी सतह पर जमा द्रव जो कोहरा है। सान फ्रांसिस्को में अमेरिकी भूभौतिकी संघ 2009 में ब्राउन ने कहा कि कोहरे की उपस्थिति इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सतह और वायुमंडल के बीच आदान प्रदान के कारण इसका निर्माण हुआ है और ऐसा लगता है कि वहां एक जलचक्र सक्रिय था।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

एक पेड़ पर निर्भर हैं चालीस लोग



कोपनहेगन में क्लाइमेट चेंज पर चल रहे समिट का आज तीसरा दिन है। इसमें सौ से ज्यादा देशों के 15000 प्रतिनिधियों के सैकड़ों टन भाषण बहाये जा चुके है। दो हफ्ते तक चलने वाले इस समिट का परिणाम भले ही कुछ निकले, पर इसमें शामिल जो भी लोग हैं, क्या वे कभी आस-पास झांकने की कोशिश करते हैं? समिट में भारतीय प्रतिनिधि भी शामिल हुए हैं। परंतु, शायद आपको पता नहीं कि एक आदमी को ऑक्सीजन के लिए 16 पेड़ की जरूरत होती है, जबकि भारत में 40 लोग महज एक पेड़ पर निर्भर हैं। फर्ज कीजिए, अगर वह एक पेड़ भी न रहे, तो क्या होगा? किसी ने सोचा है इस पर, कोई नहीं। शायद आप भी नहीं और जब तक आप नहीं सोचेंगे, कुछ भी होने को नहीं है। सो, प्लीज..पेड़ काटिए नहीं, लगाइए। जब तक पेड़ नहीं बचेगा, आप भी नहीं बचिएगा।

व्यस्त जीवन, काम का प्रेशर और ऊपर से ढेर सारे टेंशन। इतना काम कि सांस लेने तक की फुर्सत नहीं मिलती। पर, अभी तो आपको फुर्सत नहीं मिलती है। हो सकता है आने वाले समय में सांस लेने की फुर्सत मिल भी जाए, पर 'सांस' ही नहीं मिलेगी। जिस तरह से हम 'हाइटेक' बनने की लालसा में धड़ाधड़ पेड़ों की कटाई कर रहे हैं, यह अच्छे संकेत नहीं हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार प्रदूषित शहरों की लिस्ट में दिल्ली दूसरे पर है, जबकि मुंबई पहले स्थान पर पहुंच गया है। वहीं पटना का 14वां स्थान है। यानी एक तरफ हम विश्व के सबसे विकसित शहरों की लिस्ट में शामिल होने की मारामारी कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रदूषण फैलाने में भी कम पीछे नहीं हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे पटना में पेड़ों की संख्या 50 हजार के करीब है, यानी आबादी 20 लाख और पेड़ 50 हजार। पटना में ऑक्सीजन का लेवल धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। ग्रीन बेल्ट की हरियाली धीरे-धीरे सिमटती जा रही है। जगह-जगह उग आए कंक्रीट के पहाड़ ने तो सांस लेना दूभर कर दिया है।

जिस तरह से हमारे यहां पेड़-पौधे कटते जा रहे हैं, यही स्थिति रही तो आने वाले पांच वर्षो में कई शहर सीमेंटेड सिटी की लिस्ट में शामिल हो जाएं, तो आश्चर्य नहीं। सेंटर ऑफ साइंस एंड इन्वायरन्मेंटल डिपार्टमेंट, नई दिल्ली के करेंट आंकड़े के अनुसार वर्ष 1988 में 2500 लोगों पर एक पेड़ था, जो अब 10000 लोगों पर एक हो गया है। भारत में केवल 11.5 प्रतिशत वन रह गये हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत में जब 29 पेड़ कटते हैं, तो एक पेड़ लगाया जाता है। तरुमित्रा के फादर रॉबर्ट कहते हैं कि हमने जब पटना के गायघाट से दानापुर तक सड़क के किनारे लगे पेड़ों की गिनती करवाई, तो पाया कि 20 किमी के अंदर 250 से भी कम पेड़ थे। वहीं, पर्यावरणविद श्वेता आनंद कहती हैं कि जाहिर-सी बात है पेड़ कम होंगे, तो धरती से ऑक्सीजन फ्लोइंग की मात्रा घटेगी। डॉक्टर का मानना है कि ताजी हवा ब्लड प्यूरेशन के लिए बहुत जरूरी है। डॉ. आनंद शंकर कहते हैं कि इसके अभाव में सांस संबंधी बीमारियां तो होती ही हैं, ब्लड क्लॉटिंग, अस्थमा, हार्ट अटैक आदि का भी खतरा बना रहता है।

1 पर 16 के बदले, 40 पर 1

वन विभाग की मानें, तो अभी नई योजनाओं में ग्रीनरी डेवलप करने की स्वीकृत नहीं हुई है। झारखंड के अलग होने से बिहार में मात्र तीन परसेंट फॉरेस्ट ही रह गया है। वन विभाग की ओर से वृक्ष लगाओ अभियान युद्धस्तर पर चल रहा है। कुल चार लाख वृक्ष लगाने के लक्ष्य में अब तक 10 हजार से ऊपर वृक्ष लगाए जा चुके हैं। इसमें सड़कों के किनारे-किनारे पेड़ लगाया जाना है। इस अभियान के तहत अकेले पटना में 10 हजार वृक्ष लगाने की प्लानिंग है, जो लगभग पूरी हो चुकी है. विशेषज्ञ की मानें, तो एक स्वस्थ मनुष्य को ऑक्सीजन के लिए 16 पेड़ की जरूरत होती है, पर भारत में यह आंकड़ा उलटा है। यहां 40 लोग एक पेड़ पर निर्भर हैं। तरुमित्र के फादर रॉबर्ट के अनुसार प्रति वर्ष पेड़ की 10 हजार से अधिक प्रजातियां नष्ट हो रही हैं। [जेएनएन]

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

मीठे नहीं है नुकसानदेह



आधी-अधूरी जानकारी रखना नुकसानदेह हो सकता है। विशेषकर तब जबकि आपको अपने भोजन के बारे में फैसला लेना हो। वस्तुत: मीठे के संदर्भ में लोगों के मध्य कई गलतफहमियां व्याप्त है, जिन्हे दूर करना जरूरी है।




मिथ: वजन घटाने के लिए सभी मीठी खाद्य वस्तुओं से परहेज करना चाहिए!



तथ्य: इस गलत धारणा से अनेक लोग ग्रस्त है। खासकर किशोर-किशोरियां कुछ ज्यादा ही। सच तो यह है कि सामान्यत: वजन तभी बढ़ता है, जब हम विभिन्न खाद्य पदार्थो के जरिए जरूरत से ज्यादा कैलोरीज ग्रहण करते है। जितनी कैलोरीज आपका शरीर जलाता है यानी इस्तेमाल करता है, उससे अधिक कैलोरी ग्रहण करने से आपके वजन के बढ़ने की संभावनाएं बढ़ जाती है। सच तो यह है कि खान-पान की गलत आदतें वजन बढ़ाने में सहायक है, न कि मीठा।



कार्बोहाइड्रेट जैसे अनाज, चीनी व फ्रक्टोज और प्रोटीनयुक्त आहार (दालों और दूध आदि) के प्रत्येक ग्राम में 4 कैलोरीज पायी जाती है। वहीं वसायुक्त आहार के हर एक ग्राम में 9 कैलोरीज उपलब्ध होती हैं। जाहिर है, वसायुक्त आहार में कैलोरीज कहीं ज्यादा पायी जाती है।



बेशक फलों में मीठा(शुगर) होता है किंतु वह शुगर वसा या चर्बी बनकर आपके शरीर में संचित नहीं होती। इसलिए फलों से किनारा करने की जरूरत नहीं। इसके अलावा फलों से आपको फाइबर मिलता है, जो आपके वजन को नियंत्रित करने में सहायक है। इसलिए किसी भी फल को समूचे तौर पर खाएं। जिन फलों के छिलके खाए जा सकते है उन्हे छिलकों समेत खाएं जैसे कि सेब आदि। मीठा खाते समय उसकी मात्रा का ध्यान रखें। इस बात का भी ध्यान रखें कि मीठा किस स्रोत से आपको मिल रहा है। अपने वजन को नियंत्रित रखने के लिए संतुलित-पोषक आहार ग्रहण करे। इसके अलावा व्यायाम भी जरूर करें।



मिथ: अत्यधिक मीठा खाने से मधुमेह होने की संभावना बढ़ जाती है।



तथ्य: इस तरह की धारणा गलत है। वस्तुत: मधुमेह मेटाबॉलिज्म या चयापचय (खाद्य पदार्थो को ऊर्जा व शारीरिक वृद्धि में बदलने की रासायनिक प्रक्रिया) से संबंधित रोग है। यह मर्ज कार्बोहाइड्रेटयुक्त आहार (जिसमें मीठा भी शामिल है) ग्रहण करने से नहीं होता। मधुमेह तब होता है, जब शरीर पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन का उत्पादन नहीं कर पाता या फिर उत्पादित इंसुलिन का समुचित रूप से प्रयोग नहीं कर पाता। मधुमेह के दोनों प्रकारों-टाइप-1 और टाइप-2 में शरीर ब्लड ग्लूकोज (जिसे आमतौर पर ब्लड शुगर कहा जाता है) को ऊर्जा में नहीं बदल पाता। फिर भी यदि कोई व्यक्ति मधुमेह से पीड़ित है, तो उसे अपनी खुराक को ठीक प्रकार से संतुलित करना चाहिए और शुगर या चीनी युक्त खाद्य पदार्थो से डॉक्टर के परामर्श के अनुसार ही परहेज करना चाहिए।



मिथ: मीठे से दांत खराब होते है



तथ्य: सच तो यह है कि मीठा खाने से आपके बच्चे या किसी वयस्क व्यक्ति के दांत खराब नहीं होते। इस बात का ख्याल रखें कि मीठा खाने या फिर भोजन ग्रहण करने के बाद दांतों को ब्रश से जरूर साफ करे। दांतों की समुचित देखभाल से दांतों में विकार उत्पन्न नहीं होते।

डॉ. काजल पंडया







सीनियर न्यूट्रीशनिस्ट






सीताराम भारतीय इंस्टीटयूट, नई दिल्ली

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

अग्नि-5 की चिंता से दुबला हुआ चीन

अग्नि-5 की चिंता से दुबला हुआ चीन

अरुणाचल प्रदेश से लेकर दलाईलामा तक के मामले में भारत के लिए सिरदर्द बन रहा ड्रैगन यानी चीन अब इस चिंता में दुबला हो रहा है कि हम उसके हर कोने तक में मार करने वाली मिसाइलें विकसित कर रहे हैं। देश की मारक क्षमता में कई गुना इजाफा करने वाली बहुप्रतीक्षित अग्नि-5 मिसाइल का परीक्षण 2011 के शुरुआती महीनों में किया जाएगा लेकिन चीन अभी से इस भारतीय ब्राह्रास्त्र से भयाक्रांत है। अग्नि पांच की आंच से पैदा हुई चिंता की लकीरें उसके ललाट पर स्पष्ट देखी जा सकती है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र 'पीपुल्स डेली' ने इस आशय की खबर प्रकाशित की है।

बुधवार को पीपुल्स डेली में 'भारत की नई मिसाइल चीन के हरबिन तक हमले में सक्षम' शीर्षक से प्रकाशित खबर में चीन की चिंता साफ झलक रही है। अखबार के अनुसार आसानी से सड़क माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में सक्षम इस मिसाइल को भारत के उत्तरीपूर्वी इलाके से छोड़ने पर चीन के सबसे उत्तरी छोर हरबिन को भी तबाह किया जा सकता है। अखबार ने भारतीय गांडीव में शामिल होने जा रहे इस अचूक ब्रह्रमास्त्र के बारे में लिखा है कि यह चीन के राष्ट्रीय दिवस पर परेड में शामिल की गई मिसाइल डोंगफेंग-31ए के टक्कर की मिसाइल है।

एडवांस्ड सिस्टम्स लेबोरेटरी हैदराबाद द्वारा विकसित की जा रही लंबी दूरी की अग्नि-5 मिसाइल अपनी कई खूबियों के चलते अनोखी है। इस मिसाइल को आसानी से सड़क के रास्ते ले जाकर देश के किसी भी इलाके में तैनात किया जा सकता है। इस खूबी के चलते पूर्व निर्धारित पांच हजार किमी की इसकी मारक क्षमता बढ़कर सात हजार तक पहुंच जाती है। इसको आसानी से इस तरह समझा जा सकता है। स्वीडन की राजधानी स्टाकहोम को बंगलोर से निशाना नहीं बनाया जा सकता क्योंकि बंगलोर से वहां की दूरी सात हजार किमी है लेकिन जब अग्नि-5 मिसाइल को अमृतसर से दागा जाएगा तो स्वीडन की राजधानी को भी निशाना बनाया जा सकेगा। देश के विभिन्न भागों में इसको तैनात करके कमोबेश पूरी दुनिया अग्नि पांच की जद में हो जाएगी। केवल उत्तरी और दक्षिण अमेरिका को छोड़ दें तो अब वह दिन दूर नहीं जब दुनिया का हर कोना हमारी अग्नि-5 के निशाने पर होगा।


अग्नि-5 मिसाइल: एक नजर


श्रेणी-अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम)


इंजन: तीन चरणों वाला ठोस ईंधन


मारक क्षमता- 5000 किमी


प्रक्षेपण- 2011 के शुरुआत में


खूबी:


-दुनिया का कोना-कोना निशाने पर (उ.और द.अमेरिका छोड़कर)


-आसानी से सड़क द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर तैनाती


-देश की पहली कैनिस्टर्ड मिसाइल


-3 से 10 परमाणु अस्त्रों को ले जाने की क्षमता


- प्रत्येक अस्त्र से अलग-अलग निशाने तय किए जा सकने की खूबी


-एंटी बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम भेदने की क्षमता

बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

भोजन व शिक्षा के मोहताज बच्चे

तरक्की के तमाम दावों और दुनिया की उम्मीदों का केंद्र बनने के बावजूद भारत में नवजात शिशुओं और बच्चों की कुपोषण से मौत के आकड़े उसका सिर शर्म से नीचा कर रहे है।


अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसी 'सेव द चिल्ड्रन' के सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में हर साल पैदा होने वाले बच्चों में से आधे शिशुओं की पैदा होते ही मृत्यु हो जाती है। इस सर्वेक्षण पर भरोसा करें तो आठ से दस प्रतिशत सालाना स्थिर आर्थिक वृद्धि का सपना देख रहे भारत में 20 लाख बच्चे तो हर साल अपना पाचवा जन्मदिन मनाने से पहले ही भूख से होने वाले कुपोषण और उसके कारण लगने वाली बीमारियों से दम तोड़ देते हैं।

दुनिया में कुपोषण का शिकार हर तीसरा बच्चा भारत में रहता है और हर पंद्रहवें सेकेंड में एक बच्चा मौत की नींद सो जाता है।

शिक्षा के लिहाज से तो इन नन्हे बच्चों की और दुर्गति है। गावों में पढ़ने को स्कूल नहीं हैं और जहा स्कूल हैं, वहा कहीं इमारत नदारद है तो कहीं शिक्षकों का अता-पता नहीं है। गनीमत है कि इस मामले में भारत न तो अकेला है और न ही अग्रणी देशों में है। दुनिया के जिन 75 लाख बच्चों को प्राथमिक शिक्षा मयस्सर नहीं है, उनमें उस अमेरिका के बच्चे भी
शामिल हैं, जिसे तीसरी दुनिया के देश, विकास की मिसाल मानते हैं और उसके नक्श-ए-कदम पर चलने को आतुर रहते हैं।

अमेरिका में ढाई लाख बच्चे प्राथमिक शिक्षा के बाद पढ़ाई पूरी नहीं करते। यह खुलासा भी 'सेव द चिल्ड्रन' की माताओं की भूमिका पर जारी एक और रिपोर्ट में हुआ है। इसके अनुसार, दुनिया में ऐसे बेहिसाब बच्चे हैं, जो या तो समय से पहले स्कूल छोड़ देते हैं या उन्हें पढ़ने का मौका ही नहीं मिल पाता।

संगठन का मानना है कि बच्चों के ये बुनियादी वर्ष किसी भी देश में खुशहाली लाने का जरिया बन सकते हैं और यह तभी हो सकता है, जब बच्चों को मुकम्मल परवरिश, स्वस्थ पारिवारिक जीवन और सेहतमंद मा मिले।

दरअसल, बच्चे का छुटपन विशेषरूप से पहले पाच साल सबसे अहम होते हैं। यही वह समय है, जिसमें उसमें जीवन में विकास के बीज पड़ते हैं। वह इस दौरान जो सीखता-समझता है, उसी पर उसके जीवन की बुनियाद टिकी होती है। लिहाजा, यदि इस दौरान बच्चों को अच्छा जीवन न मिले, उनकी सही देखभाल न हो और पढ़ाई का मौका न मिले तो वह ताजिंदगी इसका खामियाजा उठाता रहता है।

'सेव द चिल्ड्रन' बच्चों को उम्र के पाचवे साल तक भरपूर पोषण, सुरक्षित जीवन और पढ़ाई इत्यदि के मौके दिलाने की दिशा में प्रयासरत है। इस संगठन ने दुनिया के 100 विकासशील देशों और अमेरिका के पाच राज्यों में बच्चों की स्थिति पर एक मार्गदर्शिका तैयार की है।

इसमें यह बताया गया है कि संबद्ध देश और राच्य अपने नौनिहालों को स्कूल में सफलता के लिए कैसे तैयार करते हैं। इसके विश्लेषण के लिए इन देशों के आर्थिक आकड़ों की भी जाच की गई है।

बच्चों के विकास के लिए चल रहे प्रयास और आर्थिक आकड़ों के विश्लेषण के बाद निकले नतीजों से यह पहचाना जा सकता है कि जिन देशों ने बच्चों के लिए निवेश किए, उन्हें मौके दिए, उन देशों में बच्चों की विकास की प्रवृत्ति दिखने लगी है।

रिपोर्ट में उन सभी उपकरणों और संसाधनों का भी जिक्र है, जो किसी बच्चे को स्वस्थ, सुरक्षित और शिक्षा के लिए जरूरी माहौल सुनिश्चित करते हैं। इसके साथ यह भी बताया गया है कि जिन लोगों को इनकी सबसे ज्यादा जरूरत है, उन तक वह पहुंच नहीं पाते।

किसी भी देश में बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा और स्कूल में उनकी सफलता में देश का कल्याण निहित है। दुनिया की आर्थिक खुशहाली का राज भी इन नौनिहालों की खुशी में छुपा है। यह एक मनोवैज्ञानिक सच्चाई तो है ही, लेकिन पूरी दुनिया में इस पर जो शोध हुए हैं, उससे भी यह साबित हो गया है कि कोई भी बच्चा स्कूल में तभी सफल होता है, जब उसे सीखने के लिए बढि़या माहौल मिले।

दुनिया में समाज की आमदनी बढ़ाने और लागत घटाने का भी यह सबसे अहम नुस्खा है। माना कि अमेरिका एक अमीर कद्दावर देश है, फिर भी वहा के बच्चे स्कूलों में बहुत अच्छा नहीं कर रहे हैं। इसकी वजह यही बताई जा रही है कि इन बच्चों को जरूरी पारिवारिक सुरक्षा नहीं मिल रही है।

मैक्सिको, नेवादा, मिसीसिपी, एरीजोना और अलबामा यह पाच अमेरिकी राच्य बच्चों की पढ़ाई में कम दिलचस्पी के गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। यहा बच्चों के विकास में अड़चन का सबसे अहम कारण अभिभावकों की भागीदारी का न होना है। उनके घर का माहौल पढ़ाई-लिखाई के माकूल नहीं है।

अमेरिका में पढ़ाई में गिरावट 1999 के आसपास आनी शुरू हुई। 1995 तक यह देश बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में अग्रणी था। वर्ष 2000 में स्थिति बिगड़नी शुरू हुई और यह आठवें पायदान पर पहुंच गया। 2006 में यह घटकर 14वें क्रम में आ गया। वहा कालेज छोड़ने वाले बच्चों की संख्या अचानक बढ़ने लगी है।

फिलहाल दुनिया के 24 औद्योगिक देशों के बीच शिक्षा के मामले में अमेरिका 18वें पायदान पर है। वहा के 53 फीसदी नौजवान बीच में ही कालेज की पढ़ाई छोड़ रहे हैं।


दरअसल, विकासशील देशों में पाच वर्ष तक के 40 फीसदी बच्चे बेहद गरीबी में जी रहे हैं। उनकी सेहत का खयाल रखने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। उन्हें भरपेट पौष्टिक भोजन भी नहीं मिल रहा है। यही वजह है कि उनकी क्षमता पूरी तरह पल्लवित नहीं हो रही है, न ही देश के विकास में उनकी भागीदारी का उपयोग हो रहा है। सेव द चिल्ड्रन के अनुसार, किसी देश के खुशहाल भविष्य की यह अहम शर्त है।

चार्ड, बुरूंडी, अफगानिस्तान, गीनिया, बिसाऊ और माली दुनिया के ऐसे देश हैं, जहा बच्चों को ठीक-ठाक प्राथमिक शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है। बुरूंडी में पाच वर्ष तक की उम्र के 25 फीसदी बच्चे स्कूल नहीं जाते। माली में 37 फीसदी और चार्ड में 40 फीसदी बच्चों को स्कूल का मुंह देखना नसीब नहीं हो पाता और गीनिया बिसाउ में 55 फीसदी बच्चे नहीं जानते कि पढ़ाई क्या होती है। इसकी वजह इन देशों के गरीबी है। यहा ऐसी सार्वजनिक सेवाओं का गंभीर अभाव है, जो इन बच्चों की सेहत का खयाल रख सके। समस्याओं और संघर्ष से जूझ रहे इन देशों के माहौल ने इन बच्चों को अपनी चपेट में ले लिया है और इसका असर इनके जीवन पर तो पड़ ही रहा है, इससे देश का भविष्य भी चौपट होता लग रहा है।

उधर क्यूबा, आर्मीनिया, साइप्रस, चिली और अजरबैजान ये पाच देश अपने बच्चों को बेहतर माहौल देने के लिए जाने जाते हैं। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और पारिवारिक जीवन की बदौलत यहा के बच्चे स्कूलों में बढि़या पढ़ाई कर रहे हैं। 'सेव द चिल्ड्रन' ने अपनी रिपोर्ट में बच्चों के विकास में मा की अहम भूमिका का भी जिक्र किया है।

उसका मानना है कि भविष्य में मानवता की रक्षा का सूत्र मा के हाथ में है। मा ही बच्चे की पहली शिक्षक है, जो उसे स्कूल से लेकर समाज और देश तक में अपने अस्तित्व के लिए तैयार करती है। वह उसके पहले पाच साल में उसके व्यक्तित्व में उन सारे गुणों का समावेश करती है, जो दुनिया में उसके जीवन और संघर्ष इत्यदि से जूझने के लिए जरूरी है, लेकिन सफलता का यह सूत्र अकेले ही बच्चों को आगे नहीं बढ़ा सकता। इसके लिए किसी भी देश में राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूरी है।

राजनीतिक इच्छाशक्तिके इस नुस्खे में मा-बच्चे की सेहत सबसे अहम पहलू है। इसकी शुरुआत गर्भ धारण के साथ ही हो जानी चाहिए। गर्भवती स्त्री को जब तक उसके स्वास्थ्य, पोषण और सुरक्षा की गारटी न मिले, वह स्वस्थ संतान को कैसे जन्म दे पाएगी। लिहाजा, उसके लिए सभी तरह के संक्रमण से बचाव का इंतजाम बहुत जरूरी है। गर्भावस्था के दौरान उसकी कठिनाइयों की भरपूर निगरानी हो और बच्चे को जन्म देने के पहले और उसके बाद जच्चा-बच्चा का ख्याल तो जरूरी है ही। बच्चों की सेहत का ख्याल पूरे घर को रखना है। लिहाजा, घर के सदस्यों को बच्चों से जुड़ी छोटी-मोटी बातों का भी पता है, यह सुनिश्चित करना राजनीतिक इच्छाशक्ति का ही हिस्सा है।

विकासशील और औद्योगिक देशों में ऐसे बेहिसाब कार्यक्रम हैं, जो बच्चों के चौतरफा विकास के लिए जरूरी बातों का प्रशिक्षण देते हैं। वे बच्चों की देखभाल के साथ ही उन्हें बच्चों से कुकर्म और उनकी उपेक्षा जैसी बातों का मर्म बताते हैं। इन देशों में एड्स, सुनामी जैसी प्राकृतिक विपदाओं और श्रीलंका, अफगानिस्तान जैसे संघर्ष से जूझ रहे देश के बच्चों के लिए विशेष कार्यक्त्रम हैं। अमेरिका भी 'सबके लिए शिक्षा' नाम से कार्यक्रम चलाता है।

कल्याणकारी कार्यक्रमों से बच्चों की शिक्षा निश्चित तौर पर प्रभावित होती है। दिल्ली में चल रहे एक कार्यक्रम की बदौलत संबद्ध इलाके के बच्चे पढ़ाई की तरफ प्रवृत्त हुए हैं। इन इलाकों में लड़कियों की पढ़ाई में 7.7 और लड़कों की पढ़ाई में 3.2 का इजाफा हुआ है। इसी तरह स्कूल में आगे पढ़ने वाले छात्र भी बढ़े हैं। हमारे पड़ोसी देशों में श्रीलंका को छोड़कर बाकी देशों में प्राथमिक शिक्षा का दृश्य बहुत बढि़या नहीं है। भूटान में 20 फीसदी बच्चे प्राथमिक शिक्षा नहीं लेते हैं। नेपाल में 24 फीसदी और पाकिस्तान में 34 फीसदी बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। श्रीलंका में प्राथमिक शिक्षा लेने वाले बच्चों की तादाद 90 फीसदी है। वहा सिर्फ तीन फीसदी बच्चे स्कूल नहीं जाते और एक फीसदी बच्चों के फेल होने यानी एक ही कक्षा में दोबारा पढ़ने की नौबत आती है। वहा 93 फीसदी बच्चे पाचवीं तक की पढ़ाई पूरी कर लेते हैं।

'सेव द चिल्ड्रन' की पहलकदमी से कुछ देशों ने शिक्षा में परिवार और माहौल की भागीदारी के महत्व को समझ लिया है। संगठन की छत्रछाया में पूरी दुनिया में बच्चों और उससे जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हो रही है और उसी हिसाब से शिक्षा के अवसर देने के लिए प्रयत्न चल रहे हैं। बच्चों के विकास में मा की भूमिका को रेखाकित किया जा रहा है। लिहाजा माताओं की शिक्षा और उनके स्वास्थ्य के लिए भी इंतजाम हो रहे हैं। भारत में नन्हें बच्चों की प्राथमिक शिक्षा और उसके इर्द-गिर्द के प्रयासों पर 'सेव द चिल्ड्रन' कार्यक्रम में कोई खास जिक्र नहीं मिलता, पर बिहार में कोसी के कहर के बाद बेघर हुए बच्चों के लिए उसके शिक्षा के जो प्रयास चल रहे हैं, उनकी भी अनदेखी नहीं हो सकती। बहरहाल, बच्चों के बचाव और विकास की बुनियाद पर देश के सामाजिक, आर्थिक विकास का सपना बुनने वाली यह संस्था अपने प्रयासों में असर दिखाने लगी है।

पर पता नहीं उसे मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के स्कूलों की खबर है या नहीं। इतंजार बस यही है कि दुनिया का हर बच्चा कब भरपेट भोजन और भरपूर पढ़ाई कर पाएगा?

इन पर करो अमल, देखो फिर असर

अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसी 'सेव द चिल्ड्रन' के एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष पांच साल से कम उम्र के लगभग बीस लाख बच्चों की मौत होती है। यह संख्या दुनिया के किसी भी देश के मुकाबले अधिक है। पाच वर्ष से कम आयु में मृत्यु
की दर को 2010 से 2015 के बीच आधा करने के लिए सेव द चिल्ड्रन मिलेनियम डेवलपमेंट गोल-4 लेकर आई है। इसके तहत संस्था ने एक सात-सूत्रीय कार्यक्त्रम पेश किया है और विशेष रूप से भारत का ध्यान इन सात क्षेत्रों की ओर आकर्षित किया है।

भारत से कहा गया है कि वह विश्वसनीय राष्ट्रीय योजना लागू करे। इसके तहत भारत 2011 तक मां, नवजात शिशु और शिशु बचाव संबंधी विशेष योजना पर अमल शुरू कर देगा, जिस पर स्वास्थ्य और परिवार कल्याण, महिला और शिशु उत्थान, जल और शौच, नागरिक विकास मंत्रालय और नरेगा काम करेगा-

नवजात शिशु पर फोकस:

पचास प्रतिशत नवजात शिशु पहले महीने के अंदर ही मौत के शिकार हो जाते हैं। इसके लिए उनके जीवित रहने के उपायों पर विशेष जोर दिए जाने की सलाह दी गई है। चूंकि भारत में दो तिहाई प्रसव घरों में होते हैं, इसलिए नवजात शिशु की जरूरी देखभाल घर के साथ-साथ अस्पताल और स्वास्थ केंद्रों में उपलब्ध कराई जाए।

नवजात की देख रेख:

इसे प्राथमिकता दी जाए। इसमें मां, नवजात बच्चे के स्वास्थ, पोषण और अन्य संबंधित चीजों के बीच की दूरी को कम किया जाना शामिल है। इसके अलावा अमीर और गरीब विशेषरूप से अधिकारहीन वर्ग के बच्चों की मृत्यु दर के बीच की दूरी को कम करना भी शामिल है। अतिरिक्त संसाधन जुटाना: भारत को चाहिए कि 2015 तक स्वास्थ पर खर्च की जाने वाली जीडीपी की एक प्रतिशत रकम को बढ़ा कर पाच प्रतिशत करे, जो अंतरराष्ट्रीय औसत है। बच्चे के स्वास्थ्य, पोषण, पीने के पानी, स्वास्थ, विद्या, आजीविका और खाद्य सुरक्षा स्कीमों पर ख़र्च की जाने वीली रकम को दोगुना करे।

स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों को प्रशिक्षण-अतिरिक्त दिए गए पैसों में से कुछ हिस्सा हेल्थकेयर कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षण, उन्हें सामान देने और तैनात करने में खर्च किया जाए। भारत में प्रशिक्षित और उपकणों से लैस हेल्थकेयर कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि का लक्ष्य बनाया जाए। विशेष तौर पर सबसे ज्यादा गरीब और अधिकारहीन वर्गो की जरूरतों को पूरा करने के लिए।

कुपोषण पर काबू करें:

पोषण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पुष्टिकर अनुपूरक, विशेष स्तनपान कराने, पूरक खुराक और खाद्य किलाबंदी के साथ-साथ प्रमाणित बचाव के उपायों को अपनाया जाए। इसके अलावा कैश ट्रांसफर और सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों को सहायता प्रदान की जानी चाहिए।

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

बिहार के होनहारों की आसमान छूने की चाहत


from danik jagran
अपने यहां एक कहावत बहुत मशहूर है, 'नौकरी करो सरकारी, नहीं तो बेचो तरकारी'। आपने भी सुना ही होगा। हम तरकारी और मोमोज 'बेचने' वाले दो ऐसे ग्रुप का जिक्र कर रहे हैं, जो गांव-देहात के आम किसान नहीं हैं, बल्कि इंटरनेशनल फेम इंस्टीट्यूट से एमबीए क्वालिफाइड टैलेंटेड होनहार हैं। मोटी तनख्वाह वाली नौकरी को ठेंगा दिखाकर इनलोगों ने वह काम शुरू किया, जिसे अब गांव के लोग भी करना नहीं चाहते। हिम्मत, विश्वास, पेशेंस, प्लानिंग और बिजनेस की हाइटेक टेक्निक के साथ बिहार के इन होनहारों ने सब्जी और चाइनीज फास्टफूड मोमोज का कारोबार शुरू किया। इस सफर में इन्हें कुछ परेशानियों को भी फेस करना पड़ा, पर जब दिल में आसमान छूने की तमन्ना जगी हो, तो इनके बढ़ते कदमों को कोई रोक नहीं सकता।

इस हाइटेक और कांपटीशन के दौर में एक ओर जहां लोग अपना पुश्तैनी काम करने को सोचने से भी कतराते हैं, वहीं कुछ वैसे भी हैं, जो अट्रैक्टिव पैकेज वाली नौकरी को ठुकराकर अपना बिजनेस बड़े शान से चलाते हैं। इसीलिए कहते हैं कि बिहार के टैलेंडेंट की कमी नहीं है। ये किसी भी फील्ड में जाएं, अपना लोहा मनवाने से पीछे नहीं हटते। हम जिन शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं, उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद से एमबीए पूरा करने के बाद अट्रैक्टिव सैलरी को ठुकराकर कुछ डिफरेंट करने की सोची। कौशलेंद्र और ओमप्रकाश ने एमबीए के दौरान ही यह डिसाइड कर लिया था कि इन्हें प्लेसमेंट में पार्टिसिपेट नहीं करना है।


2010 तक 100 करोड़ का टारगेट

कौशलेंद्र व ओमप्रकाश ने बताया कि हमारी तमन्ना सब्जियों को भी ब्रांड बनाने की है। जैसे डेयरी प्रॉडक्ट के रूप में 'सुधा' एक ब्रांड बन कर उभरा है, उसी तरह से वेजिटेबल्स में भी 'समृद्धि' एक ब्रांड बन कर उभरेगा। उन्होंने बताया कि कौशल्या फाउंडेशन के चेन खुलेंगे और केवल बिहार ही नहीं, यूपी और छत्तीसगढ़ में भी इसका विस्तार होगा। 2010 तक कंपनी का टर्नओवर 100 करोड़ पहुंचाने का टारगेट रखा है। उन्होंने बताया कि पिछले फाइनेंशियल इयर में कंपनी का टर्नओवर 89 लाख था तथा इस साल छह महीने में ही कंपनी का टर्नओवर डेढ़ करोड़ तक पहुंच गया है।

प्राइस कंट्रोल का है फंडा

छोटे किसानों की यह शिकायत होती है कि उनके प्रॉडक्ट का प्राइस एकाएक डाऊन हो जाता है। वजह होती है, एक साथ बड़ी मात्रा में प्रोडक्शन और उसके प्रिजर्व करने का इंतजाम न होना। इसके लिए कौशलेंद्र व ओमप्रकाश 'पॉलिहाऊस' प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। इस टेक्निक के जरिए किसी भी वेजिटेबल्स के प्रोडक्शन के टाइम को इस तरह मैनेज किया जाना संभव हो सकेगा कि उस समय में बड़ी मात्रा में इसका उत्पादन न हो। ओमप्रकाश ने इस बारे में बताया कि इस साल के अंत तक पांच पॉली हाऊस शुरू हो जाएंगे। एक पॉली हाऊस से पांच सौ किसानों को लाभ मिलेगा।

..और कारवां बनता गया

चूंकि कौशलेंद्र का फैमिली बैकग्राउंड फार्मिग रहा है। इसके लिए उन्होंने हर लेवल पर तैयारी की थी। जूनागढ़ इंजीनियरिंग कॉलेज से एग्रीकल्चर में बी टेक की पढ़ाई पूरी की और इसके बाद रही-सही कसर आईआईएम, अहमदाबाद से पूरी की। एमबीए की पढ़ाई पूरी होने के क्रम में बिहारी टैलेंट की एक जमात बन गई थी। सो पहले कौशलेंद्र ने बिहार से उपजने वाले वेजिटेबल को एक ब्रांड देने की सोची। इसमें इनका साथ दिया आईआईएम से ही पास ओम प्रकाश सिंह ने। उधर, एनएमआईएमएस, मुंबई से एमबीए कर चुके अनुज, एमएससी कर चुके धीरेंद्र एवं ग्रेजुएट हरेंद्र कुमार पटेल भी कौशल्या फाउंडेशन से जुड़ गए.

डेढ़ लाख से शुरू किया कारोबार

अपने स्कॉलरशिप की राशि और कुछ अन्य अवार्ड के तहत मिली राशि को कलेक्ट कर कौशलेंद्र और ओमप्रकाश ने इस कारोबार की नींव रखी। ब्रांड नेम रखा 'समृद्धि' और मदर एजेंसी के रूप में 'कौशल्या फाउंडेशन' को रजिस्टर्ड करवाया। लगभग 50 हजार रुपए की लागत से एक रेफ्रिजरेटेड वान बनवाया, जिसमें रखकर वेजिटेबल्स बाजार तक पहुंचाए जा सकते थे। ओमप्रकाश ने बताया कि पहले दिन का सेल था छह रुपए। हालांकि महीने के अंत तक यह राशि पांच सौ रुपए तक पहुंच गई. इसी महीने यह राशि करीब हजार रुपए तक जा पहुंची है। ओमप्रकाश का कहना है कि आज हर दिन करीब सत्तर हजार रुपए का करोबार हो रहा है। हर महीने स्टाफ्स पर 1.25 लाख रुपए खर्च हो रहे हैं। 25 लोगों को तो नौकरी मिली है और सत्तर लोग सीधे इससे जुड़े हैं। इनके अलावा पांच हजार किसानों को अपने प्रॉडक्ट को सीधे बेचने में सुविधा हो रही है।


आसमान छूने की चाहत

कहते हैं कि लीक से हटकर तीन लोग ही चलते हैं-शायर, शेर या फिर सपूत। कुछ लोग इसे सनक भी कहते हैं, क्योंकि जब जेब में पर मंथ 20-25 हजार रुपए आसानी से आ सकते हैं, वैसी स्थिति में लोग फांकाकशी की राह क्यों चलें? लेकिन इसीलिए तो ये दुनिया अजीब है और ह्यूमन नेचर के कारण कभी-कभी आदमी को रिस्क कवर करने में बड़ा मजा आता है। हां, इस रिस्क में कभी फायदा, तो कभी नुकसान होता है, लेकिन 'नो रिस्क, नो गेन' के फार्मूले पर चलने वालों के लिए लाइफ के मायने कुछ अलग होते हैं। ऐसी ही राहों पर निकल पड़े हैं बिहार के तीन यूथ-अमित सिन्हा, सुमन कुमार और उदय वत्स। तीनों का लक्ष्य एक ही है, बस नाम कमाना और अपने स्टेट के डेपलपमेंट के लिए काम करना।

एमबीए कर शुरू की इंटरप्रेन्योरशिप

अमित, सुमन और उदय तीनों ने केआर मंगलम इंस्टीच्यूट, दिल्ली से मास्टर्स इन बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई कंप्लीट की। कोर्स के दौरान तीनों को ही जॉब के ऑफर्स मिले, लेकिन टीचर्स के मोटिवेशन और कुछ अलग करने की चाह ने इन्हें वापस पटना ला दिया। यहां आकर तीनों ने खुद मार्केट सर्वे किया और चाइनीज फूड आइटम 'मोमोज' को लेकर एक बिजनेस प्लान बनाया। हालांकि इस प्लानिंग को ना फैमिली ने सपोर्ट किया और ना ही इनके कई फ्रेंड्स ने। लेकिन तीनों ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी और आज शहर के छह अच्छी लोकेशंस पर इनकी ट्रॉलियां लगती हैं, जहां पटनाइट्स मोमोज का लुत्फ शौक से उठाते हैं।

ओपनिंग विथ मिक्स वेज मोमोज

अभी तक आपने जहां भी मोमोज खाए होंगे, सिर्फ दो ही वेराइटीज मिली होगी-वेज मोमो और चिकेन मोमो। लेकिन इस हाइटेक ग्रुप ने 'यमी मोमोज' के नाम से जो चेन शुरू किया है, उसमें एक नई वेराइटी को इंट्रोड्यूस किया है। यह नई वेराइटी है 'मिक्स वेज मोमोज'। यह एक कंप्लीट न्यू वेराइटी है और यमी मोमोज के अलावा यह आपको कहीं और नहीं मिलेगी।

25 लोगों को मिला रोजगार

'मोमोज चेन' करने के पीछे मकसद के बारे में उदय बताते हैं कि कुछ ही दिनों पहले तक जॉब मिलना कोई मुश्किल बात नहीं थी, लेकिन एक बार रिसेशन आया और हाइली क्वालिफाइड और एक्सपीरिएंस्ड लोगों को भी अपनी जॉब से हाथ धोना पड़ा। ऐसे में क्यों ना हम कुछ ऐसा करें कि हमारे साथ कुछ और लोगों को इंप्लॉयमेंट मिले। वहीं सुमन ने बताया कि अगर हम कोई जॉब करते, तो अपनी फैमिली के लिए काम करते, लेकिन इस चेन के खुलने से अभी कुल 25 लोगों को रोजगार मिल पाया है। हालांकि अभी यह इनिशियल स्टेज है, आगे बहुत कुछ करना बाकी है।

पॉकेट मनी से की शुरुआत

अमित बताते हैं कि इस चेन को शुरू करने के लिए हमारे पास सबसे बड़ी प्रॉब्लम थी इंवेस्टमेंट की। हमारे पास प्लान था और हमारे प्रोजेक्ट गाइड अश्रि्वन भाटिया का विश्वास। उन्होंने हमें बहुत सपोर्ट किया और हर हाल में इस प्रोजेक्ट को शुरू करने को कहा। उनकी उम्मीद के साथ हमने अपनी पॉकेट मनी के साथ छह महीने पहले इस प्रोजेक्ट की शुरुआत की और मौर्या कांप्लेक्स, बोरिंग रोड, गांधी मैदान, खेतान मार्केट, एनआईटी और एक इंस्टीच्युट की कैंटीन में अपने काउंटर्स खोले।

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

डेढ़ करोड़ साल पहले गर्म था अंटार्कटिका


अंटार्कटिका यानी दूर-दूर तक फैली बर्फ और हाड़ कंपाती ठंड। दुनिया के सात महाद्वीपों में शुमार अंटार्कटिका हमेशा से ऐसा नहीं था। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि करीब एक करोड़ 57 लाख साल पहले अंटार्कटिका में गर्म हवाएं चला करती थीं। तब वहां वनस्पति व शैवाल [एल्गी] भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते थे।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज जलवायु परिवर्तन को समझने में बेहद मददगार साबित हो सकती है। एलएसयू म्यूजियम आफ नेचुरल साइंस के नेतृत्व में गठित एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने जीवाश्मों के अध्ययन में पाया कि अंटार्कटिका में कुछ हजार साल पहले ही गरम वातावरण खत्म हुआ था। वैज्ञानिकों ने सूक्ष्म जीवाश्मों के लिए 1107 मीटर अवसाद का अध्ययन किया जिसमें उन्हें दो मीटर मोटी परत में काफी मात्रा में जीवाश्म मिले।

वैज्ञानिकों की राय में, 'यह बेहद असाधारण है क्योंकि अंटार्कटिक में जमी बर्फ का निर्माण करीब तीन करोड़ 50 लाख साल पहले हुआ था। अत्यधिक कम तापमान में किसी भी वनस्पति व शैवाल का पैदा होना काफी मुश्किल है। प्रमुख शोधकर्ता सोफी वार्नी ने बताया कि नए नमूनों के अध्ययन से चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। अंटार्कटिका में डाइनोफ्लागेट सिस्ट [समुद्री या ताजे पानी में पाई जाने वाली वनस्पति] की मौजूदगी में 2000 गुना, शैवाल में पांच गुना और परागकणों में 80 गुना वृद्धि देखी गई। यह सब उस समय था जब अंटार्कटिका अपेक्षाकृत गर्म था। इस नए शोध से हमें जलवायु परिवर्तन को समझने में मदद मिलेगी।' परागकण, बीजाणु व डाइनोफ्लागेट्स सिस्ट जैसे अत्यंत छोटे कणों की मौजूदगी इस बात की पुष्टि करते हैं कि डेढ़ करोड़ साल पहले थोड़े समय के लिए ही सही लेकिन अंटार्कटिका में गर्म वातावरण रहा होगा।

वार्नी के मुताबिक 'शोध में मिले माइक्रोफासिल से हमें यह जानने में मदद मिलेगी कि उस समय अंटार्कटिका में वास्तव में कैसा वातावरण था और उस दौरान वहां क्या हुआ।

गर्म पानी का गाँव

जेठ की तपती दोपहरी हो या भादों की फुहार या फिर पूस की कड़ाके की सर्दी। गया जिले के मोहड़ा प्रखंड के मोहड़ा गांव के लोग वर्षो से ताजा पानी पीनेको संघर्ष कर रहे है। गांव के चापाकल और कुंओं से गर्म पानी ही निकलता है। तुरंत निकले पानी से तो हाथ तक जल जाता है।

तीन तरफ पहाड़ी और एक तरफ जंगल से घिरा है मोहड़ा गांव। गांव में 20 से 30 फीट नीचे पानी मिल जाता है। लेकिन ऐसा कि घंटों रखने के बाद ही पीने लायक हो पाता है। वैसे पानी का गहरा स्रोत ठंडा है, ऐसा इंडिया मार्का हैंडपंप और जेट पंप की बोरिंग कराने वाले कहते हैं। गांव के खेतों में बोरिंग का पानी ठंडा निकलता है।

यह गांव 30 घरों का है जहां तीन सरकारी चापाकल हैं, पर सभी तीस फुट केअ पानी पर लगे हैं। जिससे गर्म पानी ही देते हैं। गांव में 10 कुएं है। सभी घरों में निजी चापाकल भी हैं, पर भारी-भरकम खर्च के चलते लोगों ने गहरी बोरिंग नहीं कराई है। ऐसे में हर घरों में बड़ा-बड़ा घड़ा, नाद और ड्रम में पानी सुबह और शाम में स्टोर कर रखा जाता है। जोरों की प्यास लगती है तो पानी को ठंडा करने को पंखा से हवा देना पड़ता है।

मोहड़ा गांव के शिव शंकर यादव, गोपाल यादव, रामचन्द्र यादव बताते है कि नहाने, कपडे़ धोने और जानवरों को पानी पिलाने को भी ठंडा करने को पानी पहले से जमा करना पड़ता है। समस्या तब होती है जब गांव में किसी की बेटी की शादी होती है। जहां बेटी की शादी करते हैं, डर से नहीं बताते है कि पीने के पानी की समस्या है। ड्रम में पानी पहले से भरकर पूरे गांव के लोग इस समस्या को मिलकर बारात के दिन निपटाते है।

ग्रामीण कहते हैं कि जमीन के नीचे गंधक की चट्टान पर पूरा गांव बसा है। जिस कारण पूरे गांव में गर्म पानी निकलता है। हालांकि भूगर्भ शास्त्रियों की नजर में यह गांव आज तक नहीं आ सका है। मगध विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष व भूगोलवेता प्रो. राणा प्रताप सिंह बताते हैं कि राजगीर, तपोवन और जेठियन का क्षेत्र सल्फर जोन में आता है। कहीं-कहीं यूरेनियम के भी भंडार संभव हैं। ऐसे में जहां अधिक मात्रा सल्फर की है। वहां गर्म पानी निकलता है।

बुधवार, 30 सितंबर 2009

शाकाहार की महिमा


शाकाहार मांस न खाने को कहा गया है। सनातन धर्म में शाकाहारी होना अनिवार्य नहीं, पर यह प्रबुद्ध व्यक्ति, वेदव्यास, भीष्म, आदि शंकराचार्य, पतञ्जलि (योगसूत्र), वल्लभाचार्य, स्वामिनारायण, महात्मा गांधी और बहुत-से स्वामी के आचरण से जोडा जाता है। अहिंसा और करुणा शाकाहार का तत्त्व हैं। अहिंसा को परम धर्म माना जाता है (अहिंसा पर्मो धर्म:)| भारतीय संस्कृति में हमेशा से शाकाहार की महिमा पर जोर दिया गया है, लेकिन वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के कई अध्ययनों के बाद शाकाहार का डंका अब विश्व भर में बजने लगा है। शरीर पर शाकाहार के सकारात्मक परिणामों को देखते हुए दुनियाभर में लोगों ने अब मांसाहार से किनारा करना शुरू कर दिया है।

विश्वभर के शाकाहारियों को एक स्थान पर लाने और खुरपका-मुंहपका तथा मैडकाऊ जैसे रोगों से लोगों को बचाने के लिए उत्तरी अमेरिका के कुछ लोगों ने 70 के दशक में नॉर्थ अमेरिकन वेजिटेरियन सोसाइटी का गठन किया। सोसाइटी ने 1977 से अमेरिका में विश्व शाकाहार दिवस मनाने की शुरुआत की। सोसाइटी मुख्य तौर पर शाकाहारी जीवन के सकारात्मक पहलुओं को दुनिया के सामने लाती है। इसके लिए सोसाइटी ने शाकाहार से जुड़े कई अध्ययन भी कराए हैं।


दिलचस्प बात यह है कि सोसाइटी के इस अभियान के शुरू होने के बाद से अकेले अमेरिका में लगभग 10 लाख से ज्यादा लोगों ने मांसाहार को पूरी तरह त्याग दिया है। विश्व शाकाहार दिवस के अवसर पर आहार विशेषज्ञ डा. अमिता सिंह ने बताया कि हाल के एक शोध के मुताबिक शाकाहारी भोजन में रेशे बहुतायत में पाए जाते हैं और इसमें विटामिन तथा लवणों की मात्रा भी अपेक्षाकृत ज्यादा होती है।

डा. अमिता ने बताया कि ऐसे भोजन में पानी की मात्रा ज्यादा होती है, जिससे मोटापा कम होता है। मांसाहार की तुलना में शाकाहारी भोजन में संतृप्त वसा और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होती है, जिससे यह हृदय रोगों की आशंका कम करता है।

आहार विशेषज्ञ डा. अंजुम कौसर ने बताया कि अनाज, फली, फल और सब्जियों में रेशे और एंटीऑक्सीडेंट ज्यादा होते हैं, जो कैंसर को दूर रखने में सहायक होते हैं। डा. कौसर ने बताया कि उनके पास कई ऐसे मरीज आए, जिन्होंने मांसाहार त्यागने के बाद अपने स्वास्थ्य में कई सकारात्मक परिवर्तन देखे।


फिजीशियन डा. केदार नाथ शर्मा ने बताया कि बहुत से लोग गोश्त को अच्छे स्वाद के नाम पर तेज मसाला डाल कर देर तक पकाते हैं। इस प्रक्रिया से पका गोश्त खाने पर कार्डियोवेस्कुलर सिस्टम को बहुत नुकसान पहुंचता है। यह भोजन रक्तचाप बढ़ाने के साथ रक्तवाहिनियों में जम जाता है, जो आगे चल कर दिल की बीमारियों को न्यौता देता है।

पिछले दिनों अमेरिका के एक अंतरराष्ट्रीय शोध दल ने इस बात को प्रमाणित किया कि मांसाहार का असर व्यक्ति की मनोदशा पर भी पड़ता है। शोधकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि लोगों की हिंसक प्रवृत्ति का सीधा संबंध मांसाहार के सेवन से है। अध्ययन के परिणामों ने इस बात की और संकेत दिया कि मांसाहार के नियमित सेवन के बाद युवाओं में धैर्य की कमी, छोटी-छोटी बातों पर हिंसक होने और दूसरों को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।

सोसाइटी की गतिविधियां शुरूआत में अमेरिकी उपमहाद्वीप तक सीमित रहीं, लेकिन बाद में इसने अपने कार्यक्षेत्र को यूरोपीय महाद्वीप समेत पूरे विश्व में फैलाया। एक अक्टूबर के दिन दुनिया भर में शाकाहार प्रेमी मांसाहार के नुकसान के बारे में लोगों को जानकारी देने के लिए विभिन्न स्थानों पर कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।


हाल ही में किए गए एक शोध के मुताबिक पता चला है कि शाकाहारी लोगों को कैंसर का खतरा कम होता है ।
तो शाक सब्ज़ी खायें और इस नामुराद बीमारी से बचें ।

शाकाहार जीवन को दीर्धायु, शुद्ध, बलवान एवं स्वस्थ बनाता है। शाकाहारी भोजन मन में दया, समानता, आपसी स्नेह और सहनशीलता उत्पन्न करता है। शारीरिक नैतिक और आध्यात्मिकसभी दृष्टि से शाकाहारी
भोजन मानव के लिये सर्वोत्तम है। शाकाहारी अधिक उत्पादक हैं और कम से कम अपव्ययी है। दुर्बल रोगी फलों अथवा सब्जियों के रसों का उपयोग कर स्वास्थय लाभ प्राप्त कर सकता है। मनुष्य के दाँतों और दाँतों की रचना शाकाहारी भोजन के लिये की है। फलाहार विटामिन की कमी के कारण होने वाले रोगों से बचाव व छुटकारा देता है।

शनिवार, 26 सितंबर 2009

अमेरिका ने माना भारत की वैज्ञानिक क्षमता का लोहा


सदी की सबसे बड़ी खोज

सदी की सबसे बड़ी खोज और शून्य के बाद भारत की सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि के बाद इसरो के अध्यक्ष जी माधवन नायर ने जो संदेश दिया है, वह देश के कोने-कोने में फैले, यह इस खोज की सबसे बड़ी कामयाबी होगी। संवाददाताओं के सवालों के बौछार के बीच उन्होंने कहा कि इस खोज के बाद टेलीविजन प्रोग्राम में एक बच्चे ने एस्ट्रोनाट बनने की इच्छा जताई, तो उन्होंने समझ लिया कि इस मिशन का असर दूरगामी होगा। देश में साइंटिफिक टेंपर के विकास में यह खोज मील का पत्थर साबित होगी। वही साइंटिफिक टेंपर जिसका जिक्र बार-बार देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू करते थे और जिसका उल्लेख संविधान में दर्ज मूल कर्तव्यों में भी है।

यह बहुत बड़ी बात है कि देश की इस उपलब्धि को उस अमेरिका ने भी सलाम किया है जो हमें सपेरों और जादूगरों का देश मानता आया है। हमारे महर्षि कणाद, आर्यभंट्ट और चरक को खारिज करते आए एक देश के नजरिए में आया बदलाव
उल्लेखनीय है। गौर से देखा जाए तो यह सब इतना अचानक नहीं हुआ है, जैसा कि ऊपरी तौर पर दिख रहा है। इसमें उन धरती पुत्रों का अमूल्य योगदान है, जो अमेरिका गए। नासा में नौकरी हासिल की। अपनी विलक्षण बुद्धि का लोहा मनवाया। तभी तो नासा को यह यकीन हुआ कि उसके मून मिनरोलाजी मैपर [एम 3] को ले जाने के लिए सबसे अच्छा अंतरिक्ष यान भारत ही बना सकता है। इसरो के अक्ष्यक्ष ने सही कहा है कि चंद्रमा पर पानी की तलाश में नासा ने उपकरण जरूर भेजा था, लेकिन उसे सही जगह पर ले जाने का काम तो उस यान ने किया, जो पूरी तरह स्वदेश निर्मित है। जिन्होंने देश के अंतरिक्ष विज्ञानियों को सत्तार के दशक में थुंबा उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र में साइकिल पर राकेट ले जाते वैज्ञानिकों को देखा होगा, उन्हें यकीन नहीं होगा कि हमारे वैज्ञानिकों ने वह कर दिखाया है, जो विज्ञान कथाओं का हिस्सा था। अब यह कपोल कल्पना नहीं रह गई है कि चांद पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्री प्यास बुझाने के लिए उसकी सतह से पानी हासिल कर सकते हैं और अपने राकेट यान के लिए ईंधन के रूप में हाइड्रोजन प्राप्त कर सकते हैं।


यह खोज सिर्फ इस मायने में महत्वपूर्ण नहीं है कि इसने चंद्रमा पर पानी होने की पुष्टि की है बल्कि इसलिए भी अहम है कि इससे अन्य ग्रहों पर भी पानी की उपस्थिति का पता लगने की उम्मीद बढ़ गई है। इसके बावजूद इस वैज्ञानिक उपलब्धि के खुमार में यह नहीं भूला जा सकता कि इसी देश में एक हिमाचल प्रदेश है जहां महिलाओं को अब भी मासिक धर्म के दौरान गोशाला में रहना पड़ता है। एक अंधविश्वास के कारण। इसी अंधश्रद्धा का नतीजा है कि महिलाओं को डायन बताकर मार डाला जाता है। अंतहीन है यह फेहरिश्त। लेकिन इस अंधेरे में भी उम्मीद कि किरणें चमक रही हैं। अंतरिक्ष से लेकर खेल के मैदान तक हम प्रगति कर रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश के वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि एक दिन इस अवैज्ञानिकता का भी नाश करने में कामयाब होगी।

किंवदंतियों, लोरियों और कहानियों से गुजरता हुआ चंद्रमा हमारे इतने करीब पहुंच गया है कि अब दूर का नहीं लगता। इतना पास कि वहां इंसानी बस्तियां बसाए जाने के मंसूबे बांधे जा रहे हैं। क्या यह मंसूबे पूरे होंगे? विज्ञान की असीम संभावनाओं को देखते हुए यह असंभव नहीं लगता। इसके लिए हमें शुक्रगुजार होना चाहिए उन लेखकों का जिन्होंने कई दशक पहले अपनी कहानियों और उपन्यासों में इसकी कल्पना की।

अंतरिक्ष युग के शुरू होने से पहले ही रूस के लेखक कानस्टेंटिन सियोलकोवस्की [1857-1935] ने चांद पर इंसान के बसने की कल्पना की थी। 1950 के बाद तो कई वैज्ञानिक और इंजीनियर इस अवधारणा और उस पर आधारित डिजाइन को लेकर सामने आते रहे। मशहूर विज्ञान कथा लेखक आर्थर सी क्लार्क ने 1954 में अपनी पुस्तक [रांडवू विथ रामा] में फुले हुए माड्यूल के साथ चंद्रमा पर केंद्र बनाने की कल्पना की थी। क्लार्क के अनुसार एक अंतरिक्ष यान चंद्रमा की ओर जाएगा। उसमें सवार अंतरिक्ष यात्री इग्लू [बर्फीले इलाको में बनाया जाने वाला घर] जैसे माड्यूल में रहेंगे। उसके बाद एक गुंबदनुमा स्टेशन बनाया जाएगा, जिसमें हवा को साफ करने के उपकरण के अलावा एक परमाणु बिजली घर भी होगा। उसमें इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तोपें होंगी, जो अंतरिक्ष में एक ग्रह से दूसरे पर जाने वाले अंतरिक्ष यानों को लांच करेंगी। इसके बाद चंद्रमा को लेकर कई काल्पनिक उपन्यास प्रकाशित हुए। इस बीच धीरे-धीरे यह कल्पना अंतरिक्ष विज्ञानियों की परियोजनाओं में शुमार होने लगी।

अमेरिका में माइनिंग रिसर्च लैबोरेटरी के डायरेक्टर जान एस. रिंचार्ट ने 1959 में अपने शोध पत्र 'बेसिक क्राइटेरिया फार मून बिल्डिंग' में चंद्रमा पर रहने के लिए दोनों सिरों पर गुंबदवाले बेलनकार माड्यूल बनाने की कल्पना की। चूंकि उस समय यह माना जाता था कि चंद्रमा की सतह पर मीलों गहरी धूल है। इसलिए रिंचार्ट ने एक ऐसे माड्यूल का प्रस्ताव दिया, जो धूल के समुद्र में तैर सके। 1959 तक आते-आते अमेरिकी सेना चंद्रमा पर किला बनाने की परियोजना पर काम करने लगी। और, 1969 में तो इंसान ने चांद पर कदम रख दिया। अब वहां पानी की खोज। निश्चित रूप से आने वाला समय काफी रोमांचक होगा।

चंद्रमा के बारे में लिखे गए साहित्य और बनाई गई फिल्मों पर एक नजर:

किताबों में: द मून इज ए हार्श मिस्ट्रेस

राबर्ट ए हेनीन के इस उपन्यास में चांद पर शासन कर रहे धरती के सम्राटों के खिलाफ चंद्रमा पर बगावत की कहानी है

ट्रांस माइग्रेशन आफ सोल्स 1996 में प्रकाशित बिलियम बार्टन के इस उपन्यास में चंद्रमा से शुरू एक अभियान में एलियनों के ठिकाने की खोज की कहानी है

द मूनराइज एंड मूनवार

बेन बोवा द्वारा लिखित इस किताब के अनुसार एक अमेरिकी कंपनी चंद्रमा पर बेस बनाती है। जहां से बाद में धरती के खिलाफ बगावत होती है

मून फाल

जैक मैकडेविट द्वारा लिखित इस किताब में बताया गया है कि जैसे ही चंद्रमा पर पहला बेस बनकर तैयार होता है एक बड़ा धूमकेतु चंद्रमा से टकराने की ओर अग्रसर है।

टेलीविजन पर :1999 में ब्रिटिश टेलीविजन शो स्पेस में दिखाया गया कि चांद पर बना बेस अल्फा अपनी कक्षा से अलग होकर असाधारण तेजी से बढ़ रहा है।

1973 के ब्रिटिश साइंस फिक्सन टीवी शो 'मूनबेस 3' में चंद्रमा पर बने एक केंद्र की कहानी थी

2003 में जापान में 'प्लेनेट्स' नामक धारावाहिक प्रसारित किया गया

1980 के दौरान जापान में 'मोबाइल सूट गुंडम' धारावाहिक दिखाया गया। जिसमें चंद्रमा पर बसी बड़ी बस्तियों को दिखाया गया। बड़े क्रेटर्स के बगल में भूमिगत शहरों को भी दिखाया गया

फिल्मों में

ए स्पेस ओडिसी- 2001 में स्टेनली कुब्रिक और आर्थर सी क्लार्क ने इस फिल्म में चांद के क्लेवियस क्रेटर में चंद्रमा के केंद्र की कल्पना की थी

वीडियो गेम्स में

एप्पल कंप्यूटर द्वारा निर्मित लुनर कालोनी

आईरेम द्वारा तैयार मून पैट्रोल

क्लेवरमीडियाडाटकाम द्वारा तैयार कालोनी डिफेंडर

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती है पटन देवी


भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती है पटन देवी


पटना। नवरात्र के प्रारंभ होते हुए माता दुर्गा के मंदिरों में भक्तों की भीड़ लगने लगती है। देशभर के सभी शक्तिपीठों में भक्तों का नवरात्र के समय जनसैलाब उमड़ पड़ता है।

पटना के 'पटन देवी' शक्तिपीठ में भी नवरात्र में बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते है। मान्यता है कि यहां भक्तों की सभी मनोकामना पूर्ण हो जाती है। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे दिल से यहां आकर मां की अराधना करते है उनकी मनोकामना जरुर पूर्ण होती है।


मंदिर के महंत विजय शंकर गिरी बताते है कि यहां वैदिक और तांत्रिक विधि से पूजा होती है। वैदिक पूजा सार्वजनिक होती है, जबकि तांत्रिक पूजा मात्र आठ-दस मिनट की होती है लेकिन इस मौके पर विधान के अनुसार भगवती का पट बंद रहता है। गिरी बताते है कि यहां सती की दाहिनी जांघ गिरी थी, इस कारण यह शक्ति पीठों में एक है।


गिरी के अनुसार नवरात्र में यहां महानिशा पूजा का सबसे अधिक महत्व है। उन्होंने कहा कि पटन देवी ग्राम देवी के रूप में यहां पूजित है। मान्यता के मुताबिक मंदिर के पीछे एक बहुत बड़ा गड्ढ़ा है, जिसे 'पटन देवी खंदा' कहा जाता है। मान्यता है कि यहीं से निकालकर देवी की तीन मूर्तियों को मंदिर में स्थापित किया गया था यहां महाकाली, महासरस्वती तथा महालक्ष्मी की प्रतिमाएं स्थापित है।

सोमवार, 21 सितंबर 2009

अंध्विस्वाश की अदालत



भभुआ। मानव की अंतरिक्ष में छुट्टियां मनाने और चांद पर बस्तियां बसाने की योजना के बीच, बिहार के कैमूर जिले में अंधविश्वास के चलते भूतों की अदालत लगती है जिसमें कथित तौर पर भूत, डायन और चुड़ैल से मुक्ति दिलाई जाती है।

यह अदालत नवरात्र के दौरान लगती है। इस वर्ष भी नवरात्र शुरू होते ही कैमूर जिले के केचैनपुर प्रखंड स्थित हरसू ब्रह्माधाम में कथित भूत प्रेत आदि बाधाओं से पीड़ित लोग पहुंच रहे हैं।

किसी का कहना है कि उसके सर पर उसके पड़ोसी ने भूत बिठा रखा है तो कोई कहता है कि श्मशान के पास से गुजरते समय उस पर भूत सवार हो गया। कोई कुलदेवता की नाराजगी से परेशान है तो कोई किसी तांत्रिक से पीछा छुड़ाने की बात करता है। किसी को आशंका है कि प्रेत बाधा के कारण वह संतान सुख से वंचित है तो किसी को व्यापार में हानि हो रही है।

राजधानी दिल्ली के जाने माने मनोविज्ञानी समीर पारेख भूत प्रेत आदि की बातों को सिरे से नकारते हुए कहते हैं कि यह अंधविश्वास के अलावा और कुछ नहीं है। उन्होंने कहा कि हम जिस जगह पर रहते हैं उसके आसपास के माहौल का हम पर गहरा असर होता है। वहां प्रचलित कोई विचार इतना गहरा होता है कि लोग उसी पर अमल करते रहते हैं और उसकी सच्चाई की तह तक नहीं जाते।

राजस्थान से जी एस पटेल अपने पुत्र सतीश को लेकर हरसू ब्रह्माधाम पहुंचे। उनका कहना था कि उनके पुत्र का प्रेत बाधा के कारण मानसिक संतुलन बिगड़ गया था और हरसू ब्रह्माधाम पहुंच कर उसे इससे मुक्ति मिल गई।

हरसू ब्रह्माधाम में ओझा भूत उतारने के लिए मंत्र बुदबुदाते हुए पीड़ित व्यक्ति के शरीर पर छड़ी घुमाता है फिर पीड़ित की छड़ी से पिटाई करता है। पीड़ित चीखता चिल्लाता है। ओझा उससे पूछता है 'कौन हो तुम'। अगर इस सवाल के जवाब में पीड़ित 'भूत या चुडै़ल' कहता है तो उसकी बुरी तरह पिटाई की जाती है।

यहां स्थानीय भाषा में ओझा को सोखा कहा जाता है। पीड़ित को पीटते हुए सोखा कथित भूत से चले जाने को कहता है। इसके बाद पीड़ित ठीक हो जाता है।

डा समीर पारेख स्पष्ट करते हैं कि यह मानसिक रोग या भूत प्रेत वाली कोई बात नहीं है। यह जो कुछ है वह उसी गहरी सामाजिक धारणा का असर है जो अंधविश्वास की वजह से लोगों के मन में गहरे तक जमी होती है। कुछ लोग इस स्थिति का फायदा उठाते हुए धन कमाने लग जाते हैं।

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद से बलजीत मिश्र अपनी पत्नी को लेकर दो साल पहले यहां आए थे। इस निसंतान दंपत्ति को लगता था कि किसी बाधा की वजह से वे संतान सुख से वंचित हैं। हरसू ब्रह्माधाम आने के बाद उन्हें पुत्र हुआ और इस साल वे आभार व्यक्त करने यहां आए हैं।

इस बारे में डा पारेख कहते हैं कि इस तथ्य को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता और न ऐसे कोई वैज्ञानिक प्रमाण हैं।

कुष्ठ रोग से ग्रसित महाराष्ट्र के अमरावती के सुभाष पवार इससे निजात पाने के लिए यहां पहुंचे हैं और उन्हें उम्मीद है कि बाबा के दरबार से वे खाली नहीं लौटेंगे।

हरसू ब्रह्माधाम स्थित मंदिर के पुजारी पंडित राजकेश्वर त्रिपाठी ने बताया कि यहां पहुंचते ही लोगों के दैहिक, दैविक एवं भैतिक तीनों प्रकार के कष्ट स्वत: दूर हो जाते हैं। पुजारी ने कहा कि स्थानीय लोगों के अलावा यहां देश के अन्य राज्यों से भी लोग आते हैं।

कॉफी की लोकप्रियता




कॉफी दुनिया भर में किस तरह से लोकप्रिय हुई, यह कहानी बेहद दिलचस्प है। इंटरनेशनल कॉफी ऑर्गनाइजेशन केअनुसार, कॉफी की शुरुआत अरब देशों से हुई। यमन में पंद्रहवीं सदी के आसपास इसके पौधों की खेती की जाती थी। वैसे, अरब के व्यापारी किसी उर्वर बीज का व्यापार नहीं करते थे।

गौरतलब है कि कॉफी के बीन्स ही कॉफी के बीज होते हैं। जब इनके बाहरी हिस्से को उतार दिया जाता है, तो ये बीज उर्वर नहीं रह जाते। इस तरह, काफी समय तक कॉफी अरब देशों तक ही सीमित हो गई। वे डच थे, जो कॉफी को इन देशों से निकालकर हॉलैंड लाए। एशिया और भारत में भी कॉफी को लाने का श्रेय डच व्यापारियों को ही जाता है।

अरब के लोग शुरुआती समय में कॉफी के स्वाद से परिचित नहीं थे। कॉफी के प्रभाव का अंदाजा उन्हें तब हुआ, जब जानवरों ने इन पौधों को चरना शुरू किया। दरअसल, वे कॉफी के बीज खाने के बाद कुछ अजीब सी हरकतें करने लगते थे। उस समय आमतौर पर कैट नामक झाडी का प्रयोग स्टीमुलेंट के रूप में प्रयोग होता था। लेकिन जल्द ही इसका साइड इफेक्ट पता चला, जो काफी नुकसानदेह था।

जब लोगों को पता चला कि कॉफी के बीजों का भी स्टीमुलेंट की तरह प्रयोग हो सकता है, तो उन्होंने इनका सेवन करने में बिल्कुल देर नहीं की। हां, उस समय लोग इसे कॉफी नहीं, गहवा कहते थे। कहते हैं गहवा इसलिए पॉपुलर हुआ, क्योंकि इस्लाम में नशीले पदार्थो की मनाही थी और गहवा में इसकी भरपाई करने का सारा गुण था।

लगभग ग्यारहवीं सदी के आसपास कॉफी सेवन को बढावा देने के लिए कॉफी हाउसेस बनने लगे, जहां लोग कॉफी पीने के लिए इकट्ठा होते थे। जबकि ये स्थान विचारशील लोगों के विचार विनिमय और बहस मुबाहिसों के लिए लोकप्रिय होने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि अरब समाज में एक तरह से सकारात्मक बदलाव पैदा हुआ। और इस तरह, कॉफी की प्रतिष्ठा में खूब इजाफा हुआ।

लगभग सोलहवीं सदी के आसपास इसकी खुशबू यूरोपीय देशों में भी फैलने लगी। हालांकि हर नई चीज की तरह कॉफी सेवन को लेकर भी तरह-तरह की अफवाहें सुनी जातीं। इसे कई नामों से नवाजा गया। कुछ इसे बाइटर इनवेंशन कहते। इन विवादों से दूर 1652 के आसपास यूरोप में पहला कॉफी हाउस बना। इसे पेनी यूनिवर्सिटीज कहा गया। पेनी इसलिए क्योंकि वहां एक पेनी यानी पैसा देने के बाद ही एक कप कॉफी मिलती थी।

सत्रहवीं सदी के मध्य में कॉफी की खुशबू अमेरिकी देशों में भी फैलने लगी। चाय से ज्यादा लोग कॉफी को पसंद करने लगे। आज दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील कॉफी इंडस्ट्री का गढ है। कॉफी हाउसेस के बनने और कॉफी के उत्पादन और इसकी गुणवत्ता को बढाने का प्रयास जारी है। व्यापार के लिए तेल के बाद कुछ बहुमूल्य उपयोगी वस्तुओं में कॉफी का स्थान सबसे ऊपर है। दिन की शुरुआत करना हो या थकावट से निजात पाने के लिए कॉफी हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है।

कॉफी, एक ऐसा पेय है जिसे कभी स्टॆटस सिम्बोल की तरह पीया जाता है, कभी महज समय बिताने के लिए कॉफी शॉप में पीया जाता है या फिर बस मज़े के लिए पीया जाता है. देखा गया है कि उत्तर भारत के लोग कॉफी के प्रति उदासीन ही होते हैं. इसके विपरीत दक्षिण भारत में कॉफी एक नियमित पेय के रूप में ज्यादा प्रचलित है.

वैसे कॉफी में कोको की मात्रा उसे तुरंत स्फूर्तिदायक पेय बना देती है. दिन भर की दौड़ भाग से थके आदमी को एक कप कॉफी मिल जाए तो उसकी सारी थकान दूर हो जाती है.

ऐसा माना जाता रहा है कि अधिक कॉफी पीने से स्वास्थ्य को नुकसान हो सकता है. परंतु अब संशोधनों से साबित हुआ है कि एक दिन में पाँच कप तक कॉफी पीने से स्वास्थ्य को कोई नुकसान नहीं होता. बल्कि कॉफी कई बिमारियों की रोकथाम में अत्यंत उपयोगी साबित हुई है.अल्ज़ाइमर, फेफडो की पथरी, डिप्रेशन, तनाव, आदि समस्याओं से निदान दिलाने में कॉफी बहुत कारगर है.

रिसर्चरों का दावा है कि रोज हरी कॉफी पीने से अतिरिक्त चर्बी से छुटकारा पाया जा सकता है। रिसर्च में वैज्ञानिकों ने पाया है कि हरी कॉफी का क्लोरोजेनिक एसिड आहार नली में शुगर के अवशोषण को घटाता है और फैट के खत्म होने की प्रक्रिया को तेज करता है। वैज्ञानिकों ने अपनी स्टडी में पाया कि जिन्होंने रोज़ एक कप हरी कॉफी पी, उनका दो सप्ताह में वजन करीब डेढ़ किलो और एक महीने में दो किलो कम हो गया।

ब्रिटिश अखबार डेली मेल ने वैज्ञिनक लॉरेंट फ्रेसनेल के हवाले से कहा, 'कॉफी हरी चाय के समान है। इसके कच्चे और बिना भुने स्वरूप में मौजूद तत्व पाचन बढ़ाते हैं और वजन कम करने में मदद करते हैं। दुर्भाग्य से यह तत्व भूनने के दौरान नष्ट हो जाते हैं इसलिए नियमित तौर पर पी जाने वाली कॉफी में नहीं मिलते।' शोध के परिणाम जरनल ऑफ क्लिनिकल न्यूट्रिशन में छपे हैं।

कॉफी पीने से शरीर में ग्लूकोज और मेटाबोलिजम की क्रियाओं में सरलता आती है. स्फूर्ति का अनुभव होता है. रक्त प्रवाह सुचारु बनता है. कॉफी पीने से शरीर में कैफिन, क्लोरोजेनिक एसिड, मेग्नेशियम, पोटेशियम, विटामीन बी3, ट्रीग्नोलेन जैसे तत्व भी मिलते हैं.

वैसे तो किसी भी चीज की अति बुरी ही होती है. लेकिन अगर सही मात्रा में सेवन किया जाए तो कॉफी जैसा पेय आपके स्वास्थ्य के लिए उपयोगी ही साबित होता है. तो चलिए एक कप कॉफी हो जाए!

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

एक जेल जहां कैदी बदल रहे हैं अपनी किस्मत

भागलपुर केंद्रीय कारागार में बंद कई खूंखार कैदी इन दिनों साहित्य का अध्ययन करने में गंभीरता से जुटे हुए हैं। इस कारण उनके सोचने के तौर-तरीके और समाज के बारे में उनके नजरिये में व्यापक बदलाव हो रहा है।

जेल में बदलाव की इस लहर को जन्म देने वाले वे 12 खूंखार कैदी हैं। जिनके हाथों मे अब फणीश्वर नाथ रेणु का 'मैला आंचल' और प्रेमचंद के 'गोदान' सहित टैगोर और गांधी की जीवनी देखी जा सकती है। गुनाहों से दूर होने के क्रम में ये कैदी रामायण व महाभारत जैसे धार्मिक पुस्तकों का नियमित अध्ययन कर रहे हैं।

बंदियों की रुचि को देख जेल अधीक्षक शिवेंद्र प्रियदर्शी ने कारागार के पुस्तकालय को समृद्ध बनाने का काम शुरू कर दिया है, अच्छी पुस्तकें मंगाई जा रहीं हैं। जेल में बदलाव की यह बयार लाने वाले बंदियों में इंद्रसेन शर्मा, अजय कुमार चौधरी, योगेश यादव, लालबाबू सिंह, रामविलास सिंह, योगेंद्र यादव, लल्लन यादव, संजय सिंह, चंद्रचूड़ यादव, गणेश सिंह, दयाशंकर सिंह व राजनीति सिंह आदि खूंखार अपराधी शामिल हैं, ये सभी संगीन जुर्म में सजा काट रहे हैं।

भलमानस बनने की चाहत में इनमें से कई जेल में रहते हुए स्नातक की डिग्री हासिल कर लिए हैं और कंप्यूटर ज्ञान में दक्ष हो गए हैं। इन बंदियों की रुचि को देखते हुए अन्य कैदी भी इनके हमराह होकर पुस्तकालय में बैठने लगे हैं। ऐसे बंदियों की संख्या अब 40 तक पहुंच गई है। कुछ बंदियों में तो अपनी निजी डायरी लिखने की आदत भी पड़ चुकी है।

राजनीति सिंह की डायरी में लिखे व्यंग्यात्मक अल्फाज हैरत में डालने वाले हैं। उसने लिखा है: चलो गुनाह के किस्से तमाम लिखते हैं, गिरी दीवार पर रिश्तों का नाम लिखते हैं। उन्हें गरीबी का मतलब समझ में आएगा, किसी फकीर के थैलों का दाम लिखते हैं। हमारे समाज के बच्चे भला न क्यूं मरते, अमीर लोग तो उनको ही काम लिखते हैं। किसी गरीब का दामन जो हमने थामा तो, मेरे खिलाफ वो सावन की शाम लिखते हैं।

गुनाहों की सजा काट रहे इन कठोर चेहरों के पीछे एक कड़वा सच यह भी है कि आज इन्हें अपने किए पर पछतावा है। अब ये गुनाह की दुनिया को तौबा कर जीने की नई राह पकड़ना चाहते हैं।

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा..



नई दिल्ली [जागरण न्यूज नेटवर्क]। देश को आजाद हुए 62 साल हो चुके हैं। इस दौरान उसने सूचना, प्रौद्योगिकी और औद्योगिक उत्पादन जैसे कई क्षेत्रों में अभूतपूर्व सफलता हासिल की। लेकिन पानी के प्रबंधन के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए गए।

यही कारण है कि हमारे किसान आज भी मानसून पर निर्भर हैं। भारत इस समस्या का हल नहीं खोज सका। पानी नहीं बरसता तो हाहाकार मच जाता है, और बरसे तो भी। यह जल के कुप्रबंधन का ही नतीजा है कि हर दो तीन वर्षो में मानसून सरकार के छक्के छुड़ा देता है। लेकिन किसी सरकार ने इससे सबक लेने की जरूरत नहीं समझी।

देश में करीब चार करोड़ 50 लाख किसान ऐसे हैं, जो मानसून पर निर्भर हैं। इस साल जून-सितंबर के मानसून सीजन में इतनी कम बारिश हुई, जितनी पिछले कई दशक से नहीं हुई। देश के करीब 604 जिले यानी करीब आधा भारत सूखे से प्रभावित है।

देश के सबसे गरीब प्रदेशों में एक बिहार ने 38 जिलों में 26 में सूखा को घोषित किया है। सोलह करोड़ 80 लाख की आबादी वाले उत्तर प्रदेश ने धान की फसल के अनुमान में 60 फीसदी कटौती की है। रबी की फसल के भी खराब रहने के अनुमान है। इसका कारण ये है कि ज्यादातर पानी के स्रोतों में कम पानी है।

मानूसन सत्र के अंत में हुई बारिश से कुछ राहत जरूर मिलेगी। लेकिन इससे किसानों कोई विशेष फायदा नहीं होगा। किसानों के आत्महत्या करने की खबरें फिर आने लगी हैं।

पिछले महीने आंध्र प्रदेश में 20 किसानों ने आत्महत्या कर ली। यह संख्या बढ़ भी सकती है।

हैदराबाद के पुनिया राव ने 16 एकड़ में कपास बोया है। उन्होंने कहा कि यदि फसल खराब होती है तो मेरे ऊपर दो लाख का कर्ज चढ़ जाएगा। मैं मजदूरी करके भी इसे नहीं चुका पाऊंगा। अब मुझे मरने के बाद ही मुक्ति मिलेगी।

देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 18 फीसदी है। 1990 में यह 30 फीसदी था। इतना महत्वपूर्ण क्षेत्र होने के बावजूद देश का दुर्भाग्य देखिए कि यह महज 15 दिन की बढि़या बारिश पर निर्भर करता है।

लेकिन देश में कम बारिश होना जितनी बड़ी समस्या है उससे कहीं अधिक बड़ी समस्या है ज्यादा बारिश हो जाना। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस साल जुलाई तक देश के विभिन्न इलाकों में आई बाढ़ में करीब 992 लोगों की मौत हो चुकी है। हजारों बेघर हुए हैं। सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि बर्बाद हुई है।


बाढ़ का प्रभाव सबसे ज्यादा बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और असम पर पड़ा है। पश्चिम बंगाल में इस महीने की शुरुआत से अब तक 21 हजार लोग अपना घर छोड़ चुके हैं। यहां के पांच हजार 103 गांव और 10 हजार एकड़ कृषि भूमि इससे बर्बाद हो गई। बिहार में बाढ़ ने तीन लाख से ज्यादा लोगों को प्रभावित किया है।

विडंबना देखिए कि गया और नालंदा जैसे क्षेत्र जो जून जुलाई तक गंभीर सूखा महसूस कर रहे थे, वहां बाढ़ ने सबसे ज्यादा कहर बरपाया।

जरूरत प्रबंधन की

देश की आबादी 2050 तक करीब 1.7 अरब पहुंचने के आसार हैं। पानी के कुप्रबंधन की समस्या से अगर भारत जल्द न
निपटा तो भविष्य में स्थितियां विकराल हो सकती हैं। पानी के प्रबंधन में भारत की जनसंख्या और गरीबी बड़ी चुनौतियां हैं।

पानी को लेकर विभिन्न राज्य सरकारों के बीच विवाद इस समस्या को और गहरा सकती है। सरकार को निश्चित ही इस दिशा में गंभीरता पूर्वक कदम उठाने होंगे।

पहली बार भारतीय सरहद पर लड़कियों की तैनाती


वे हुई तैनात, अब हमें भी मिल जाए मौका

नई दिल्ली। देश के इतिहास में पहली बार भारतीय सरहद पर लड़कियों की तैनाती ने उन लड़कियों की आशाओं को पंख लगा दिए हैं, जो भविष्य में सेना में जाने के सपने संजोए हुए हैं।


देशभक्ति से ओत-प्रोत यह लड़कियां अब भारत की सीमाओं की चौकसी का 'एक मौका' पाने को बेताब हैं। सैन्य शास्त्र की छात्रा श्रुति सराठे ने कहा कि सीमा सुरक्षा बल के इस कदम से हम बहुत उत्साहित हैं। अभी तक हमें सिर्फ सेना से जुड़े सामान्य कार्यो में भाग लेने का
मौका मिलता था, लेकिन अब सरहद पर तैनाती से देश की रक्षा से सीधे तौर पर जुड़ने का मौका मिलेगा। श्रुति ने कहा कि लड़कियों में अब सीमा पर तैनाती के प्रति भी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और सेना में जाने वाली हर लड़की सरहद पर तैनात होने का एक मौका पाना चाहेगी।

सीमा पर तैनात लड़कियों से मिलने की इच्छा व्यक्त करते हुए सैन्य शास्त्र, स्नातकोत्तर की छात्रा अंजना धोटे ने कहा कि जब मैंने सैन्य शास्त्र में दाखिला लिया, तो सोचा भी नहीं था कि लड़कियों को देश सेवा से सीधे तौर पर ऐसे जुड़ने का मौका मिलेगा। लड़कियों को देश की सबसे अहम सीमा 'भारत-पाक' पर तैनात होने का मौका मिलना एक ऐतिहासिक कदम है।
सीमा पर तैनात होने वाली लड़कियां हमारी आदर्श हैं और अब हम उनसे मिलने के इच्छुक हैं। सीमा सुरक्षा बल के इस फैसले को स्वागतयोग्य कदम बताते हुए भोपाल के मोतीलाल विज्ञान महाविद्यालय के सैन्य शास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष डा. कैलाश त्यागी ने फोन पर बताया कि इस फैसले से लड़कियों में सेना के प्रति निश्चित तौर पर उत्साह बढ़ा है। हमारे विभाग में मौजूदा सत्र में लगभग 70 फीसदी लड़कियां हैं, जो अखबारों में इस खबर को पढ़कर खासी उत्साहित हैं।


डा. त्यागी ने कहा कि अब तक लड़कियों को ऐसे मौके नहीं मिलते थे, लेकिन अब यह मौका भी मिल रहा है, जिसके चलते लड़कियां स्वयं को साबित करने के लिए बेताब हैं। उन्होंने कहा कि अब वे अपने विभाग की लड़कियों को सीमा की परिस्थितियों का सामना करने के लिए भी तैयार कराएंगे। सेना में पूर्व लेफ्टिनेंट संगीता सैम्युअल ने कहा कि लड़कियों के लिए यह एक स्वर्णिम मौका है, जो इसके पहले उन्हें कभी नहीं मिला था।

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

जब तक बिहार नहीं सुधरता, प्रकाश झा नहीं रुकेंगें




परदे के पीछे. अमेरिका में ओलिवर स्टोन राजनैतिक फिल्में बनाने के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं और जॉन एफ. कैनेडी पर बनाई उनकी फिल्म अपनी साफगोई और साहस के कारण इस श्रेणी की श्रेष्ठतम फिल्म मानी जाती है।

भारत में राजनैतिक फिल्में प्रकाश झा बनाते हैं और ‘दामुल’ से लेकर ‘अपहरण’ तक उनकी सारी फिल्में सामाजिक दस्तावेज की तरह पढ़ी जानी चाहिए। ‘मृत्युदंड’ ‘गंगाजल’ और ‘अपहरण’ उनकी फिल्म त्रिवेणी है, जिसे सिलसिलेवार देखने पर ग्रामीण और कस्बाई भारत में हिंसा और भ्रष्टाचार की तस्वीर साफ उभरकर आती है।

उनकी ताजा फिल्म ‘राजनीति’, संभवत: उनकी फिल्म त्रिवेणी के उपसंहार की तरह गढ़ी है। अपनी श्रेणी में झा श्रेष्ठतम हैं। ओलिवर स्टोन का रास्ता प्रकाश झा के रास्ते से कम भयावह है,
क्योंकि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के माहौल में फिल्म बना रहे हैं और उन्हें इसकी भी स्वतंत्रता है कि कैनेडी के कातिल को उसके नाम से पुकारें।

इधर, प्रकाश झा को ऐसे वातावरण में फिल्म बनानी पड़ रही है, जहां कूपमंडूक सेंसर बोर्ड से पारित होने के बाद भी मोहल्लाई दादाओं की स्वीकृति लेना पड़ती है। कोई भी व्यावसायिक हुड़दंगी आपको कहीं भी रोक सकता है।
बिहार में कोसी नदी का संयम टूटा और आधा बिहार इसकी चपेट में आ गया। केंद्र सरकार ने तीन हजार करोड़ की सहायता भेजी, लेकिन मुसीबतजदा लोगों के पास कितनी पहुंची! पूरा देश नदी के तांडव को उस समय की सुर्खी मानकर जबानी सहानुभूति जताता रहा और आज सब लोग भूल गए, जबकि नदी के मारे आज भी संकट में जी रहे हैं। नदी का संयम टूटता है, परंतु बिहार का आलस्य नहीं टूटता। क्या इन सवालों के जवाब ‘राजनीति’ फिल्म में है? जब तक बिहार नहीं सुधरता, भारत की प्रगति नहीं हो सकती।

अमेरिका, रूस, फ्रांस, कजाकिस्तान और नामीबिया के बाद मंगोलिया के साथ भी हुआ एटमी करार

नई दिल्ली। भारत ने सोमवार को मंगोलिया के साथ एक असैन्य परमाणु करार किया। माना जाता है कि मंगोलिया में यूरेनियम के प्रचुर भंडार हैं। मंगोलिया छठा राष्ट्र बन गया है, जिसके साथ भारत ने परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की तरफ से छूट मिलने के बाद असैन्य परमाणु करार किया है।

45 सदस्यीय परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह ने इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ व्यापार करने पर भारत पर लगी 34 वर्ष पुरानी रोक को हटा लिया था।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और मंगोलिया के राष्ट्रपति साखियाजीन अलबगदोर्ज के बीच यहां व्यापक बातचीत के बाद परमाणु समझौते और चार अन्य करारों पर दस्तखत किए गए।

भारत ने पहले ही अमेरिका, रूस, फ्रांस, कजाकिस्तान और नामीबिया के साथ असैन्य परमाणु करार किया है। रेडियोएक्टिव खनिजों और परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के क्षेत्र में सहयोग पर सहमति से भारत मंगोलिया में यूरेनियम की तलाश कर सकेगा।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री सिंह ने कहा कि दोनों देश खनन और कृषि सरीखे अन्य क्षेत्रों में सहयोग के लिए सहमत हो गए हैं। दोनों पक्षों ने स्वास्थ्य, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, सांख्यिकीय मामले और कर्ज देने के संबंध में भी अन्य करार किए हैं। भारत ने मंगोलिया के लिए स्थायित्व कोष के तौर पर ढाई करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि की भी घोषणा की है।

बिहार मैरिज रजिस्ट्रेशन रूल 2006

तो अवैध है ये सभी शादियां



पटना। फूला-फूला फिरे जगत में होत हमारो ब्याह। शादी हो या विवाह, ये शब्द मन में रोमांच भरने के लिए काफी होते हैं। वाइफ वुड बी हसबैंड और हसबैंड वुड बी वाइफ को लेकर मन में कई तरह के ख्यालात बुनते हैं। सपने गढ़ते हैं। फिर वो घड़ी भी आती है जब घर में मंगल ध्वनि गूंजती हैं, शहनाइयां बजती हैं और घोड़े पर सवार होकर दुल्हे राजा हसबैंड बनने की लालसा के साथ वुड बी वाइफ को विदा कराने उसके घर जा पहुंचता है। दो परिवारों के इस मिलन का प्रॉसेस काफी लंबा है, लेकिन सारे प्रॉसेस पूरा कर दो अजनबी प्यार के पवित्र रिश्ते में जीवनभर के लिए बंध जाते हैं। ये बात तो सभी जानते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस प्रॉसेस को पूरा कर आपने शादी की है वह अवैध है। झटका लगा ना? लगने की बात है भी, क्योंकि सच्चाई यही है कि आपने हिन्दू धार्मिक रीति-रिवाज से जिसे अपना हसबैंड या वाइफ बनाया है, उससे आपके रिलेशन को तब तक मान्यता नहीं है, जब तक कि गवर्नमेंट के बही-खाते में आपके नाम और विवरण दर्ज न हो जायें। दो अजनबी परिवार एक होने के लिए तमाम दूसरे प्रॉसेस तो पूरे करते हैं, लेकिन एक मामूली और छोटा काम करना भूल जाते हैं या फिर कहिए करना ही नहीं चाहते, जिससे उनकी शादी को गवर्नमेंट के बही खाते में मान्यता नहीं मिल सकती है। तो क्या ऐसी शादियां अवैध हैं। यह हम नहीं आंकड़े कहते है।. यदि कानून के आइने में इन शादियों को परखें, तो 100 में 98 परसेंट शादियां अवैध हैं.




ज्यादा उत्सुकता नहीं दिखती

अमूमन शादियां कई प्रकार से होती हैं। अगर सिर्फ हिन्दू धर्म की बात करें तो इसमें भी शादियां कई प्रकार से होती हैं। अमूमन व्यवस्था के अनुकूल हिन्दू रीति रिवाज और कर्मकांड से ज्यादा शादियां होती हैं। लेकिन 1954 में बने कानून [विशेष विवाह निबंधन नियमावली-1954] के अनुसार हिन्दू कर्मकांड या रीति रिवाज से हुई शादियों का रजिस्ट्रेशन भी अनिवार्य है। लेकिन सिर्फ बिहार की क्यों देश के किसी भी दूसरे प्रांत में शादियों के रजिस्ट्रेशन को लेकर वैसे युवा जिनकी निकट फ्यूचर में शादी होने वाली है या फिर शादी शुदा जीवन बीता रहे लोगों में बहुत ज्यादा उत्सुकता नहीं दिखती है।

स्टेट गवर्नमेंट ने बदला कानून

करीब तीन साल पहले स्टेट की नीतीश गवर्नमेंट ने 1954 के शादी कानून में ड्रास्टिक चेंजेज किये। गवर्नमेंट ने फैसला लिया कि वर्ष 2006 के बाद स्टेट में जितनी भी शादियां होंगी, उनका रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा। पहले के नियमों को गवर्नमेंट ने शिथिल भी किया। 2006 में शादियों के रजिस्ट्रेशन के लिए जो कानून बना उसे नाम दिया गया बिहार मैरिज रजिस्ट्रेशन रूल 2006। इस कानून में ऐसे प्रावधान हैं कि यदि कोई शादी करने के बाद रजिस्ट्रेशन के लिए बहुत भागदौड़ के कारण ऐसा करने से भागता है, तो उसे अब ऐसा नहीं करना होगा। क्योंकि रजिस्ट्रेशन कर सर्टिफिकेट इश्यू करने के अधिकार गवर्नमेंट ने ग्राम पंचायत के मुखिया, वार्ड कमिश्नर और अरबन एरिया में काउंसलर को सौंपा है।

बस कदम बढ़ाने की जरूरत

स्टेट गवर्नमेंट को उम्मीद थी कि उसके इस फैसले को लेकर लोग उत्साह दिखाएंगे और दो कदम बढ़ा कर जिस प्रकार शादियों के लिए उत्साह पूर्वक तमाम कामों को अंजाम देते हैं, उसी प्रकार शादियों के रजिस्ट्रेशन के लिए भी आगे आएंगे। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। यह सच्चाई है कि 2006 में इस कानून के बाद भी अब तक पूरे स्टेट में महज 145 के करीब नव विवाहितों ने अपनी मैरिज को लीगल रूप दिया और शादियों का रजिस्ट्रेशन कराया। गवर्नमेंट की सोच थी कि रजिस्ट्रेशन को लेकर सबसे ज्यादा उत्साह मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास दिखाएंगे। हां, अपर मिडिल क्लास और अपर क्लास के लोग शायद इसमें ज्यादा इंटरेस्टेड ना हों। लेकिन अपर क्लास के लोग तो रजिस्ट्रेशन को नहीं ही आए, इस क्लास के अलावा भी किसी ने रजिस्ट्रेशन को लेकर कोई उत्साह नहीं दिखाया।

तो भरना पड़ सकता है दंड

2006 में बने कानून का पालन हर क्लास और तबके के लोगों को करना था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। शायद कहीं ना कहीं गवर्नमेंट को इस बात का एहसास भी था इसलिए गवर्नमेंट ने कानून में दंड के प्रावधान भी किए। व्यवस्था ऐसी की गई कि मैरिज के अगले दिन से लेकर तीस दिनों के भीतर रजिस्ट्रेशन कराना मस्ट होगा। अगर कोई विवाहित जोड़ा ऐसा नहीं करता है तो उसे 90 दिनों के अंदर रजिस्ट्रेशन कराना होगा और दंड स्वरूप एक सौ रुपए देने होंगे। इसके बाद यदि रजिस्ट्रेशन नहीं कराता है तो वैसी स्थिति में संबंधित विवाहितों से अधिकतम एक हजार रुपए दंड स्वरूप लेने की व्यवस्था की गई।

नियम-कानून से फर्क नहीं पड़ता

कहा जाता है कि नियम तो तोड़ने के लिए ही बनते हैं और सच्चाई भी यही है कि नियम बन रहे हैं और टूट भी रहे हैं। यह कटु सत्य है कि पूरे बिहार की बात छोड़ भी दें तो अकेले पटना शहर में शादियों के मौसम में चार से पांच हजार युवा शादी के बंधन में बंध जाते है। शहर के प्रतिष्ठित होटल मौर्या और चाणक्या सिर्फ चार महीने के विवाह के मौसम में दो सौ से चार सौ शादियां करा देते हैं, लेकिन यह भी सच्चाई है कि इन शादियों का कोई रजिस्ट्रेशन नहीं होता। शादियों के रजिस्ट्रेशन के क्या मायने हो सकते हैं। इसका अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि आपको राशन कार्ड बनाने से लेकर पासपोर्ट बनाने तक में इस रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट का यूज करना होता है, लेकिन आज के युवा मानते हैं कि पैसे के बल पर तमाम सुविधाएं घर बैठे मिल जाती हैं वैसी स्थिति में इतनी भाग दौड़ का क्या मतलब है। जिस दिन शादी के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट की आवश्यकता होगी, उसी दिन थोड़े से पैसे खर्च कर बनवा लिया जाएगा।


सोशल साइंटिस्ट डा. रणधीर कुमार सिंह का मानना है कि ये पूरा मामला अवेयरनेस से जुड़ा हुआ है। लोग आज भी अपने हिसाब से दुनिया चलाना चाहते हैं। उनके पास पैसा है वे पैसे के जोर पर तमाम सुविधा हासिल कर लेने का माद्दा रखते हैं। गवर्नमेंट जब इस प्रकार के कानून बनाती है तो उसकी मॉनिटरिंग से लेकर प्रचार तक की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके बाद दंड के भी कड़े प्रावधान होने चाहिए। अब बताइये रजिस्ट्रेशन नहीं कराने पर दंड स्वरूप एक हजार रुपए लेने का प्रावधान है। जो हजार रुपए का पानी पी जाते हैं उनके लिए हजार रुपए खर्च करना कौन सा मुश्किल काम है तो आज जरूरत है कि कोई कानून अगर लागू किया जाए तो उसका व्यापक प्रचार प्रसार भी किया जाए।


कानून बनाने और दंड का प्राभ्धान करने से सिर्फ लोगों की रूचि इसमें नहीं बढ़ सकती| सरकार को चाहिए की ग्राम पंचायत के मुखिया, वार्ड कमिश्नर और अरबन एरिया में काउंसलर के द्वारा हर सादियों में जाकर सगुण के तौर पर १०० या ५०० रूपये दे और साथ ही साथ सादी विवाह को भी रजिस्ट्रेशन करे|

न्यूक्लियर बम घोषित हैं 23 हजार, अघोषित कितने






23,000 बमों पर है दुनिया

ये आंकड़े डराते हैं। पढ़कर माथे पर चिंता की लकीरें गहराती हैं। मन में एक सिहरन पैदा होती है। आंखों के सामने हिरोशिमा और नागासाकी का मंजर घूमने लगता है। तब कुछ न्यूक्लियर बमों ने ऐसा कहर बरपाया था कि दशकों बाद सिचुएशंस पूरी तरह नहीं सुधर पाई हैं। व‌र्ल्ड में अब तक 23 हजार न्यूक्लियर बम घोषित रूप से बनाए जा चुके हैं। इतना ही नहीं, इनमें से 8100 से ज्यादा बम कभी भी दागे जाने की सिचुएशन में हैं। भारत के लिए यह और भी मायने इसलिए रखता है क्योंकि इस लिस्ट में साफ है कि पाकिस्तान के पास भारत से ज्यादा न्यूक्लियर वेपंस हैं।

एफएएस की रिपोर्ट

ये डेटाज फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट की ओर से जारी एक रिपोर्ट में दिखाए गए हैं। इसमें व‌र्ल्ड के सभी देशों के पास न्यूक्लियर वेपंस की इंफॉर्मेशन विस्तार से दी गई है। इसके मुताबिक व‌र्ल्ड की नौ कंट्रीज के पास कुल 23, 395 न्यूक्लियर वेपंस हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पाकिस्तान के न्यूक्लियर वेपंस की संख्या अब भारत के न्यूक भंडार से अधिक है।

सबसे ज्यादा रूस के पास

खुद को दुनिया का दादा कहने वाले अमेरिका आश्चर्यजनक रूप से इस लिस्ट में सेकंड पोजीशन पर है। रूस का परमाणु जखीरा 13, 000 बमों के साथ सबसे बड़ा है। अमेरिका के पास 9400 न्यूक वेपंस हैं। चीन के पास 300 वेपंस हैं और वह थर्ड पोजीशन पर है। 240 बमों के साथ फ्रांस चौथे नंबर पर है। जबकि ब्रिटेन पांचवी पोजीशन पर है और उसके पास 185 बम हैं। इस तरह सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों के पास कुल 23, 125 न्यूक वेपंस हैं। यह व‌र्ल्ड के कुल न्यूक वेपंस का 98.5 परसेंट है।

किसके पास क्या?

रूसी जखीरे में 2790 वेपंस रणनीतिक, 2050 गैर रणनीतिक और 4840 ऑपरेशनल हैं। रूस के पास 1991 में गैर रणनीतिक मुखास्त्र की संख्या 15000 थी। यह अब 5390 रह गई ह।. लगभग 200 मुखास्त्र निष्क्रिय अवस्था में यूरोपीय भाग में तैनात हैं और 2500 मुखास्त्र रिजर्व हैं। जबकि अमेरिका के पास 2126 रणनीतिक, 500 गैर रणनीतिक व 2623 ऑपरेशनल वेपंस हैं।

भारत से आगे पाक

जो अन्य देश परमाणु शक्ति संपन्न डिक्लेयर किए गए हैं उनमें पाकिस्तान का न्यूक भंडार इजरायल और भारत की तुलना में कहीं अधिक हो गया है। रणनीतिक हथियारों के मामले में भारत और पाक का पलड़ा भारी है। दोनों के पास 60-60 हथियार हैं। लेकिन कुल हथियारों के मामले में भारत के 60 से 80 के कंपैरिजन में पाक के पास 70 से 90 न्यूक वीपंस हैं। यह इजरायल के 80 से भी ज्यादा हो सकते हैं। इस तरह साउथ और वेस्ट एशिया में पाकिस्तान सबसे बड़ी परमाणु ताकत हो सकता है। नॉर्थ कोरिया के पास न्यूक वेपंस का ब्यौरा हालांकि किसी के पास अवेलेबल तो नहीं। पर इंटेलीजेंस इंफॉर्मेशंस के बेस पर रिपोर्ट में बताया गया है कि उसके पास 10 से अधिक बम हो सकते हैं। नॉर्थ कोरिया ने हाल ही में दो न्यूक टेस्ट किए हैं।


रिपोर्ट में इजरायल, पाकिस्तान, भारत और नॉर्थ कोरिया के पास गैर रणनीतिक एवं ऑपेरशनल यानी दागने के लिए तैयार वेपंस की संख्या अनुपलब्ध बताई गई है। रिपोर्ट में ईरान के बारे में कोई जिक्र नहीं है। [जेएनएन]